News Strike: MP OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट के फैसले से BJP की बढ़ी टेंशन! सुप्रीम कोर्ट में नया पेंच

Harish Divekar | Oct 16, 2026, 07:00 IST
मध्य प्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट के फैसले के बाद सियासत तेज हो गई है।
News Strike: ओबीसी मामले पर हाईकोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी और प्रदेश सरकार का क्या स्टैंड है? सरकार इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। लेकिन उससे पहले ही दूसरे पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में नया पेंच फंसा दिया है। क्या सरकार के लिए इस पेंच की गिरह खोलना आसान होगा? जिस तरह सियासत गरमाई है, उससे नहीं लगता कि मामला आसानी से ठंडा हो जाएगा।

आरक्षण पर कोई भी फैसला लेना किसी पार्टी के लिए आसान नहीं

बीजेपी हमेशा से ही सवर्णों की ही पार्टी रही है। इसलिए जब बीजेपी की डबल इंजन सरकार बनी तो सवर्णों से जुड़े पोस्ट में भी उम्मीद नजर आने लगी कि अब शायद आरक्षण से राहत मिलेगी। आरक्षण पर कोई भी फैसला लेना किसी भी पार्टी के लिए बहुत आसान नहीं है। खासतौर से जब मामला वोट का आता है तो पार्टियों की प्रतिबद्धा थोड़ी डगमगा ही जाती है। वही बीजेपी के साथ भी हुआ। बीते कुछ सालों में बीजेपी भी आदिवासी, ओबीसी और ऐसे ही दूसरे पिछड़े वर्ग की सरकार और हितैषी बनने पर पूरा जोर लगा रही है। नतीजा ये हुआ कि सोशल मीडिया पर बीजेपी को सवर्णों के गुस्से का शिकार होना पड़ा।



क्या था 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला?

इस बीच ओबीसी आरक्षण (OBC Reservation) का मामला भी अदालत में चलता रहा और अब कुछ ही दिन पहले हाईकोर्ट की बेंच ने इस पर वो फैसला सुनाया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि 27 फीसदी आरक्षण सही नहीं है। इसके साथ ही नई और पुरानी नियुक्ति, होल्ड पद सबको लेकर विस्तृत फैसला सुनाया। 9 अक्टूबर के फैसले में अदालत ने 27 फीसदी आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी का आरक्षण 14 फीसदी ही रहेगा। साथ ही भर्ती प्रक्रिया के तहत रोके गए 13 फीसदी पदों को अनारक्षित वर्ग के योग्य लोगों से भरने के निर्देश भी दिए हैं।



फैसले पर कांग्रेस ने उठाए सवाल

अब इस फैसले पर सरकार का क्या रुख है इस पर सबकी नजर टिकी हुई है। ये फैसला जैसे ही आया कांग्रेस ने ओबीसी आरक्षण पर राजनीति चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ओबीसी आरक्षण बढ़ाने वाले तत्कालीन सीएम कमलनाथ ने कहा कि बीजेपी सरकार ओबीसी का आरक्षण बचाने में फेल हो गई है। साथ ही कहा कि सरकार ठीक तरह से पैरवी नहीं कर सकी। उन्होंने ये भी कहा कि ये ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का फैसला संवैधानिक तरीके से ही लिया गया था। इसकी रक्षा सरकार को करनी चाहिए थी। उन्होंने ये भी कहा कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीर है तो उसे तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख करना चाहिए।



विवेक तन्खा और उमंग सिंघार ने सरकार को घेरा

कांग्रेस के ही सीनियर लीडर, राज्यसभा सांसद और सीनियर अधिवक्ता विवेक तन्खा ने भी आरक्षण का मामला खारिज होने पर सरकार की तरफ से कमजोर पैरवी को जिम्मेदार ठहराया। नेताप्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने ये आरोप लगाए कि कोर्ट का हवाला देकर सरकार सिर्फ ओबीसी वर्ग को गुमराह कर रही है। अगर नीयत साफ है तो सरकार को विधानसभा का विशेष सत्र बुलवाना चाहिए। सिंघार ने सर्वदलीय बैठक का हवाला भी दिया और कहा कि कांग्रेस साफ कर चुकी है कि वो ओबीसी आरक्षण पर राजनीति नहीं करना चाहती। बल्कि इसे उनका हक मानकर उन्हें दिलाना चाहती है।



आंदोलन का ऐलान कर चुका है ओबीसी महासभा

इस मुद्दे पर ओबीसी महासभा भी चरणबद्ध आंदोलन का ऐलान कर चुकी है। ओबीसी पक्ष भी इस मुद्दे पर खुद सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की बात कह चुका है। सरकार की तरफ से खबर है कि अब प्रदेश सरकार नहीं भाजपा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में ये केस लड़ा जाएगा। इस मुद्दे पर विवेक तन्खा ने पोस्ट किया है कि अध्यादेश या कानून को डिफेंड करना सरकार की जिम्मेदारी है। इस मामले में मप्र सरकार क्यों दूरी बना रही है ये समझ से परे है।



उन्होंने ये भी लिखा है कि हाईकोर्ट में बहस सरकार ने की थी बीजेपी ने नहीं। इस फैसले ने कांग्रेस को मुद्दा दिया है पर बीजेपी ने ये फैसला क्यों लिया होगा। मप्र सरकार जो बीजेपी की ही है वो सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे में उलझना क्यों नहीं चाहती है। क्या बीजेपी को लगता है कि इस मामले में पक्षकार बन कर वो ओबीसी की ज्यादा हितैषी नजर आएगी? अगर ऐसा है तो शायद ये थॉट भी गलत है। क्योंकि सवर्णों ने इस मुद्दे पर अलग राग छेड़ दिया है।



खुद को जर्नलिस्ट बताने वाले अजीत भारती ने ट्वीट किया है कि बीजेपी सोच समझ कर प्रतिभा के सामूहिक हत्याकांड का प्रयास कर रही है। उन्होंने ये भी लिखा कि कांग्रेस का डर दिखा कर बीजेपी वो सारे काम कर रही है जो न तो अखिलेश ने किए न कांग्रेस ने किए।



अजीत भारती ने ट्वीट किया

यूथ फॉर इक्विलिटी का पक्ष सुना जाएगा!

इस मुद्दे पर यूथ फॉर इक्विलीटी ने भी सुप्रीम कोर्ट में केविएट दायर कर दी है। जिसके मायने ये हैं कि सरकार या ओबीसी पक्ष की ओर से कोई भी सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के इस आदेश पर स्टे लेने जाता है तो सबसे पहले यूथ फॉर इक्विलिटी का पक्ष सुना जाएगा। उस पर सीधे स्टे नहीं मिल सकता है।



इसे देखते हुए लगता है कि एमपी में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर सियासी मुद्दा बन सकता है। हो सकता है प्रदेश सरकार ने सवर्ण वोटों को देखते हुए इस मुद्दे से दूरी बनाना मुनासिब समझा और बीजेपी मास्टर स्ट्रोक मान कर खुद इस मुद्दे की पैरवी के लिए आगे आई। अगर जरा सी भी चूक हुई तो ये संभव है कि ओबीसी वर्ग की नाराजगी भी झेलना पड़े और सवर्णों का बड़ा तबका भी बीजेपी से नाराज हो जाए।

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