एमपी में नकली बीज से करेला फसल तबाह, बीज कंपनी नुन्हेम्स पर FIR
News In Short
- धार और खरगोन के किसानों ने नवंबर 2025 में नुन्हेम्स कंपनी के बीज खरीदे थे।
- करेला की फसल में फल छोटे और पीले पड़कर गिरने लगे और उत्पादन चौपट हो गया।
- किसानों ने 17 फरवरी 2026 को शिकायत दर्ज कराई थी।
- कृषि वैज्ञानिकों ने पाया कि खराब क्वालिटी के बीज को प्रमाणित बताकर बेचा गया था।
- मनावर थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई है साथ ही रूबासटा बीज पर बैन के निर्देश दिए गए हैं।
News In Detail
नवंबर 2025 की बात है। मध्यप्रदेश के धार और खरगोन जिलों के किसानों ने अपनी जमीन में करेले के बीज और रोपे डाले थे। उम्मीद थी कि इस बार फसल अच्छी होगी। कर्ज लिया था, मेहनत लगाई थी, मौसम का इंतजार किया था। पर जब फसल आई तो दिल डूब गया।
करेले के फल छोटे निकले। पीले पड़ गए। पकने से पहले ही गिरने लगे। किसान समझ नहीं पाए कि आखिर हुआ क्या है। उन्होंने तो वही बीज खरीदे थे जो नर्सरियों और कृषि सेवा केंद्रों पर प्रमाणित बताकर बेचे जा रहे थे।
धीरे- धीरे सच सामने आया
जब नुकसान हद से ज्यादा हो गया तब किसान एक साथ आए। 17 फरवरी 2026 को उन्होंने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय अधिकारियों की टीम ने खेतों का दौरा किया। जांच हुई तो नतीजा चौंकाने वाला था।
जांच में पाया गया कि जो बीज और रोपे किसानों को दिए गए थे वो खराब क्वालिटी थे। यानी उनकी गुणवत्ता तय मानकों पर खरी नहीं उतरती थी। पर उन्हें प्रमाणित बताकर बेचा गया था। यह किसानों के साथ सीधा धोखा था।
नुन्हेम्स इंडिया पर दर्ज हुई FIR
जांच पूरी होने के बाद प्रशासन हरकत में आया। धार जिले के मनावर थाने में एफआईआर दर्ज की गई। नुन्हेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद को आरोपी बनाया गया।
रूबासटा किस्म पर बैन के निर्देश
इस पूरे मामले में करेले की जिस किस्म के बीज को समस्या की जड़ माना गया वो है रूबासटा। इस किस्म के बीज पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए गए हैं। यह कदम इसलिए जरूरी था ताकि आगे और किसान इस तरह के नुकसान से बच सकें।
किसानों की मांग है कि उन्हें उचित मुआवजा मिले। उनकी पूंजी, मेहनत और जो फसल बर्बाद हुई, उसकी भरपाई हो। अधिकारियों को इस दिशा में काम करने के निर्देश दिए गए हैं।
बीज धोखाधड़ी की बड़ी कीमत
यह मामला अकेला नहीं है। देशभर में हर साल हजारों किसान नकली या खराब क्वालिटी के बीज की वजह से बर्बाद होते हैं। वो बीज खरीदते वक्त कंपनी पर भरोसा करते हैं। लेबल पढ़ते हैं। दुकानदार की बात मानते हैं। पर जब खेत में जाकर फसल नहीं उगती तब तक सब कुछ लुट चुका होता है।
धार और खरगोन के किसानों के साथ भी यही हुआ। उन्होंने नवंबर में बोया और फरवरी तक इंतजार करते रहे। जब हकीकत सामने आई तब जाकर शिकायत की और अब कानूनी लड़ाई का रास्ता खुला है।
जवाबदेही तय होना जरूरी है
इस पूरे प्रकरण में एक बात साफ निकलती है। खेती-किसानी के लिए जो भी सामग्री बाजार में बेची जाती है, चाहे बीज हो, खाद हो या कीटनाशक, उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी कंपनी की होनी चाहिए।
अगर कोई कंपनी अमानक सामग्री को प्रमाणित बताकर बेचती है, तो यह न सिर्फ कानूनी अपराध है, बल्कि एक किसान परिवार की पूरी साल की कमाई छीनने जैसा है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह मामला भारत के उस बड़े संकट की एक छोटी-सी झलक है जिसमें किसान हर साल नकली और अमानक बीज-कीटनाशकों की वजह से करोड़ों रुपए का नुकसान उठाते हैं।
बीज अधिनियम, 1966 और आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानून बने तो इसीलिए थे कि किसानों को इस तरह की धोखाधड़ी से बचाया जा सके।
पर जमीन पर इनका पालन कितना होता है, यह मामला उस सवाल को फिर से खड़ा करता है। संवैधानिक दृष्टि से किसान की आजीविका की सुरक्षा राज्य का दायित्व है। सामाजिक नैतिकता के पैमाने पर देखें तो एक कंपनी का झूठा लेबल किसी परिवार की पूरी उम्मीद को मिट्टी में मिला सकता है।
FAQ
- नुन्हेम्स इंडिया के खिलाफ कौन-सी धाराओं में FIR दर्ज हुई है?
मनावर थाना, धार में दर्ज एफआईआर क्रमांक 266 में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 318(4) और 324(5), आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 3 और 7, तथा बीज अधिनियम 1966 की धारा 19 के तहत मामला दर्ज किया गया है। कंपनी पर आरोप है कि उसने अमानक बीज को प्रमाणित बताकर किसानों को बेचा।
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