पेंशन के लिए जल सत्याग्रह करेंगे पेंशनर्स, 26 साल पुराने विवाद पर सरकारों को घेरने की तैयारी
News in short
- 13 जून को नर्मदा तट पर जल सत्याग्रह करेंगे पेंशनर्स।
- प्रदेश के करीब 5 लाख पेंशनर्स की मांगों को लेकर आंदोलन।
- मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ पुनर्गठन से जुड़ा 26 साल पुराना विवाद।
- सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को सौंपा जाएगा 13 सूत्रीय ज्ञापन।
- जनप्रतिनिधियों की आजीवन पेंशन व्यवस्था की समीक्षा की मांग।
Intro
मध्य प्रदेश के पेंशनर्स ने अपनी लंबित मांगों को लेकर बड़ा आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया है। 13 जून को नर्मदा तट पर जल सत्याग्रह किया जाएगा। पेंशनर्स का आरोप है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच 26 साल पुराने वित्तीय विवाद के कारण लाखों बुजुर्गों को समय पर महंगाई राहत और अन्य लाभ नहीं मिल पा रहे हैं।
News in detail
26 साल पुरानी मांग को लेकर अब आंदोलन का ऐलान
प्रमुख पेंशनर्स एसोसिएशन की जिला कार्यकारिणी की बैठक जबलपुर में आयोजित की गई। पेंशनर्स का कहना है कि वर्षों से लंबित मांगों के समाधान के लिए अब आंदोलन तेज किया जाएगा। संगठन का आरोप है कि राज्य पुनर्गठन के बाद से पेंशन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे आज भी अधूरे हैं, जिनका खामियाजा लाखों बुजुर्ग पेंशनर्स को भुगतना पड़ रहा है।
नर्मदा तट पर होगा जल सत्याग्रह
पेंशनर्स ने घोषणा की है कि 13 जून 2026 को सुबह 10 बजे नर्मदा तट पर जल सत्याग्रह किया जाएगा। आंदोलन के माध्यम से प्रधानमंत्री, केंद्रीय वित्त मंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और राज्य सरकार का ध्यान पेंशनर्स की समस्याओं की ओर आकर्षित किया जाएगा। संगठन का कहना है कि वर्षों से ज्ञापन और अनुरोध दिए जाने के बावजूद कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
5 लाख पेंशनर्स की चिंता का विषय
बैठक में बताया गया कि यह केवल किसी एक जिले या संगठन का मुद्दा नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश के करीब 5 लाख पेंशनर्स इससे प्रभावित हैं। पेंशनर्स का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन के 40 से 45 वर्ष सरकारी सेवा में दिए, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
दूसरे चरण में जनप्रतिनिधियों को सौंपेंगे ज्ञापन
जल सत्याग्रह के बाद आंदोलन का दूसरा चरण शुरू होगा। इसके तहत प्रदेशभर में सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को 13 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन सौंपा जाएगा। संगठन का कहना है कि जनप्रतिनिधियों को पेंशनर्स की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाएगा ताकि वे सरकार के स्तर पर समाधान के लिए पहल कर सकें।
विधायक-सांसदों की पेंशन व्यवस्था पर उठे सवाल
बैठक में पेंशनर्स ने जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली आजीवन पेंशन व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि एक सरकारी कर्मचारी को दशकों तक सेवा देने के बाद भी अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है, जबकि एक बार विधायक या सांसद बनने पर आजीवन पेंशन का लाभ मिल जाता है। पेंशनर्स ने इस व्यवस्था की समीक्षा की मांग की है।
क्या है 26 साल पुराना पेंशन विवाद?
यह विवाद वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विभाजन के समय शुरू हुआ था। मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत तय किया गया था कि 31 अक्टूबर 2000 तक सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन देनदारियों का बंटवारा दोनों राज्यों के बीच 74:26 के अनुपात में होगा। यह अनुपात दोनों राज्यों की आबादी के आधार पर निर्धारित किया गया था।
आर्थिक बंटवारे पर अटका मामला
नियम के अनुसार छत्तीसगढ़ में रहने वाले या वहां से सेवानिवृत्त हुए पेंशनभोगियों को पेंशन का भुगतान छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा किया जाना था, जबकि उस खर्च की 74 प्रतिशत राशि मध्य प्रदेश सरकार को प्रतिपूर्ति के रूप में देनी थी। बाद में मध्य प्रदेश ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पेंशन का बंटवारा आबादी के आधार पर नहीं बल्कि संबंधित राज्य में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या के आधार पर होना चाहिए।
इसी मतभेद के कारण प्रतिपूर्ति की बड़ी राशि का भुगतान रुक गया और मामला वर्षों तक विवाद का विषय बना रहा। कई दौर की बैठकों और कानूनी प्रक्रियाओं के बावजूद यह मुद्दा पूरी तरह सुलझ नहीं पाया।
मध्य प्रदेश के पेंशनर्स कैसे हो रहे हैं प्रभावित?
पेंशनर्स संगठनों का दावा है कि इस विवाद का सबसे बड़ा असर मध्य प्रदेश के करीब 5 लाख पेंशनभोगियों पर पड़ा है। पुनर्गठन अधिनियम की व्यवस्थाओं के कारण जब भी महंगाई राहत (डीआर) बढ़ाने का प्रस्ताव आता है तो दोनों राज्यों के बीच सहमति और औपचारिक प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है।
इसका परिणाम यह होता है कि केंद्र सरकार या कर्मचारियों को मिलने वाले लाभ की तुलना में पेंशनर्स को बढ़ा हुआ डीआर कई महीनों बाद मिलता है। बढ़ती महंगाई के दौर में यह देरी बुजुर्ग पेंशनर्स के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाती है।
एरियर में नुकसान और अदालत तक पहुंची लड़ाई
पेंशनर्स का कहना है कि देरी का असर केवल डीआर तक सीमित नहीं है बल्कि एरियर पर भी पड़ता है। संगठन के अनुसार वर्षों से चली आ रही देरी के कारण कई पेंशनर्स को औसतन डेढ़ से दो लाख रुपये तक का आर्थिक नुकसान हुआ है।
बीमारी, दवाइयों और रोजमर्रा के खर्चों के लिए पेंशन पर निर्भर बुजुर्गों को इसका सीधा असर झेलना पड़ रहा है। इसी कारण पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने इस मामले को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है। उनका कहना है कि अविभाजित मध्य प्रदेश की सेवा करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों को राज्यों के बीच वित्तीय या प्रशासनिक विवाद की वजह से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
सरकार से समाधान की उम्मीद
पेंशनर्स संगठनों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का टकराव नहीं बल्कि अपने अधिकारों के लिए न्याय प्राप्त करना है। उनका मानना है कि यदि केंद्र और दोनों राज्य सरकारें मिलकर इस 26 साल पुराने विवाद का स्थायी समाधान निकालें तो लाखों बुजुर्ग पेंशनर्स को राहत मिल सकती है। संगठन ने संकेत दिए हैं कि मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं होने की स्थिति में आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।
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