OBC-EWS छात्रों को वापस नहीं मिल रही लाखों की फीस, SC से राहत की उम्मीद
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश के OBC छात्र की फीस वापसी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।
- छात्र ने हरियाणा में MDS की पढ़ाई की थी।
- तीन साल की फीस करीब 21 लाख रुपए बताई गई है।
- राज्य सरकार ने करीब 84 हजार रुपए ही लौटाए।
- अंतिम फैसला हजारों OBC और EWS छात्रों को राहत दे सकता है।
यह मामला मध्य प्रदेश के OBC छात्र डॉ. दिनेश चंद्र पाटीदार से जुड़ा है। उन्होंने मध्य प्रदेश से BDS की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद हरियाणा के अंबाला में MDS में दाखिला लिया। MDS तीन साल का स्नातकोत्तर डेंटल पाठ्यक्रम है। छात्र के अनुसार फीस करीब सात लाख रुपए सालाना थी। इस हिसाब से तीन साल की कुल फीस करीब 21 लाख रुपए हुई।
केंद्र की योजना से पूरी फीस मिलने की उम्मीद थी
छात्र ने केंद्र की पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना का लाभ मांगा था। यह योजना OBC और EWS छात्रों से जुड़ी है। योजना में दूसरे राज्य में पढ़ने वाले छात्रों को फीस रीइंबर्समेंट प्रावधान है। ऐसे छात्रों को अपने मूल राज्य से लाभ मिलना था। इसी आधार पर छात्र ने मध्य प्रदेश से फीस मांगी। विवाद इस बात पर है कि कितनी रकम लौटाई जानी थी।
मध्य प्रदेश सरकार ने करीब 84 हजार रुपए दिए
छात्र ने मध्य प्रदेश के संबंधित विभाग में आवेदन किया था। उसने अपनी पढ़ाई की फीस वापस करने की मांग की। सरकार की ओर से सीमित राशि स्वीकृत की गई। हाई कोर्ट में सरकार ने 84,380 रुपए देने की बात कही। यह रकम दो शैक्षणिक सत्रों के लिए बताई गई थी। छात्र का दावा है कि उसे करीब 21 लाख रुपए की फीस प्रदेश सरकार के द्वारा वापस की जानी चाहिए।
सात लाख रुपए सालाना फीस ने बढ़ाया विवाद
सुप्रीम कोर्ट में रखी जानकारी के अनुसार फीस सात लाख रुपये सालाना थी। MDS पाठ्यक्रम तीन साल का था। इस हिसाब से फीस करीब 21 लाख रुपए बैठती है। छात्र ने इसी पूरी रकम की वापसी का दावा किया है। इसके मुकाबले सरकार की ओर से करीब 84 हजार रुपए दिए गए। इसी अंतर ने पूरे विवाद को बड़ा बना दिया। अब सुप्रीम कोर्ट में इसी मुद्दे पर सुनवाई हो रही है।
फीस वापसी का मामला पहले हाई कोर्ट पहुंचा
फीस नहीं मिलने के बाद छात्र ने हाई कोर्ट का रुख किया था। इस मामले में रिट याचिका क्रमांक 10655/2018 दर्ज हुई। मामला डॉ. दिनेश चंद बनाम भारत संघ एवं अन्य था। हाई कोर्ट ने 16 अप्रैल 2026 को आदेश दिया। पीठ में जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल शामिल थे। सरकार ने कोर्ट में भुगतान की जानकारी दी। इसके बाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने सरकार के भुगतान को माना था सही
हाई कोर्ट के सामने सरकार ने अपना जवाब दाखिल किया था। जवाब में 84,380 रुपए की राशि का उल्लेख था। सरकार ने बताया कि रकम बैंक में जमा की गई थी। कोर्ट ने यह भी देखा कि जवाब वर्ष 2018 में दाखिल हुआ था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया। कोर्ट को लगा कि वह भुगतान से संतुष्ट है। इसलिए कोर्ट ने याचिका में कुछ बाकी नहीं माना।
पुराने आदेश को चुनौती देने की अनुमति नहीं मिली
