OBC आरक्षण से शुरू हुआ निकाय चुनाव विवाद: श्योपुर नपा केस में हाईकोर्ट सख्त, सरकार को भी फटकार
News in short
- OBC आरक्षण विवाद के बाद हुए निकाय चुनावों से जुड़ा मामला हाईकोर्ट में।
- श्योपुर नगरपालिका अध्यक्ष रेनू गर्ग के निर्वाचन पर कानूनी विवाद।
- जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया की कोर्ट ने सरकारी वकीलों के रुख पर जताई नाराजगी।
- महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश होकर मांगी माफी।
- बिना गजट नोटिफिकेशन के प्रदेश के करीब 395 नगर निकाय अध्यक्षों के अधिकारों पर संकट।
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मध्य प्रदेश में निकाय चुनाव के दौरान लागू किए गए OBC आरक्षण से शुरू हुआ विवाद अब बड़ा संवैधानिक और प्रशासनिक मुद्दा बनता जा रहा है। श्योपुर नगरपालिका अध्यक्ष के निर्वाचन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश होकर माफी मांगनी पड़ी और कोर्ट में सरकारी अधिवक्ता द्वारा दिए गए पिछले आवेदन को वापस लेना पड़ा। अदालत की टिप्पणियों के बाद अब यह मामला पूरे प्रदेश के सैकड़ों नगर निकायों को प्रभावित कर सकता है।
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OBC आरक्षण विवाद से कैसे शुरू हुआ पूरा मामला
मध्य प्रदेश में यह पूरा विवाद वर्ष 2022 के निकाय चुनावों से जुड़ा हुआ है। उस समय नगर निकाय चुनावों में 27 फीसदी OBC आरक्षण देने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य निर्वाचन आयोग को जल्दबाजी में चुनाव कराना पड़ा। नगर निगमों में महापौर का चुनाव सीधे जनता द्वारा कराया गया, जबकि नगर पालिका और नगर परिषद के अध्यक्षों का चुनाव पार्षदों के माध्यम से कराया गया।
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चुनाव तो हुए, लेकिन नोटिफिकेशन नहीं हुआ
निकाय चुनाव संपन्न होने के बाद नगर निगमों के महापौर और पार्षदों के परिणामों का औपचारिक गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया था। इसी तरह नगर पालिका और नगर परिषद के पार्षदों के परिणाम भी घोषित कर दिए गए।
लेकिन पार्षदों द्वारा चुने गए कई नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के निर्वाचन का औपचारिक नोटिफिकेशन नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा जारी नहीं किया गया। इसी कारण अब अदालतों में यह सवाल उठ रहा है कि बिना नोटिफिकेशन के क्या ऐसे अध्यक्ष अपने अधिकारों का उपयोग कर सकते हैं।
श्योपुर नगरपालिका अध्यक्ष विवाद से मामला बना बड़ा मुद्दा
श्योपुर नगरपालिका अध्यक्ष रेनू गर्ग के निर्वाचन से जुड़े विवाद ने इस पूरे मामले को नई दिशा दे दी। अदालत में यह तर्क दिया गया कि जब अध्यक्ष के चुनाव का राजपत्र प्रकाशन नहीं हुआ, तो चुनाव याचिका भी दाखिल नहीं की जा सकती। इसी तर्क के आधार पर मामला हाईकोर्ट पहुंचा और अध्यक्ष के अधिकारों पर कानूनी सवाल खड़े हो गए।
हाईकोर्ट ने पहले ही लगा दी थी अंतरिम रोक
अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि यदि सरकार यह मानती है कि बिना गजट नोटिफिकेशन के चुनाव याचिका नहीं लग सकती, तो फिर बिना नोटिफिकेशन के अध्यक्ष ने पदभार कैसे ग्रहण किया। इसके बाद अदालत ने श्योपुर नगरपालिका अध्यक्ष रेनू गर्ग को अध्यक्ष के रूप में काम करने से अंतरिम रूप से रोक दिया था। तब से यह मामला अदालत में लगातार सुनवाई के अधीन है।
कमिश्नर की जांच रिपोर्ट पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
