News Strike: एमपी बीजेपी BJP में अंदरूनी घमासान! कुर्सी, शिलापट्ट और बैठकों पर क्यों भिड़ रहे नेता?

Harish Divekar | Oct 31, 2026, 07:00 IST
मध्यप्रदेश बीजेपी में अंदरूनी मतभेद चर्चा में, कुर्सी से लेकर बैठकों तक विवाद।
Internal Disputes in Madhya Pradesh BJP Over Positions, Meetings and Leadership Roles.
मध्यप्रदेश में बीजेपी ही सत्ता में हैं और बीजेपी ही आपस में लड़ भी रही है। विंध्य विकास प्राधिकरण इसका ताजा उदाहरण है। शायद सत्ता का नशा इसी को कहते हैं कि हर शख्स खुद को आला नेता समझने लगता है और किसी दूसरे शख्स से भिड़ जाता है। बीजेपी नेताओं का भी हाल कुछ ऐसा ही है जो कभी एक प्रशासनिक पद के लिए लड़ रहे हैं।

कभी एक नाम पट्टिका के लिए आपस में भिड़ जाते हैं। अनुशासन की कसमें खाने वाली बीजेपी आमतौर पर ऐसे नेताओं को आसानी से कंट्रोल कर लेती है। शायद 18 साल की सत्ता की खुमारी कुछ ऐसी है कि अब नेता भी बाज नहीं आ रहे। अनुशासन की नकेल अब ढीली पड़ रही है और मतभेदों का प्याला छलकने लगा है।



बीजेपी नेताओं के मतभेद

बीजेपी नेताओं के मतभेद अब सतह पर हैं। दरअसल ये मामला विंध्य विकास प्राधिकरण (Vindhya Development Authority) का है। विंध्य क्षेत्र के दो बड़े नेताओं के बीच जमकर बवाल मचा हुआ है। ये दो नेता हैं प्राधिकरण के अध्यक्ष पंचूलाल प्रजापति जो विधायक भी रह चुके हैं और दूसरे नेता हैं। इसी प्राधिकरण के उपाध्यक्ष डॉक्टर अजय सिंह। दोनों के बीच मतभेद कितने गहरा चुके हैं। इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अब पंचूलाल प्रजापति ने एक शिकायती पत्र सीएम मोहन यादव के नाम ही भेज दिया है। जिसमें उन्होंने उपाध्यक्ष अजय सिंह पर रोजाना के काम में रुकावट डालने के आरोप लगाए हैं। एक गंभीर आरोप ये भी है कि अजय सिंह सरकारी अधिकारियों पर बिना वजह दबाव डालते हैं।



इस आशय का पत्र पंचूलाल ने सीएम के अलावा सारे प्रदेश प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री और रीवा, शहडोल के कई पदाधिकारियों को भी भेजे हैं। पंचूलाल ने लिखा है कि अजय सिंह रीवा के कलेक्टर और कमिश्नर पर दबाव डालकर प्राधिकरण के कामों को अटकाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा उन्होंने शहडोल के जिला योजना अधिकारी डी के अहिरवार की जॉइनिंग पर भी सवाल उठाए हैं।



क्या है पंचूलाल प्रजापति के आरोप ?

दोनों के विवाद की जड़ में प्राधिकरण के सीईओ यानी कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी की कुर्सी है। इस मामले में पहला आरोप पंचूलाल प्रजापति पर ही लगा कि उन्होंने पुराने सीईओ को हटाकर एक तीसरे श्रेणी के अधिकारी को सीईओ बना दिया जिनका नाम है केडी साकेत। इस फैसले पर दोनों उपाध्यक्षों ने विरोध दर्ज करवाया। साकेत को हटा कर अहिरवार को ये जिम्मेदारी सौंप दी गई। सीईओ के पद पर बवाल इतना बढ़ा कि पंचूलाल प्रजापति भोपाल तक आ गए और शिकायत दर्ज करवाई।



जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने का आरोप

इसके बाद थोड़ा सा पॉलिटिकल ड्रामा भी हुआ। पंचूलाल ने अजय सिंह पर आरोप मढ़ा कि वो उनके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे अपने आत्मसम्मान पर हमला बताते हुए पंचूलाल ने रीवा के अजाक थाने में शिकायत भी दर्ज करवा दी। पर हैरानी तब हुई जब उन्होंने यू टर्न लिया और खुद ही शिकायत वापस भी ले ली। इस मामले में अजय सिंह ने हर आरोप को खारिज कर दिया है। सीईओ से लेकर जातिसूचक शब्द वाले मामले को उन्होंने सिरे से नकार दिया है।



