News Strike : मध्यप्रदेश के विधायकों को लगा झटका, इंक्रीमेंट पर आया बड़ा अपडेट

Harish Divekar | Mar 31, 2026, 07:00 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश के विधायकों को वेतन वृद्धि में एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। सीएम मोहन यादव ने फैसला टाल दिया है, जानिए इसके पीछे की वजह और क्या बदलाव आएंगे।

मध्यप्रदेश के विधायक वो चाहें बीजेपी के हों या कांग्रेस के, फिलहाल बड़े झटके के लिए तैयार रहें. क्योंकि वो जिस खुशखबरी का इंतजार कर रहे थे। जिसके लिए करीब एक साल से काम जोर शोर से हो रहा था। वो खुशखबरी उन्हें फिलहाल नहीं मिलने वाली है। ये खबर विधायकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है। कुछ खास कारणों के चलते फिलहाल मोहन सरकार ने ये फैसला किया है कि खुशखबरी को मुलतवी कर दिया जाए।



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बात वेतन की तो सत्ता-विपक्ष एकराय

किसी भी प्रदेश में या देश में ऐसे मुद्दे कम ही होते हैं, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक राय होते हैं यानी कि सेम पेज पर होते हैं। ये भी एक ऐसा ही मुद्दा था, जिस पर न सत्ता पक्ष क्रेडिट लेने की कवायद कर रहा था और न विपक्ष किसी मंच से विरोध की कोशिश में जुटा था। दोनों एक साथ थे, लेकिन बात बन नहीं सकी। ऐसा कब होता है ये तो आप समझ ही गए होंगे।



क्या कहा नहीं समझे, अरे भई जब बात वेतन की होती है यानी कि सैलेरी की। तब विधायक किसी भी दल के हों एक जैसी ही सोच रखते हैं। वेतन बढोतरी, इंक्रीमेंट जैसे शब्द भला किसे अच्छे नहीं लगते। विधायक क्या इससे अलग होते हैं, बिलकुल नहीं। वेतन बढ़ने क नाम पर वो सब सदन में एक ही सुर में बात करते हैं। आर्थिक बोझ तले दबा प्रदेश, घाटे का बजट जैसी की कोई बात किसी विधायक को याद नहीं आती।



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प्रदेश के विधायक दस सालों से इंक्रीमेंट के इंतजार में

खैर विधायक भी अपनी वेतनवृद्धि का शिद्दत से इंतजार कर रहे थे। इसके लिए कवायद भी लंबे से चल रही थी, लेकिन इंतजार करते करते दो सत्र बीत गए, कोई फैसला नहीं हुआ। और सुना है कि फिलहाल मोहन सरकार ने वेतन वृद्धि को पोस्टपोन कर दिया है।



प्रदेश के विधायक बीते करीब दस सालों से इस इंक्रीमेंट के इंतजार में हैं। और, लगातार इसकी मांग भी कर रहे थे। जिसे देखते हुए सीएम मोहन यादव ने एक समिति भी बना दी थी। इस समिति के अध्यक्ष हैं उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और सदस्यों में बीजेपी विधायक अजय विश्नोई और कांग्रेस विधायक सचिन यादव शामिल थे। इस समिति को वेतन-भत्तों से जुड़ी रिपोर्ट पेश करना थी। समिति ने बहुत सारे राज्यों के विधायकों की सैलेरी का भी अध्ययन किया और नतीजा ये निकला की प्रदेश के विधायकों को कई प्रदेशों के मुकाबले कम सैलरी मिलती है और इंक्रीमेंट की सिफारिश भी की। मैं पहले बताता हूं कि समिति ने कितनी सैलरी बढ़ाने की पेशकश की है।



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सैलरी 50 से 60 हजार तक बढ़ाने का प्रस्ताव

प्रदेश में विधायकों की मौजूदा सैलरी है एक लाख दस हजार। इस अमाउंट में सभी तरह के भत्ते भी शामिल हैं। इस मंथली सैलरी को बढ़ाकर एक लाख सत्तर हजार रु. करने की सिफारिश है। जब विधायकों का वेतन बढ़ेगा तो पूर्व विधायक, सीएम, मंत्री, राज्यमंत्री से लेकर अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष जैसे सभी नेताओं का वेतन बढ़ेगा। उस पर भी एक नजर डाल लेते हैं।