बाद में वरिष्ठ अधिवक्ता सांघी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश हुए। उन्होंने पुराने पत्र को चुनौती देने की अनुमति मांगी। हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने मामले में हुई देरी को भी अहम माना। अदालत के अनुसार अब मामला समय से बाहर हो चुका था। इसके बाद छात्र के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता बचा। अब वही विवाद सर्वोच्च अदालत के सामने है।
सुप्रीम कोर्ट में आदित्य सांघी ने संभाली पैरवी
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने छात्र की पैरवी की। उन्होंने पूरी फीस वापसी के मुद्दे को मजबूती से रखा। उनका कहना था कि छात्र को पूरी फीस का भरोसा दिया गया था। ऐसे में राज्य सरकार रकम कम नहीं कर सकती। उन्होंने करीब 21 लाख रुपये की फीस वापसी का दावा रखा। उनका तर्क केंद्र की योजना और उसके उद्देश्य पर आधारित था।
चर्चित अधिवक्ता ने OBC छात्र का केस लड़ा
अधिवक्ता आदित्य सांघी की भूमिका इस मामले में खास मानी जा रही है। वह सामान्य वर्ग की ओर से कई आरक्षण मामलों में पैरवी कर चुके हैं। प्रमोशन में आरक्षण के मामले में भी उन्होंने सामान्य वर्ग का पक्ष रखा है। इसी कारण उन्हें सामान्य वर्ग का चर्चित अधिवक्ता माना जाता है। लेकिन इस बार उन्होंने OBC छात्र की ओर से पैरवी की। उन्होंने छात्र की फीस का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया।
सांघी ने फीस कटौती के अधिकार पर उठाया सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता सांघी ने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि राज्य को योजना लागू करनी है। ऐसे में छात्र की फीस कम करना सही नहीं है। उनका कहना था कि छात्र को पूरी फीस मिलनी चाहिए। उन्होंने करीब 21 लाख रुपये की रकम का दावा किया। इस दलील पर अब केंद्र और राज्य को जवाब देना है।
गरीब और प्रतिभावान छात्रों का सवाल भी सामने आया
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को गरीब छात्रों से भी जोड़ा गया। क्योंकि यह योजना ओबीसी और ईडब्ल्यूएस दोनों छात्रों के लिए लागू है। ऐसे छात्रों के लिए महंगी मेडिकल पढ़ाई बड़ी चुनौती होती है। फीस लौटने की उम्मीद पर छात्र दूसरे राज्य जाते हैं। फीस नहीं मिलने पर परिवार पर बड़ा आर्थिक बोझ आता है। छात्रों को बैंक से कर्ज लेना पड़ सकता है। कर्ज पर ब्याज भी देना पड़ता है। कुछ छात्रों को पढ़ाई छोड़ने की स्थिति भी आ सकती है।
OBC और EWS छात्रों के लिए क्यों अहम है मामला
यह मामला केवल डॉ. दिनेश की फीस तक सीमित नहीं है। इसका असर योजना के तहत पढ़ने वाले छात्रों पर हो सकता है। खासकर OBC और EWS वर्ग के छात्रों पर इसका असर पड़ेगा। दूसरे राज्यों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए फीस बड़ा खर्च है। यदि सुप्रीम कोर्ट छात्र के पक्ष में फैसला देता है। तब ऐसे हजारों छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद बन सकती है।
अंतिम फैसला हजारों छात्रों के लिए राहत ला सकता है
