News Strike : ओबीसी आरक्षण पर राहत की खबर! सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या आसान होगी राह?
क्या अब ओबीसी आरक्षण के लिए अब सिर्फ अदालत से ही उम्मीद रखी जा सकती है। पिछले कुछ सालों से ओबीसी वर्ग लगातार 27 फीसदी आरक्षण के लिए कोशिशें कर रहा है, लेकिन हर बार मामला कहीं न कहीं अटक ही जाता है। पर इस बार अदालत ने खुद ही इस मामले में पर एक कदम आगे बढ़ाया है। यानी अब तक सरकार से जो नाउम्मीदी थी, वो अदालत की पहल से उम्मीद में बदलती नजर आ रही है। सोशल मीडिया पर भी हैशटैग एमपीटीईटी 2020 ओबीसी पद अनहोल्ड करो ट्रेंड कर रहा है। टीईटी यानी कि शिक्षक पात्रता परीक्षा। चलिए समझाता हूं ताजा डेवलेपमेंट क्या है और क्यों एक बार फिर उम्मीद की नई किरण नजर आने लगी है।
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कमलनाथ सरकार ने बढ़ाया था ओबीसी आरक्षण
ओबीसी आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही एक पहल की है, जो इस वर्ग को नई उम्मीद बंधा रही है। आप अगर इस मुद्दे से पूरी तरह वाकिफ हैं तो ये जानते ही होंगे कि ओबीसी आरक्षण से जुड़ी जितनी भी याचिकाएं थीं वो सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को वापस भेज दी थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने दो याचिकाओं को दोबारा सुनवाई के लिए बुलवाया है। टेक्निकल भाषा में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने दो याचिकाओं को खुद ही रिकॉल किया है।
इस विवाद का छोटा सा इतिहास आपको बता देता हूं। मप्र में ओबीसी आरक्षण पहले 14 फीसदी था। 2018 में कमलनाथ सरकार बनी, इस सरकार ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ा कर 28 फीसदी कर दिया। लेकिन ये पूरी तरह लागू हो पाता उससे पहले ही करीब 103 याचिकाएं अदालत में लग गईं और इस फैसले को चुनौती दे डाली।
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50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता आरक्षण
याचिकाओं में कुछ पुराने केस का हवाला देकर ये कहा गया कि कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। लेकिन कमलनाथ सरकार का फैसला लागू हुआ तो आरक्षण पचास परसेंट से ज्यादा हो जाएगा, जिसके बाद नए फैसले पर रोक लगी। इसमें कुछ पेंच भी फंसे। प्रमोशन में आरक्षण पर भी मामले उलझे। हालात ये बने कि खुद को ओबीसी हितैषी साबित करने के लिए बाद की सरकार खुद 54 याचिकाएं लेकर हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट चली गईं। सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चली, लेकिन कोई भी फैसला देने की जगह सुप्रीम कोर्ट ने सारी याचिकाओं को वापस मप्र के हाईकोर्ट में ही ट्रांसफर कर दिया। उन्हीं 54 याचिकाओं में से दो याचिकाओं को सर्वोच्च अदालत ने खुद रिकॉल किया है।
ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने सुप्रीम अदालत में रिव्यू याचिका लगाई थी, जिस पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दो याचिकाओं को रिकॉल किया। ये दो याचिका हैं दीपक कुमार पटेल बनाम मप्र शासन और हरिशकर बरोदिया बनाम मप्र शासन। इन दो मामलों की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट में होगी।