खंडेलवाल बोले पंचूलाल की शिकायती चिट्ठी मिली

हालांकि संगठन की तरफ से पंचूलाल की शिकायत की पुष्टि कर दी गई है। बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कंफर्म किया है कि उन्हें पंचूलाल की शिकायती चिट्ठी मिली है। खंडेलवाल ने दोनों को बुलाकर समझाइश दी है और गलतफहमियां दूर करने की सलाह भी दी है। साथ ही ये भी ताकीद कर दिया है कि यही हाल रहा तो दोनों की ही नियुक्ति रद्द कर दी जाएगी।



शिलापट्ट पर नाम को लेकर टकराव

ये तो एक मामला हुआ इससे पहले भी कुछ और मामले सामने आ चुके हैं। जिसमें से कुछ में तो प्रदेश और देश के लेवल के नेताओं के नाम शामिल हैं। बात विंध्य की हो रही है तो रीवा से ही शुरुआत कर लेते हैं। यहां आपसी मतभेद का मुद्दा मात्र के शिलापट्ट है। शिलापट्ट यानी कि वो पत्थर जिस पर अक्सर नेताओं के नाम लिखे होते हैं। फलां ने उद्घाटन किया। ऐसे एक शिलापट्ट को लेकर पूर्व विधायक श्यामलाल त्रिपाठी और मौजूदा विधायक सिद्धार्थ तिवारी के बीच विवाद हो गया। त्रिपाठी का आरोप है कि शिलापट्ट पर उनका नाम था, लेकिन उसे हटा दिया गया। ये उनके अपमान के समान है। ये मामला इतना बढ़ा कि दोनों नेताओं के समर्थक आमने सामने आ गए। जब एक ही पार्टी के दो नेता आमने सामने आते हैं और मामला प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचता है। तो संगठन के भीतर तालमेल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।



शिवराज सिंह चौहान को बैठना पर धरने पर

अब बात करते हैं शिवराज सिंह चौहान की। उनके क्षेत्र में आदिवासी परिवारों पर कार्रवाई हुई तो खुद उन्हें धरने पर बैठना पड़ा। शिवराज समझदार नेता हैं इसलिए सीएम और पार्टी पर आंच आने से बच गई। लेकिन जब उनके स्तर का वरिष्ठ नेता धरने पर बैठता है तो सरकार की कार्यप्रणाली और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े होते ही हैं।



विजयवर्गीय की बैठक में विधायकों ने बनाई दूरी

एक मामला इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय से जुड़ा है। इंदौर में पानी के संकट को लेकर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बैठक बुलाई। बैठक में अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधियों को भी शामिल होना था। लेकिन नौ में से पांच विधायक नहीं पहुंचे। जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट भी बैठक में मौजूद नहीं थे। जब कैलाश विजयवर्गीय से विधायकों की गैरमौजूदगी को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि त्योहार है। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि जो नहीं आए हैं, उनसे पूछिए, मुझसे क्यों पूछते हैं? विधायकों की गौर मौजूदगी और विजयवर्गीय का तल्ख जवाब सिचुएशन को समझाने के लिए काफी है।



प्राधिकरण में कुर्सी को लेकर विवाद, रीवा में नाम और सम्मान को लेकर विवाद, सीहोर में शिवराज सिंह चौहान का प्रशासन के खिलाफ धरना, और इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय की बैठक से पांच विधायकों की गैरमौजूदगी। राजनीति में हर असहमति गुटबाजी नहीं होती और हर गैरमौजूदगी विरोध का संकेत नहीं होती। लेकिन जब अलग अलग जगहों पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से जुड़े विवाद सामने आते हैं, तो ये देखना जरूरी हो जाता है कि संगठन और सरकार के बीच संवाद कितना मजबूत है।



क्या नेताओं के बीच समन्वय की कमी है?

क्या स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच समन्वय की कमी है? क्या जनप्रतिनिधि अपनी बात मनवाने के लिए सार्वजनिक विरोध का रास्ता चुन रहे हैं? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में पार्टी के नेताओं के बयानों, उनके फैसलों और संगठन की प्रतिक्रिया से मिल सकते हैं। फिलहाल इतना जरूर है कि मध्य प्रदेश बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष के सवालों का जवाब देने की नहीं है। सरकार और संगठन के भीतर बेहतर तालमेल बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि सत्ता में होना और सत्ता के भीतर सबका एक सुर में होना ये दोनों ही दो दो अलग अलग बातें हैं।

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