शादी के बाद से ही पति की 25% इनकम पर पत्नी का हक, भरण पोषण में नहीं होगा मोलभाव
समझें क्या है पूरा मामला...
- पति की आय ₹1.50 लाख मानी गई, लेकिन पत्नी को ₹30 हजार मिले।
- सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पति की शुद्ध आय का 25% अहम आधार है।
- हाई कोर्ट ने कहा, ₹30 हजार तय करने का कारण बताना जरूरी था।
- पति ने सैलरी स्लिप देने का वादा किया, लेकिन दस्तावेज नहीं दिया।
- हाई कोर्ट ने आदेश रद्द कर भरण-पोषण फिर तय करने भेजा।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पत्नी भरण-पोषण मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने पति की आय और पत्नी के हिस्से पर सवाल उठाया। मामले की सुनवाई जस्टिस द्वारकाधीश बंसल ने की। आदेश 8 सितंबर 2026 को जारी किया गया।
यह मामला प्रियंशु मिश्रा और विनय मिश्रा के बीच है। पत्नी ने कुटुंब न्यायालय के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। कुटुंब कोर्ट ने पत्नी को ₹30 हजार महीना देने का आदेश दिया था। यह राशि 1 जून 2025 से देने का आदेश था।
आय ₹1.50 लाख, ₹30 हजार भरण-पोषण क्यों
कुटुंब कोर्ट ने पति की मासिक आय ₹1.50 लाख मानी थी। इसके बाद पत्नी को ₹30 हजार महीना भरण-पोषण मिला। पत्नी ने इसी रकम को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उसने कहा कि राशि बहुत कम रखी गई है।
पत्नी के वकील प्रमेंद्र सिंह ठाकुर ने कोर्ट में दलील दी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रजनेश फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि भरण-पोषण आवेदन की तारीख से मिलना चाहिए था। आवेदन 6 सितंबर 2021 को दाखिल किया गया था।
25% आय का नियम क्यों चर्चा में आया?
हाई कोर्ट ने कल्याण डे चौधरी मामले का भी उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में एक अहम आधार बताया था। पति की शुद्ध आय का करीब 25% उचित माना जा सकता है। यह पत्नी के भरण-पोषण के लिए एक सामान्य आधार है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर मामले में 25% तय होगा। हर मामले में परिस्थितियों को देखकर रकम तय होगी। आय, खर्च और परिवार की जरूरतें भी देखी जाएंगी। हाई कोर्ट ने इसी आधार पर कुटुंब कोर्ट को फिर सोचने कहा।
₹1.50 लाख आय पर 25% कितना बनता है?
पति की मानी गई आय ₹1.50 लाख महीना थी। उसका 25% हिस्सा ₹37,500 होता है। कुटुंब कोर्ट ने पत्नी को ₹30 हजार दिए थे। हाई कोर्ट ने इसी अंतर पर सवाल उठाया।
कोर्ट ने कहा कि रकम कम रखने का कारण जरूरी था। कुटुंब कोर्ट ने ऐसा पर्याप्त कारण नहीं बताया था। इसलिए हाई कोर्ट ने पुराने आदेश को टिकाऊ नहीं माना। मामला नए सिरे से तय करने के लिए वापस भेजा गया।
पति ने सैलरी स्लिप क्यों नहीं दी?
मामले में पति की सैलरी स्लिप भी अहम मुद्दा बनी। कुटुंब कोर्ट ने पति को सैलरी स्लिप देने कहा था। पति ने इसे पेश करने का वादा भी किया था। लेकिन बाद में सैलरी स्लिप रिकॉर्ड पर नहीं आई।
हाई कोर्ट ने इसे गंभीरता से देखा। कोर्ट ने कहा कि आय जानने के लिए दस्तावेज जरूरी था। ऐसे दस्तावेज से पति की असली आय पता चलती। दस्तावेज नहीं देने पर कोर्ट गलत निष्कर्ष निकाल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के रजनेश फैसले में क्या कहा गया?
सुप्रीम कोर्ट ने भरण-पोषण मामलों के लिए दिशा तय की थी। दोनों पक्षों को अपनी आय और संपत्ति बतानी होती है। इसके साथ जरूरी दस्तावेज भी देने होते हैं। इनमें सैलरी स्लिप और बैंक रिकॉर्ड भी शामिल हैं।
पति को जवाब और जानकारी समय पर देने का नियम है। जानकारी छिपाने पर कोर्ट सख्त रुख अपना सकता है। जरूरत पड़ने पर पति के खिलाफ गलत निष्कर्ष निकाला जा सकता है। कुछ मामलों में बचाव का अधिकार भी खत्म हो सकता है।
पत्नी ने भी आय की जानकारी छिपाई थी
मामले में पत्नी का आचरण भी सवालों में आया था। वह पहले डीवी एक्ट में ₹10 हजार पा रही थी। शुरुआत में यह जानकारी सामने नहीं आई थी। बाद में उसने अपने हलफनामे में इसका खुलासा किया।
हाई कोर्ट ने माना कि जानकारी बाद में रिकॉर्ड पर आ गई। इसलिए केवल इस आधार पर पत्नी का दावा खत्म नहीं होगा। हालांकि कोर्ट ने उसके शुरुआती आचरण पर सवाल जरूर उठाए। कोर्ट ने दोनों पक्षों की जिम्मेदारी पर जोर दिया।
भरण-पोषण आवेदन में देरी किसकी थी?