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला इस मामले में अहम होगा। यदि पूरी फीस वापसी के पक्ष में फैसला आता है। तब समान स्थिति वाले छात्रों को भी फायदा मिल सकता है। OBC और EWS वर्ग के हजारों छात्रों को राहत मिलने की उम्मीद है। इससे फीस भुगतान को लेकर स्थिति साफ हो सकती है। दूसरे राज्यों में पढ़ने वाले छात्रों को भी फायदा मिल सकता है। हालांकि इसका वास्तविक असर अंतिम आदेश पर निर्भर करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अंतिम फैसला नहीं दिया है। कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया गया। भारत संघ से जवाब मांगा गया है। मध्य प्रदेश सरकार से भी जवाब मांगा गया है। भोपाल स्थित पिछड़ा वर्ग आयोग के आयुक्त को भी नोटिस मिला है। अब सभी पक्षों को अपना जवाब देना होगा।
साल 2014 से चल रहा है फीस वापसी का विवाद
डॉ. दिनेश का MDS में दाखिला वर्ष 2014 में हुआ था। इसके बाद फीस वापसी को लेकर विवाद शुरू हुआ। उन्होंने संबंधित विभाग से मदद मांगी थी। इसके बाद मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा था। हाई कोर्ट ने पहले अभ्यावेदन देने को कहा था। छात्र ने विभाग के सामने अपना आवेदन दिया। इसके बावजूद फीस का विवाद खत्म नहीं हुआ। अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।
दूसरे राज्यों में पढ़ने वाले छात्रों को भी उम्मीद
इस मामले की सबसे अहम कड़ी दूसरे राज्य में पढ़ाई है। छात्र मध्य प्रदेश का निवासी था। लेकिन उसकी MDS की पढ़ाई हरियाणा में हुई। योजना में ऐसे छात्रों के लिए प्रावधान बताया गया है। छात्र ने इसी प्रावधान के तहत फीस मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस नियम को साफ कर सकता है। इससे दूसरे राज्यों में पढ़ने वाले छात्रों को फायदा मिल सकता है।
केंद्र और मध्य प्रदेश के जवाब पर टिकी निगाहें
अब इस मामले में केंद्र और मध्य प्रदेश का जवाब अहम होगा। दोनों पक्षों को सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना है। संबंधित आयोग के अधिकारी से भी जवाब मांगा गया है। इसके बाद कोर्ट आगे की सुनवाई करेगा। छात्र की ओर से पूरी फीस का दावा जारी रहेगा। सरकार की ओर से दिए भुगतान का मुद्दा भी रहेगा। इन्हीं सवालों पर मामले की आगे की दिशा तय होगी।
OBC और EWS छात्रों को बड़ी राहत संभव
मामले का अंतिम फैसला हजारों छात्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर उन छात्रों के लिए जो OBC और EWS वर्ग से आते हैं। यदि पूरी फीस वापसी का रास्ता साफ होता है। तब समान स्थिति वाले छात्रों को राहत मिल सकती है। इससे महंगी मेडिकल पढ़ाई का आर्थिक दबाव कम होगा। छात्रों को कर्ज लेने की जरूरत भी कम हो सकती है। हालांकि लाभ का दायरा अंतिम फैसले से ही तय होगा।
अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी किया है। अब केंद्र और राज्य सरकार के जवाब आने बाकी हैं। इसके बाद कोर्ट पूरे विवाद पर आगे सुनवाई करेगा। छात्र की मांग करीब 21 लाख रुपए की फीस को लेकर है। सरकार पहले करीब 84 हजार रुपए दे चुकी है। इसी अंतर का कानूनी सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है। अंतिम फैसला OBC और EWS छात्रों के लिए अहम साबित हो सकता है।
यह खबरें भी पढ़ें...
जातीय जनगणना से पहले BJP का बड़ा दांव: सत्ता और संगठन में OBC की मैपिंग शुरू
OBC क्रीमी लेयर विवाद: IAS-IPS-IFS अफसरों के कैडर आवंटन पर SC 1 सितंबर को करेगा सुनवाई
जाति जनगणना पर राहुल-खड़गे का पीएम मोदी को पत्र, OBC कॉलम न होने पर किया सवाल
NGT का आदेश,केरवा-कलियासोत की सीमा होगी तय, वेटलैंड से अतिक्रमण हटाने के आदेश