27% OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को नियुक्ति के निर्देश

Neel Tiwari | Oct 09, 2026, 14:59 IST
ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले कानून को संविधान के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। यानी अब ओबीसी वर्ग को फिर से 14 फीसदी आरक्षण मिलेगा। इसके साथ ही 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।

तीन महीने में भरने होंगे 13% रोके गए पद

हाईकोर्ट ने MPPSC, कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) और दूसरी भर्ती एजेंसियों को तय समय में नियुक्तियां पूरी करने के निर्देश दिए हैं।



दरअसल, 29 सितंबर 2022 के बाद से सरकारी भर्तियों में 87-13 फीसदी का फॉर्मूला लागू था। इसके तहत 87 फीसदी पदों के नतीजे जारी किए जा रहे थे। वहीं 13 फीसदी पदों को होल्ड पर रखा गया था।



अब कोर्ट ने इन 13 फीसदी होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग के पात्र उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए अधिकतम तीन महीने का समय दिया गया है।



इस फैसले से उन उम्मीदवारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो लंबे समय से अपनी नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।



पहले से नियुक्त OBC अभ्यर्थियों की नौकरी सुरक्षित

हाईकोर्ट ने पहले से नौकरी पा चुके ओबीसी उम्मीदवारों को भी राहत दी है। कोर्ट के फैसले के मुताबिक मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के तहत नौकरी पाने वालों की नियुक्तियां रद्द नहीं होंगी। यानी उनकी नौकरी सुरक्षित रहेगी।



हालांकि, 29 सितंबर 2022 के बाद 14% से अधिक आरक्षण के आधार पर की गई नई नियुक्तियों को लेकर फैसले में अलग निर्देश दिए गए हैं। इस अवधि में 14% से अधिक OBC आरक्षण के तहत की गई नई नियुक्तियों को अमान्य माना जाएगा। भर्ती एजेंसियों को अदालत के निर्देशों के अनुसार आगे की कार्रवाई करनी होगी।



50% आरक्षण सीमा को लेकर क्या कहा हाई कोर्ट ने?

इस मामले में सबसे अहम मुद्दा आरक्षण की 50% सीमा था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल फैसलों का हवाला दिया। अदालत के अनुसार, इस सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों को ठोस तथ्यों से साबित करना जरूरी है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि प्रदेश में OBC आबादी लगभग 50 से 52% है।



अदालत ने स्पष्ट किया कि आबादी का बड़ा हिस्सा होना अपने आप में 50% की सीमा पार करने का आधार नहीं बन सकता। आरक्षण का आधार केवल जनसंख्या का अनुपात नहीं, बल्कि संविधान के अनुसार पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी है।



सरकार के पास नए आंकड़े नहीं, पुरानी रिपोर्ट पर उठे सवाल

OBC आरक्षण मामले की सुनवाई के दौरान 1982 की महाजन आयोग रिपोर्ट और बाद के आंकड़ों पर लंबी बहस हुई थी। सरकार ने बताया था कि आरक्षण बढ़ाने के प्रयास 2019 से पहले भी किए गए थे। लेकिन अदालत में यह सवाल उठा कि संशोधन के समय सरकार ने नए और पर्याप्त आंकड़ों का आकलन किया था या नहीं। OBC पक्ष ने आरक्षण बढ़ाने की जरूरत का समर्थन किया था। वहीं, सामान्य वर्ग की ओर से कानून की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। अंतिम फैसले में अदालत ने 27% आरक्षण के समर्थन में दिए गए आधारों को पर्याप्त नहीं माना।



सरकारी नौकरियों में OBC प्रतिनिधित्व पर भी गौर

हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी के आंकड़े भी देखे। कोर्ट के फैसले में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी करीब 28.16 फीसदी थी। वहीं प्रथम श्रेणी यानी बड़े अधिकारी स्तर की नौकरियों में यह हिस्सेदारी सिर्फ 9.55 फीसदी बताई गई।



कोर्ट ने खाली पड़े सरकारी पदों पर भी ध्यान दिया। आंकड़ों के मुताबिक ओबीसी वर्ग के लिए कुल 1 लाख 69 हजार 304 पद स्वीकृत थे। इनमें से करीब 51.17 फीसदी पद खाली पड़े थे। वहीं प्रथम श्रेणी की नौकरियों में 68.24 फीसदी पद खाली बताए गए।



कोर्ट ने माना कि ओबीसी वर्ग की कम हिस्सेदारी की वजह सिर्फ आरक्षण का प्रतिशत नहीं है। इसकी एक वजह बड़ी संख्या में सरकारी पदों का खाली रहना भी हो सकती है।



यानी कोर्ट के मुताबिक सिर्फ आरक्षण बढ़ाना ही समाधान नहीं है। खाली पड़े पदों को भरना भी जरूरी है।



उच्च शिक्षा के आंकड़ों का भी किया गया विश्लेषण

हाईकोर्ट ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले ओबीसी छात्रों के आंकड़े भी देखे। इसके लिए ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजुकेशन (AISHE) 2021-22 की रिपोर्ट को आधार बनाया गया।



रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी करीब 39 फीसदी थी।



कोर्ट ने इन आंकड़ों को भी ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का मकसद पिछड़े वर्गों को पर्याप्त हिस्सेदारी देना है।



इसका मतलब यह नहीं है कि किसी वर्ग की आबादी जितनी है, उसे उतने ही प्रतिशत आरक्षण का हक मिल जाएगा।



यानी कोर्ट के मुताबिक आरक्षण तय करते समय सिर्फ आबादी नहीं, बल्कि उस वर्ग की मौजूदा हिस्सेदारी और दूसरे जरूरी तथ्यों को भी देखना होगा।



राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श का मुद्दा

फैसले में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श नहीं किए जाने का मुद्दा भी अहम रहा। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 338B और 102वें संविधान संशोधन के संदर्भ में इस पहलू पर विचार किया। फैसले के अनुसार, राज्य सरकार ने संशोधन से पहले राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से जरूरी परामर्श नहीं लिया था। अदालत ने कानून बनाने की प्रक्रिया में जल्दबाजी और तैयारी की कमी पर भी सवाल उठाए। इन कारणों ने संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता पर गंभीर असर डाला।



1994 के कानून से शुरू हुई थी आरक्षण की व्यवस्था

मध्य प्रदेश में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की शुरुआत 1994 के कानून से हुई थी। इसके तहत अनुसूचित जाति को 15%, अनुसूचित जनजाति को 18% और OBC वर्ग को 14% आरक्षण दिया गया था। बाद में राज्य सरकार ने OBC आरक्षण बढ़ाने के प्रयास किए। वर्ष 2003 में भी आरक्षण 27% करने की कोशिश हुई थी। उस प्रयास को हाई कोर्ट ने 2014 में रद्द कर दिया था। इसके बाद 8 मार्च 2019 को राज्य सरकार अध्यादेश लेकर आई। फिर 14 अगस्त 2019 को संशोधन कानून लागू हुआ। इससे सामाजिक आरक्षण का कुल प्रतिशत 63% हो गया था।



87-13% फॉर्मूले पर भी हुई थी लंबी बहस

इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान भर्ती में लागू 87-13% फॉर्मूले को भी चुनौती दी गई थी। OBC पक्ष ने कहा था कि 13% वाली सूची में केवल सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को जगह दी जा रही है। अदालत ने तब स्पष्ट किया था कि पहले 27% OBC आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई पूरी होगी। इसके बाद 87-13% फॉर्मूले पर पक्ष सुना जाएगा। अब अंतिम फैसले में अदालत ने रोके गए 13% पदों पर सामान्य वर्ग के पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।



90 से अधिक याचिकाओं पर आया फैसला

2019 के संशोधन कानून को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में 90 से अधिक याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें अशिता दुबे की याचिका भी शामिल थी। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने संशोधन कानून को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया। इस फैसले से प्रदेश में OBC आरक्षण की सीमा फिर 14% हो गई है। साथ ही भर्ती एजेंसियों को रोके गए पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया है।



HC का फैसला ऐतिहासिक, पूरे देश में पड़ेगा असर- अधिवक्ता आदित्य सांघी

सामान्य वर्ग की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता आदित्य सांघी ने हाईकोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उन्होंने कहा कि इस फैसले का असर सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर देश के दूसरे राज्यों में भी देखने को मिल सकता है।



सांघी के मुताबिक देश के बहुत कम हाईकोर्ट में अब तक ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों पर फैसला आया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी ही रहेगा।



उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण की 50 फीसदी सीमा तय की थी। बाद में जयश्री पाटिल मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस सीमा को लेकर स्थिति साफ की थी। कोर्ट के मुताबिक 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के लिए असाधारण परिस्थितियां साबित करना जरूरी है।



सांघी ने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार ऐसी परिस्थितियां साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही। सरकार यह नहीं बता सकी कि प्रदेश में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देना क्यों जरूरी है।



उन्होंने इस फैसले को मध्यप्रदेश सरकार के लिए बड़ी हार बताया। वहीं सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए इसे बड़ी राहत करार दिया।



सांघी ने दावा किया कि सरकार की योजना पूरी तरह लागू होती तो ईडब्ल्यूएस आरक्षण मिलाकर कुल आरक्षण 74 फीसदी तक पहुंच सकता था।



उन्होंने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की एक टिप्पणी का भी जिक्र किया। सांघी के मुताबिक आंबेडकर ने जरूरत से ज्यादा आरक्षण के कारण उल्टे भेदभाव की आशंका जताई थी।



सांघी ने आरक्षण को लेकर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप भी लगाया। उनका कहना है कि इस राजनीति के कारण योग्यता को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने इसे देश की प्रगति में बाधा बताया।



महाधिवक्ता प्रशांत सिंह बोले- 13% होल्ड पद तीन महीने में भरने के निर्देश

महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने इस मामले की पूरी जानकारी मीडिया के साथ साझा की। उन्होंने बताया कि कोर्ट के निर्देश के बाद 13% होल्ड पद अगले तीन महीने में भरे जाने हैं।



द सूत्र ने महाधिवक्ता से सवाल किया कि क्या कोर्ट के निर्देश के बाद 13% होल्ड पदों पर नियुक्तियां शुरू होंगी या सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है?