पूर्व विधायक की पेंशन पैंतीस हजार से बढ़कर 58 हजार रु हो जाएगी। मुख्यमंत्री का वेतन दो लाख रु. महीना है, जो बढ़कर 2 लाख 60 हजार होगा। मंत्रियों को मंथली एक लाख 70 हजार रु. मिलते हैं, जिसे बढ़ाकर 2 लाख बीस हजार रु. करने की सिफारिश है। विधानसभा अध्यक्ष की तन्खवाह 1 लाख 85 हजार से बढ़ाकर 2 लाख करने की सिफारिश है। नेता प्रतिपक्ष को चूंकि मंत्री दर्जा हासिल होता है, इसलिए उनकी सैलरी पर भी मंत्रियों वाली सिफारिश ही लागू होगी।



बात सिर्फ वेतन की नहीं है, विधायकों की विकास निधि बढ़ाने का भी प्रस्ताव रखा गया था। फिलहाल विधायकों को तीन करोड़ रु. विकास निधि मिलती है। इस फंड को बढ़ाकर 5 करोड़. रु. करने का प्रस्ताव रखा गया है। ये सैलरी जब भी लागू होगी तब प्रदेश विधायकों की सैलरी के मामले में देश के टॉप फाइव प्रदेशों में शामिल होगा।



तेलंगाना के विधायकों को सबसे ज्यादा सैलरी

फिलहाल इस रेस में सबसे आगे है तेलंगाना, जहां विधायकों की सैलेरी 2 लाख पचास हजार रु. है। दिल्ली में 2 लाख 2.25 हजार रु., महाराष्ट्र में 2 लाख रु. महीना, उत्तरप्रदेश में 1 लाख 87 हजार रु. महीना मिलती है। बिहार औऱ कर्नाटक विधायकों को 1 लाख 60 हजार रु. सैलरी देते हैं। हरियाणा में विधायकों की सैलरी 1 लाख 50 हजार के करीब है। इसके बाद राजस्थान का नंबर है, उसके बाद छत्तीसगढ़ आता है।



छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विधायकों की सैलरी बराबर है। इंक्रीमेंट के बाद मध्यप्रदेश के विधायकों की सैलरी बिहार कर्नाटक से ज्यादा होगी पर फिलहाल इसके कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं।



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इंक्रीमेंट के लिए अभी माननीयों को करना होगा इंतजार

इस मुद्दे पर विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और सीएम मोहन यादव में चर्चा भी चुकी है। अंदर की खबर ये है कि दोनों कुछ मामलों में एकमत नहीं हो सके, जिसके बाद ये फैसला टाल दिया गया। इसके अलावा भी कुछ वजहें हैं, जिनकी वजह से सरकार ने ये फैसला लिया है। जिसमें से एक प्रदेश पर चढ़ा भारी भरकम कर्जा। इसके अलावा सरकार के सिर पर घोषणाओं का भी बोझ लदा है। सरकार को किसानों को प्रोत्साहन राशि भी देनी है। गेहूं और उड़द का बोनस भी देना है, इसके अलावा सरसों पर भावांतर योजना भी लागू करना है।



सरकार को केंद्र की मदद भी कल से मिलना कम हो जाएगी। खबर है कि एक अप्रैल 2026 से शुरू हो रहे फाइनेंशियल ईयर में केंद्र सरकार राज्यों को दी जाने वाली मदद में 7 हजार 500 करोड़. रु. की कटौती करने जा रही है। ऐसा है तो जाहिर है सरकार को सोचना ही होगा कि वो अपने खजाने पर कितना भार बढ़ाए। जनता की चिंता करे या जनप्रतिनिधियों की, इसका फैसला जब तक नहीं हो जाता तब सारे माननीयों को इंक्रीमेंट का इंतजार करना ही पड़ेगा।



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