NEWS STRIKE: एमपी में छात्रसंघ चुनाव पर हाईकोर्ट का फैसला, क्या खत्म होगा युवा नेतृत्व का सूखा?
उसके धीरे-धीरे खत्म होने की उम्मीद अब नजर आने लगी है। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव कराने के लेकर हाईकोर्ट का एक बड़ा फैसला आया है। जो इस उम्मीद का कारण बना है।
क्या बीजेपी-कांग्रेस में खत्म हो रही युवा नेताओं की नई पीढ़ी?
राजनीति के जो चंद नाम है वो यकीनन चौंकाने वाले हो सकते हैं। शिवराज सिंह चौहान और जीतू पटवारी जैसे अनुभवी नेताओं के साथ अभिजीत दीपके और नेहा बोरा का नाम क्यों लिया जा रहा है। इस लिस्ट को किसी पार्टी या किसी एजेंडा से जोड़ कर मत देखिए। मैंने जो नाम लिए उसमें दो मैच्योर और जाने माने राजनेता हैं। जबकि दो ऐसे नेता हैं जो नए-नए यूथ आईकॉन बने हैं।
जेन जी के लिए मिसाल भी बन रहे हैं। सवाल ये है कि जब कांग्रेस बीजेपी के पास शिवराज और जीतू जैसे नेता हैं, लेकिन अभिजीत दीपके, सौरभ दास या नेहा बोरा जैसा नेता क्यों नहीं हैं। क्या इसकी वजह छात्रसंघ चुनाव हैं? जिसका रास्ता अब तक पॉलिटिकल दलों ने ही रोका हुआ था। लेकिन अदालत के फैसले से अब इन चुनावों को लेकर नई उम्मीद बंधती दिख रही है।
आप इन युवा नेताओं को पसंद करें या न करें। ये सच है कि ये यूथ आईकॉन बन चुके हैं। ये अपनी पॉलिटिकल अप्रोच में या अपने मुद्दों को लेकर कितना सही हैं या गलत हैं। ये अलग चर्चा का विषय है। देश के बड़े राजनीतिक दलों के पास ऐसे नेताओं की कमी क्यों हैं। क्या इसलिए क्योंकि छात्र राजनीति पर इन्हीं नेताओं ने पाबंदियां लगाईं।
शिवराज से जीतू पटवारी तक...
बीजेपी-कांग्रेस इन दोनों दलों के कितने ही आला नेता ऐसे हैं जिन्होंने कॉलेज के समय से ही पॉलिटिक्स शुरू कर दी थी। मध्यप्रदेश की राजनीति की बात करें तो शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय, मौजूदा सीएम मोहन यादव, जीतू पटवारी, सज्जन सिंह वर्मा, अर्चना चिटनिस जैसे कई नाम हैं। जो छात्र राजनीति से ही राजनीति में आ गए। सीधी भाषा में बोलूं तो नेतागिरी के गुण इन नेताओं में पढ़ते पढ़ते ही आ गए।
राजनीति का ककहरा कॉलेज से शुरू हो जाता है तो सियासत की राह काफी आसान हो जाती ही। भला देश का भी होता है क्योंकि मुद्दों को समझने वाले और उन पर पूरे कॉन्फिडेंस के साथ अपना पक्ष रखने वाले नेता राजनीति को मिलते हैं। इसके बाद मतदाताओं को सही नेता सिलेक्ट करना आसान हो जाता है। पिछले कई सालों अच्छे छात्र नेताओं की कमी सी हो गई है। क्या इसकी वजह छात्र संघ चुनावों का न होना है।
एक हत्याकांड और छात्र राजनीति पर सवाल
मप्र में छात्रसंघ चुनावों के दौरान हिंसा से जुड़े कई किस्से सामने आए जिसके बाद पहले इक्का दुक्का कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव बंद हुए और धीरे धीरे हर कॉलेज में चुनाव होना बंद होगे। साल 2017 से मप्र के कॉलेज और यूनिवर्सिटी में ये चुनाव नहीं हुए हैं। साल 2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर एचएस सभरवाल की हत्या हो गई। तब से इन चुनावों पर काफी गंभीर सवाल हुए और कैंपस में राजनीति और उससे जुड़ी हिंसा की जमकर आलोचना शुरू हुई। छात्र संघ चुनावों में धांधली की खबरें भी आती रही।
कैसे बदल गई छात्रसंघ की सियासत?