इस सवाल पर महाधिवक्ता ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उन्होंने 159 पन्नों के विस्तृत आदेश का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि फिलहाल कोर्ट के आदेश का विश्लेषण किया जा रहा है। इसके बाद कोई नई स्थिति बनती है तो उसकी जानकारी भी दी जाएगी।



ओबीसी पक्ष के वकील बोले- फैसले में कई सवाल बाकी, सुप्रीम कोर्ट जाएंगे

ओबीसी वर्ग की ओर से अधिवक्ता पुष्पेंद्र शाह ने भी हाई कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि इस फैसले में अभी कई बातें स्पष्ट नहीं हैं। होल्ड पदों को किस तरह भरा जाएगा? अभ्यर्थियों को नियुक्तियां कैसे दी जाएंगी? ऐसे कई सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।



उन्होंने बताया कि ओबीसी पक्ष इस फैसले पर चर्चा कर रहा है। जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जाएगा।



अधिवक्ता शाह ने कहा कि 27% आरक्षण का अधिनियम सरकार ने बनाया था। ऐसे में सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।



OBC आरक्षण केस की पूरी टाइमलाइन

1. मार्च 2019- कमलनाथ सरकार ने बढ़ाया आरक्षण



तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का फैसला लिया। इसके लिए अध्यादेश का रास्ता अपनाया गया। यही इस कानूनी विवाद की शुरुआत बनी।



2. मार्च 2019 - फैसला हाईकोर्ट पहुंचा



आरक्षण बढ़ाने के खिलाफ मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल हुईं। खासकर शिक्षक भर्ती में बढ़े आरक्षण पर सवाल उठाए गए। अदालत ने संबंधित भर्ती में 27 फीसदी आरक्षण लागू करने पर अंतरिम रोक लगाई।



3. जुलाई 2019 - कानून के जरिए 27% आरक्षण



राज्य सरकार ने मध्यप्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 में संशोधन किया। ओबीसी आरक्षण बढ़ाने को वैधानिक आधार दिया गया। इसके बाद भी अदालत में चुनौती बनी रही।



4. 2020 - भाजपा सरकार बनी, विवाद जारी रहा



मार्च 2020 में मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने। सरकार बदलने के बाद भी आरक्षण का कानूनी विवाद समाप्त नहीं हुआ।



5. 2021 - आरक्षण और सरकारी भर्तियों पर विवाद बढ़ा



राज्य सरकार ने कानूनी अड़चनों के बीच भर्तियां आगे बढ़ाने का रास्ता तलाशा। 87:13 व्यवस्था चर्चा में आई। इसके तहत कई भर्तियों में 87 फीसदी परिणाम घोषित करने और विवादित 13 फीसदी हिस्से को अलग रखने की व्यवस्था अपनाई गई।



6. 2022 - 13 फीसदी होल्ड पद बड़ा मुद्दा बने



शिक्षक भर्ती सहित विभिन्न सरकारी भर्तियों में होल्ड पदों की समस्या बनी रही। चयनित और प्रतीक्षारत अभ्यर्थियों की नियुक्तियों को लेकर अनिश्चितता बढ़ी। अलग-अलग भर्ती मामलों में अदालती आदेशों का असर भी अलग था।



7. दिसंबर 2023 - मोहन यादव सरकार का गठन



मध्यप्रदेश में मोहन यादव मुख्यमंत्री बने। ओबीसी आरक्षण और अटकी नियुक्तियों का मामला नई सरकार के सामने भी बना रहा।



8. 2024–2025 - कानूनी लड़ाई और नियुक्तियों की मांग



ओबीसी आरक्षण को लेकर कानूनी विवाद जारी रहा। अभ्यर्थी होल्ड पदों पर स्पष्ट निर्णय की मांग करते रहे। राजनीतिक स्तर पर भी 27 फीसदी आरक्षण का मुद्दा उठता रहा।



9. 5 अगस्त 2026 - हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा



उपलब्ध केस विवरण के अनुसार जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा।



10. सितंबर–अक्टूबर 2026 - राहुल गांधी ने उठाया मामला



लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखा। उन्होंने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण लागू करने और होल्ड पदों पर निर्णय लेने की मांग की।



11. 9 अक्टूबर 2026 - हाईकोर्ट के फैसले की खबर



सामने आई ताजा जानकारी के मुताबिक हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के लिए सरकार के आंकड़ों को पर्याप्त नहीं माना है। कोर्ट ने 13 फीसदी होल्ड पदों को लेकर भी निर्देश दिए हैं। हालांकि इस फैसले का पूरा असर क्या होगा, यह हाईकोर्ट का लिखित आदेश सामने आने के बाद ही साफ हो पाएगा।

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