निर्मला सप्रे दलबदल केस, HC ने फैसला सुरक्षित रखा: स्पीकर को निर्देश देने पर बहस
समझें क्या है पूरा मामला
- हाईकोर्ट ने निर्मला सप्रे दलबदल मामले में फैसला सुरक्षित रखा।
- सरकार ने याचिका को राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज करने की मांग की।
- उमंग सिंघार पक्ष ने कहा - 90 दिन की जगह 2 साल बाद भी फैसला नहीं।
- सप्रे पक्ष ने फिर दावा किया “मैं अब भी कांग्रेस में हूं, भाजपा ज्वाइन नहीं की।”
- मुख्य विवाद इस बात पर रहा कि क्या हाईकोर्ट स्पीकर को समयसीमा तय कर निर्देश दे सकता है।
बीना विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल मामले में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मुख्य बहस इस बात पर केंद्रित रही कि क्या हाई कोर्ट विधानसभा स्पीकर को याचिका के निपटारे के लिए समयसीमा तय करने का निर्देश दे सकता है। दूसरी ओर, सप्रे पक्ष ने एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने भाजपा ज्वाइन ही नहीं की है और वह अब भी कांग्रेस की सदस्य हैं।
एक्टिंग चीफ जस्टिस की बेंच में हुई अहम सुनवाई
बीना विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल मामले में गुरुवार 18 जून को जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच में सुनवाई हुई। यह वही मामला है जिसमें नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के आधार पर निर्मला सप्रे की विधानसभा सदस्यता समाप्त किए जाने की मांग की है। कई महीनों से चल रही सुनवाई के बाद गुरुवार को हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
सरकार ने कहा- याचिका राजनीतिक उद्देश्य से दायर की गई
सुनवाई के दौरान विधानसभा अध्यक्ष और राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि यह याचिका पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है और इसे खारिज किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष मामले की सुनवाई जारी है और न्यायिक प्रक्रिया अपने स्तर पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
उमंग सिंघार पक्ष ने फिर उठाया 2 साल की देरी का मुद्दा
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल उपस्थित हुए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि निर्मला सप्रे सार्वजनिक मंचों से भाजपा में शामिल होने की घोषणा कर चुकी हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सोशल मीडिया अकाउंट, विभिन्न समाचार चैनलों और अन्य सार्वजनिक स्रोतों में भी उनके भाजपा में शामिल होने से संबंधित सामग्री उपलब्ध है, जिसे विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया जा चुका है।
खंडेलवाल ने कोर्ट से कहा कि यदि निर्मला सप्रे वास्तव में भाजपा में शामिल नहीं हुई हैं और अब भी कांग्रेस में हैं, तो फिर उनके खिलाफ लंबित दलबदल याचिका को खारिज क्यों नहीं किया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 90 दिनों की समयसीमा के बावजूद लगभग दो साल बाद भी निर्णय नहीं लिया जाना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने हाई कोर्ट से विधानसभा अध्यक्ष को तय समय में निर्णय लेने के निर्देश देने की मांग की।
सप्रे पक्ष का फिर दावा, भाजपा ज्वाइन नहीं की
सुनवाई के दौरान निर्मला सप्रे की ओर से पेश अधिवक्ता ने एक बार फिर यह दावा दोहराया कि सप्रे आज भी कांग्रेस की सदस्य हैं और उन्होंने भाजपा की औपचारिक सदस्यता ग्रहण नहीं की है। इससे पहले भी सप्रे पक्ष विधानसभा में कांग्रेस के व्हिप का पालन करने और पार्टी गतिविधियों में भाग लेने का हवाला देते हुए यही तर्क रख चुका है। इस दावे ने पूरे मामले को और अधिक जटिल बना दिया है।
स्पीकर को निर्देश देने की शक्ति पर हुई कानूनी बहस
मामले की सबसे महत्वपूर्ण बहस इस बात पर केंद्रित रही कि क्या हाई कोर्ट विधानसभा अध्यक्ष को किसी लंबित दलबदल याचिका पर तय समय के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दे सकता है। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने एस.ए. संपत कुमार प्रकरण का हवाला देते हुए कहा कि अदालतें सामान्यतः स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में सीधे हस्तक्षेप करने से बचती रही हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मध्यप्रदेश में ऐसी कोई असाधारण स्थिति नहीं है जिससे सरकार के बहुमत या विधानसभा की स्थिरता पर प्रभाव पड़ रहा हो।
इसके विपरीत उमंग सिंघार पक्ष ने केशव नेमचंद संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हाई कोर्ट को पूर्ण अधिकार है कि वह स्पीकर को लंबित मामलों के निपटारे के लिए समयसीमा निर्धारित कर सके, विशेषकर तब जब निर्धारित अवधि से कई गुना अधिक समय बीत चुका हो।
क्या है पूरा मामला?
सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे ने 5 मई 2024 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में भाजपा में शामिल होने की घोषणा की थी। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल कानून) के तहत उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग करते हुए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका दायर की। हालांकि सप्रे का कहना है कि वह आज भी कांग्रेस में हैं। लगभग दो वर्ष बीत जाने के बाद भी विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अंतिम निर्णय नहीं लिए जाने पर यह विवाद हाई कोर्ट तक पहुंचा।
अब निगाहें हाई कोर्ट के फैसले पर
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अदालत विधानसभा अध्यक्ष को समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश देगी या फिर मामले को पूरी तरह स्पीकर के विवेक पर छोड़ देगी। आने वाला फैसला न केवल निर्मला सप्रे के राजनीतिक भविष्य बल्कि दलबदल मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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