कुटुंब कोर्ट ने पत्नी की ओर से देरी मानी थी। हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की तारीखें देखकर इसे जांचा। 6 सितंबर 2021 से 29 अप्रैल 2024 तक देरी नहीं दिखी। इस दौरान पत्नी ने कार्यवाही आगे बढ़ाने में देरी नहीं की।
बाद में उसका साक्ष्य 25 मई 2024 को बंद हुआ था। पत्नी ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। 1 अगस्त 2025 को उसे फिर मौका दिया गया। उसने 22 सितंबर 2025 को अपना साक्ष्य पूरा किया।
हाई कोर्ट ने पुराना आदेश क्यों रद्द किया?
हाई कोर्ट ने माना कि मामले की पूरी तस्वीर नहीं देखी गई। पति की आय ₹1.50 लाख मानी गई थी। फिर भी सैलरी स्लिप रिकॉर्ड पर नहीं ली गई। उसके बाद भरण-पोषण की रकम भी ठीक से नहीं परखी गई।
कोर्ट ने कहा कि इन पहलुओं पर विचार जरूरी था। इसी वजह से 27 जून 2026 का आदेश रद्द हुआ। मामला फिर कुटुंब कोर्ट को भेज दिया गया। अब वहां आवेदन पर नए सिरे से फैसला होगा।
पत्नी को फिलहाल ₹30 हजार मिलते रहेंगे
हाई कोर्ट ने पूरी रकम तुरंत बंद नहीं की। नए फैसले तक ₹30 हजार महीना जारी रहेगा। यह रकम पुराने कुटुंब कोर्ट आदेश के अनुसार मिलेगी। नया फैसला होने तक पति को भुगतान करना होगा।
हाई कोर्ट ने भरण-पोषण की नई रकम तय नहीं की है। कोर्ट ने केवल दोबारा जांच का आदेश दिया है। नई रकम तय करते समय आय को आधार बनाना होगा। सुप्रीम कोर्ट के तय सिद्धांतों पर भी ध्यान देना होगा।
इस आदेश का सबसे अहम मतलब क्या है?
इस आदेश में 25% को सीधा अधिकार नहीं बनाया गया। इसे भरण-पोषण तय करने का अहम आधार माना गया। अंतिम रकम मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। पति की वास्तविक आय भी सही तरीके से सामने आनी चाहिए।
इस मामले में ₹1.50 लाख आय पहले ही मानी गई थी। इसलिए 25% के आधार पर रकम की समीक्षा जरूरी थी। कुटुंब कोर्ट को अब इसी दिशा में फैसला करना होगा। हाई कोर्ट का आदेश इसी प्रक्रिया को स्पष्ट करता है।
पत्नी और पति दोनों के लिए क्या संदेश है?
भरण-पोषण मामलों में पूरी वित्तीय जानकारी देना जरूरी है। आय छिपाने से किसी पक्ष को फायदा नहीं मिलना चाहिए। सैलरी स्लिप और बैंक रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज अहम हैं। कोर्ट जरूरत पड़ने पर इनके आधार पर निष्कर्ष निकाल सकता है।
- हाई कोर्ट ने साफ किया कि दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है।
- पत्नी को भी पहले से मिल रही रकम बतानी होगी।
- पति को अपनी आय के जरूरी दस्तावेज देने होंगे।
- इससे भरण-पोषण की सही रकम तय करने में मदद मिलेगी।
कोर्ट के आदेश में किन फैसलों का आधार रहा?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख हुआ। सबसे अहम फैसला रजनेश बनाम नेहा है। इसी फैसले में आय और संपत्ति बताने की व्यवस्था बनी। कल्याण डे चौधरी मामले में 25% आय का आधार आया।
हाई कोर्ट ने मोहित असवानी मामले का भी जिक्र किया। उसमें अधूरे आय संबंधी हलफनामे पर सख्त टिप्पणी हुई थी। शैलेंद्र राय मामले में भी सैलरी स्लिप का मुद्दा उठा था। इन फैसलों से कोर्ट ने अपनी बात को स्पष्ट किया।
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