बीजेपी ने हालांकि छात्रसंघ चुनाव का स्वरूप काफी बदला भी पहले छात्रसंघ चुनाव भी आम चुनावों जैसे ही हुआ करते थे। छात्र नेता भरपूर प्रचार करते थे। मुद्दे बताते थे घोषणा पत्र भी बताते थे और वोटिंग से चुने जाते थे। इसके बाद में कॉलेज स्तर पर समितियां बनाई जाने लगीं। इन समितियों के सदस्यों का चुनाव होता था। उसके बाद समिति के सदस्य और सीआर मिलकर अलग अलग पदाधिकारी चुनते थे। साल 2017 के बाद चुनावों पर पूरी तरह पाबंदी लग गई। इसकी एक वजह कोरोना भी रहा।
क्या 75 दिनों में लौटेगी छात्र राजनीति?
अब पूरे नौ साल बाद छात्र संघ चुनाव होने का रास्ता साफ होता दिखाई दे रहा है। इंदौर हाईकोर्ट ने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में 75 दिनों के भीतर छात्रसंघ चुनाव कराने के निर्देश जारी किए हैं। इस फैसले के बाद अब यूनिवर्सिटी प्रशासन को चुनाव की प्रक्रिया और तैयारियां समय पर करवानी होंगी। एनएसयूआई के कार्यकर्ता अरूणेश मिश्रा ने इस संबंध में एक अवमानना याचिका दायर की थी।
याचिका में कहा गया था कि जबलपुर हाईकोर्ट सभी यूनिवर्सिटी को छात्र संघ चुनाव कराने के निर्देश दे चुका है। उसके बावजूद देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में चुनाव नहीं करवाए जा रहे हैं। इसे मिश्रा ने अदालत की अवमानना बताया था। आपको बता दूं कि जबलपुर हाईकोर्ट ने तीन अगस्त 2026 को छात्र संघ चुनाव कराने के लिए कहा था। इसी पर इंदौर बंच ने सुनावाई की और यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार और सक्षम प्राधिकारी को 5 नवंबर के बाद से 75 दिनों के भीतर चुनाव कराने के लिए कहा है।
नौ साल में निकल गई छात्रों की कई पीढ़ियां
अब आप जरा सोचिए नौ सालों से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं, जबकि ग्रेजुएशन तीन साल में पूरा हो जाता है पीजी किया तो दो साल और जोड़ लीजिए। इन नौ सालों में छात्रों की कितनी खेप पढ़ कर निकल चुकी होगी। अगर उनमें बेहतर राजनीति गुंजाइश रही होगी। तब भी उसका न दोहन हुआ न आंकलन ही हो सका होगा। मैं आपको पहले भी उन नेताओं के नाम गिना चुका हूं जो छात्र राजनीति से राजनीति में आए और अब पगे हुए और मंझे हुए नेता हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, अरूण जेटली, ममता बनर्जी, प्रफुल्ल कुमार महंत, नीतीश कुमार, सीपी जोशी, विजय गोयल, सुशील मोदी, वीपी सिंह, जाकिर हुसैन, आजम खान, डी राजा, सर्बानंद सोनोवाल, अलका लांबा जैसे ढेरों नाम हैं जो छात्र राजनीति से राजनीति में आए और अब देश के जाने माने नेता हैं। इसके साथ ही राजनीति की अच्छी समझ भी रखते हैं।
जेन जी को चाहिए नए नेता
अब जब आप छात्र नेता या जेन जी नेताओं की बात करते हैं तो ऐसे मुखर नेताओं के नाम पर आपको अभीजित दीपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका के नाम याद आते हैं। फिलहाल इनकी पॉलिटिकल अप्रोच, मुद्दे या राइट विंग लेफ्ट विंग की मैं बात नहीं कर रहा हूं। हम बात कर रहे हैं सिर्फ इनकी भाषण की स्किल्स और संघर्ष करने के माद्दे की।
जो जेन जी को अट्रेक्ट कर रहा है और एकजुट भी, लेकिन ऐसे नेता बीजेपी, कांग्रेस या दूसरे राजनीतिक दलों में नजर नहीं आते हैं। फिर क्यों अब तक छात्र संघ चुनाव कराने का इनिशिएटिव किसी पार्टी ने नहीं लिया। क्या सिर्फ हिंसा ही इसका एक मात्र वाजिब कारण है?
अगर हां तो फिर आम चुनावों का क्या किया जाए हिंसा से डरे तो शायद ही कोई और चुनाव हो सकेगा। इसलिए छात्र संघ चुनावों की अहमियत समझना जरूरी है। उसे सही तरीके से कराने और जारी रखने की कोशिश करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।