One Bar One Vote विवाद: हाईकोर्ट अधिवक्ता संघ की मतदाता सूची को हाईकोर्ट में चुनौती
समझें क्या है पूरा मामला...
- जबलपुर हाईकोर्ट एडवोकेट बार एसोसिएशन समिति की अनंतिम मतदाता सूची को चुनौती दी गई है।
- याचिका में One Bar One Vote नियम के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
- कई मृतक और गैर-प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ताओं के नाम सूची में होने का दावा है।
- निर्वाचन प्रक्रिया और मतदाता सूची तैयार करने के तरीके पर भी सवाल उठे हैं।
- याचिका में चुनाव पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की गई है।
हाईकोर्ट एडवोकेट बार एसोसिएशन समिति चुनाव पर बड़ा कानूनी विवाद
जबलपुर में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट एडवोकेट बार एसोसिएशन समिति के चुनाव से पहले नया विवाद सामने आया है। आगामी कार्यकाल 2026-2028 के लिए जारी अनंतिम मतदाता सूची अब हाईकोर्ट पहुंच गई है। इस सूची को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि पूरी प्रक्रिया तय नियमों के अनुसार नहीं अपनाई गई।
याचिका अधिवक्ता आलोक कुमार गुप्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की है। इसमें मतदाता सूची रद्द करने और नई प्रक्रिया से सूची तैयार कराने की मांग की गई है।
दरअसल, जबलपुर हाईकोर्ट में हाई कोर्ट बार एसोसिएशन पुराना संगठन है और इसके बाद हाईकोर्ट एडवोकेट बार एसोसिएशन समिति का रजिस्ट्रेशन बार के तौर पर हुआ। यहां मुख्य विवाद यह है कि जब नए बार को एक अलग संगठन का दर्जा मिल चुका है तो फिर उसके सदस्य अन्य बार में वोटिंग कैसे कर सकते हैं।
मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर उठे सवाल
याचिका में कहा गया है कि अधिवक्ता संघ की मौजूदा कार्यकारिणी का कार्यकाल 23 मई 2026 को समाप्त हो चुका था। चुनाव नियमों के अनुसार कार्यकाल खत्म होने से 45 दिन पहले निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति जरूरी थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसा नहीं किया गया। इसके बाद भी 10 जुलाई 2026 को अनंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई। उनका दावा है कि इससे पूरी चुनाव प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।
सत्यापन नहीं होने का भी लगाया गया आरोप
याचिका में मतदाता सूची के सत्यापन पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के 2015 के सत्यापन नियमों का पालन नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार सूची में कई मृतक अधिवक्ताओं के नाम अब भी मौजूद हैं। कई ऐसे अधिवक्ता भी सूची में शामिल बताए गए हैं जो अब नियमित प्रैक्टिस नहीं करते। याचिका में यह भी कहा गया है कि पिछले करीब दस वर्षों से मतदाताओं का समुचित सत्यापन नहीं हुआ। इससे मतदाता सूची की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है।
सदस्यता शुल्क को लेकर भी उठे सवाल
याचिका में नए सदस्यों की सदस्यता प्रक्रिया पर भी आपत्ति दर्ज की गई है। आरोप है कि सदस्यता शुल्क नकद लिया गया, जबकि पारदर्शिता के लिए बैंक या डिजिटल माध्यम अपनाया जाना चाहिए था। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव जैसी प्रक्रिया में हर कदम पारदर्शी होना जरूरी है। इसलिए इस पहलू की भी जांच कराई जानी चाहिए।
क्या है One Bar One Vote का नियम
इस मामले का सबसे अहम मुद्दा One Bar One Vote सिद्धांत है। इसका मतलब है कि एक अधिवक्ता केवल एक बार एसोसिएशन में ही मतदान कर सकता है। याचिका में दावा किया गया है कि कई अधिवक्ता पहले से दूसरे बार एसोसिएशन की मतदाता सूची में दर्ज हैं। इसके बावजूद उनके नाम हाईकोर्ट अधिवक्ता संघ की सूची में भी बने हुए हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे एक व्यक्ति को एक से अधिक जगह मतदान का अधिकार मिल सकता है। यह सुप्रीम कोर्ट के तय सिद्धांत के खिलाफ है।
SC और HC के फैसलों का दिया गया हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया गया है। इन फैसलों में वन बार वन वोट सिद्धांत को मान्यता दी गई थी। इसके अलावा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के वर्ष 2016 और वर्ष 2024 के फैसलों का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा मतदाता सूची इन फैसलों की भावना के अनुरूप नहीं है।
आपत्ति देने के बाद भी नहीं मिला फैसला
याचिकाकर्ता का कहना है कि उन्होंने 14 जुलाई 2026 को विस्तृत लिखित आपत्ति दी थी। इसमें सभी बिंदुओं को विस्तार से रखा गया था। उनका दावा है कि अब तक उस आपत्ति पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसी कारण उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया है कि वह आगामी चुनाव में सचिव पद के संभावित उम्मीदवार हैं।
हाईकोर्ट से क्या मांग की गई
याचिका में अदालत से कई महत्वपूर्ण निर्देश देने की मांग की गई है। सबसे पहले नई प्रक्रिया से निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करने की मांग की गई है। इसके अलावा विवादित मतदाता सूची वापस लेने की मांग भी की गई है। 2015 के नियमों के अनुसार विशेष सत्यापन अभियान चलाने की भी मांग रखी गई है। याचिका में दोहरे मतदाताओं, मृतक अधिवक्ताओं और अपात्र नामों को सूची से हटाने का अनुरोध किया गया है। साथ ही अंतिम फैसला आने तक चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाने की भी मांग की गई है।
फिलहाल सुनवाई की तारीख तय नहीं
इस मामले में अभी तक सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हो चुकी है। अब अदालत के अगले आदेश पर आगे की प्रक्रिया निर्भर करेगी। यदि अदालत इस मामले में नोटिस जारी करती है, तो अधिवक्ता संघ चुनाव की प्रक्रिया पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
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