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दो याचिकाओं की सुनवाई से जागी उम्मीद
बेशक मामला अभी सुनवाई की स्टोज पर ही है, पर ये उम्मीद की किरण इसलिए है क्योंकि अगर फैसला किसी याचिकाकर्ता के पक्ष में गया तो उसे आधार बनाकर दूसरे पक्ष भी अपने मामले को थोड़ा ज्यादा बेहतर बना सकते हैं और पूरी दमदारी से अदालत में अपना पक्ष भी रख सकते हैं। इस बीच हाईकोर्ट ने भी अगली सुनवाई के लिए दो अप्रैल की तारीख मुकर्रर की है यानी कि कल.... कल सभी हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखें और 16 अप्रैल को फाइनल फैसला सुनाया जाएगा।
सरकार से ज्यादा कोर्ट पर भरोसा -पटेल
ये फैसला आते ही कांग्रेस के पूर्व विधायक शैलेंद्र पटेल ने एक वीडियो जारी कर कहा कि सरकार से ज्यादा इस मामले में अब अदालत पर भरोसा करना मुनासीब होगा। पटेल खुद प्रदेश ओबीसी कमीशन का हिस्सा रह चुके हैं। उन्होंने अपने वीडियो में प्रदेश सरकार को ओबीसी विरोधी बताया। उन्होंने कहा कि 13 फीसदी आरक्षण को होल्ड रखना पिछड़े वर्ग की अनदेखी ही कही जा सकती है। उन्होंने ये सवाल भी उठाया कि क्या ओबीसी युवाओं के सपनों का सहारा अब अदालत ही बन सकेगी।
87-13 का फॉर्मूले में 13 फीसदी पदों को भर पाना मुश्किल
हालांकि मप्र सरकार भी इस फैसले को एडजस्ट करने की पूरी कोशिश करती रही है। इसका एक हल जो निकाला गया वो था 87-13 का फॉर्मूला। इस फॉर्मूले को थोड़ा आसान तरीके से समझाता हूं। मान लीजिए सरकार 100 पदों पर भर्ती करती है, ये सभी सौ नई भर्तियां ओबीसी वर्ग से ही जुड़ी हुई हैं। इन सौ में से 87 पदों पर पुराने आरक्षण नियमों के अनुसार भर्ती होगी। 13 फीसदी भर्तियां इस शर्त के साथ होती हैं कि यदि अदालत का फैसला ओबीसी आरक्षण के खिलाफ आता है तो उन लोगों को नौकरियां छोड़नी होंगी। इस शर्त की वजह से 13 फीसदी पदों को भर पाना ही मुश्किल हो गया है।
ओबीसी वर्ग के लोगों की नजरें अदालत पर टिकी
इस मामले पर भी ओबीसी वर्ग के लोगों की नजरें अदालत पर ही टिकी हैं। क्या 16 अप्रैल को हाईकोर्ट इन सारे मामलों पर फाइनल डिसिजन सुना देगा। क्या ओबीसी वर्ग ये उम्मीद बांधकर रख सकता है कि उसे हाईकोर्ट से झटका नहीं मिलेगा।
पर दोनों ही सूरतों पर अदालत में याचिकाओं की बाढ़ आना तय है। क्योंकि फैसला अगर आरक्षण के खिलाफ आता है तो ओबीसी वर्ग के लोग उसे चुनौती देंगे और आरक्षण के पक्ष में आता है तो रिजर्वेशन का लाभ न उठा पाने वाले समुदाय उस फैसले को चुनौती देंगे।
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बीजेपी के लिए आगे कुंआ पीछे खाई
कांग्रेस भी सरकार पर लगातार इच्छाशक्ति की कमी का आरोप लगा रही है। विपक्ष के लिए मुद्दा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि आरक्षण लागू करने का फैसला कांग्रेस की ही कमलनाथ सरकार ने लिया था। दूसरा ओबीसी वर्ग कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक रहा है। हालांकि पिछले चुनावों में कांग्रेस इस मुद्दे को भुना नहीं पाई, न ही लाभ ले पाई है तो क्या आने वाले चुनाव में कांग्रेस को इसका फायदा मिल पाएगा। और अगर अदालत ने ओबीसी के पक्ष में फैसला सुना दिया तो क्रैडिट बीजेपी ले सकती है। पर उसके बाद खतरा सवर्णों के छिटक जाने का होगा यानी बीजेपी के लिए तो दोनों ही स्थिति में आगे कुंआ पीछे खाई वाले हालात हैं।