मामले में उस समय नया मोड़ आया जब चंबल संभाग के कमिश्नर ने श्योपुर के तत्कालीन कलेक्टर, जो उस समय निर्वाचन अधिकारी भी थे, को क्लीन चिट दे दी।
हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए कहा कि यह जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। अदालत ने इसे “आईवॉश” और “धोखाधड़ी” जैसी कठोर टिप्पणी के साथ खारिज करते हुए पूरे मामले की जांच मुख्य सचिव को सौंप दी।
बिना सरकार के परामर्श के काम कर रहे हैं शासकीय अधिवक्ता
दरअसल, इस मामले की पहले हुई सुनवाई के दौरान शासकीय अधिवक्ता ने आपत्ति दर्ज की थी। शासकीय अधिवक्ता के अनुसार इस निर्वाचन का राजपत्र प्रकाशन जारी नहीं हुआ था। तो इस तरह से इसके खिलाफ लगाई गई याचिका को समय पूर्व बताया गया। लेकिन यहां पर सवाल यह खड़ा हो गया कि यदि याचिका समय पूर्व है तो फिर बिना राजपत्र प्रशासन के नगरीय निकाय में अध्यक्ष काम कैसे कर रहे हैं।
इसके बाद सरकार ने शासकीय अधिवक्ता की आपत्ति से अपने हाथ खींच लिए और कहा कि यह आपत्ति लगने के पहले शासकीय अधिवक्ता ने कोई विमर्श नहीं किया था। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकारी अधिवक्ताओं द्वारा दी दलीलें और फिर सरकार के इससे पीछे हटने पर नाराजगी जताई।
जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया ने महाधिवक्ता से सीधे सवाल करते हुए कहा, “क्या आपके शासकीय अधिवक्ता आपके नियंत्रण में नहीं हैं?” अदालत ने कहा कि एक ही मामले में विरोधाभासी रुख अपनाना न्यायिक प्रक्रिया के साथ गंभीर लापरवाही है।
महाधिवक्ता को मांगनी पड़ी माफी
अदालत के सख्त रुख को देखते हुए राज्य के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में शामिल होना पड़ा।-
उन्होंने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि court में जो “समयपूर्व याचिका” वाली आपत्ति ली गई थी, वह सरकार का आधिकारिक रुख नहीं था। इसके साथ ही उन्होंने अदालत से मौखिक माफी मांगते हुए उस आपत्ति को वापस लेने की बात कही।
कोर्ट की चेतावनी- पूरे प्रदेश में खड़ा हो सकता है संकट
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि सरकार यह मानती है कि बिना गजट नोटिफिकेशन के अध्यक्ष अधिकार नहीं चला सकते, तो इसका असर पूरे प्रदेश के नगर निकायों पर पड़ेगा। जस्टिस अहलूवालिया ने कहा कि यदि अदालत ने इसी आधार पर फैसला दिया, तो प्रदेश में बड़ा प्रशासनिक संकट खड़ा हो सकता है।
दो निकायों में पहले ही खत्म हो चुके हैं अधिकार
अदालत के आदेश के बाद श्योपुर नगरपालिका और पानसेमल नगर परिषद में अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार पहले ही समाप्त माने जा चुके हैं।
इन निकायों में फिलहाल प्रशासनिक जिम्मेदारी सीएमओ या एसडीएम के माध्यम से संचालित की जा रही है, जबकि डबरा नगरपालिका से जुड़ा मामला अभी भी न्यायालय में लंबित है।
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395 नगर निकाय अध्यक्षों पर पड़ सकता है असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत ने बिना गजट नोटिफिकेशन वाले अध्यक्षों के अधिकारों को अमान्य माना, तो इसका असर पूरे प्रदेश पर पड़ सकता है।
प्रदेश में करीब 395 नगर निकाय अध्यक्ष ऐसे बताए जा रहे हैं जिनके निर्वाचन का औपचारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ। इनमें लगभग 98 नगर पालिकाएं और 297 नगर परिषदें शामिल हैं। ऐसे में इस मामले का अंतिम फैसला प्रदेश की स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।