एमपी में मिला 256 करोड़ साल पुराना खजाना, बुंदेलखंड की धरती बनी वैज्ञानिक शोध का विषय

Sanjay Dhiman | Jul 22, 2026, 19:55 IST
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मध्य प्रदेश के पिचहोर में मिली ऑर्बिक्यूलर ग्रेनाइट चट्टान 256 करोड़ साल पुरानी पाई गई है। यह दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी चट्टान मानी जा रही है। इस खोज को मध्यप्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।

मध्य प्रदेश के पिचहोर में एक बेहद पुरानी चट्टान मिली है। वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि यह 2.56 अरब साल पुरानी है। यह दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी ऐसी चट्टान मानी जा रही है। इसमें गोल-गोल संरचनाएं पाई गई हैं, जिन्हें ऑर्बिक्यूल्स कहा जाता है। यह खोज धरती के शुरुआती इतिहास को समझने में मदद करेगी।



मध्य प्रदेश के पिचहोर इलाके में एक अनोखी चट्टान मिली है। यह चट्टान धरती के सबसे पुराने दौर की गवाह है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने इसकी गहराई से जांच की है। जांच में पता चला कि यह चट्टान करीब 2.56 अरब साल पुरानी है।



यह दुनिया में अपनी तरह की दूसरी सबसे पुरानी चट्टान है। इससे पुरानी चट्टान अब तक केवल पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में मिली है। यह शोध जियोसिस्टम्स और जियोएनवायरनमेंट नामक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इससे इस खोज की वैज्ञानिक विश्वसनीयता और बढ़ जाती है।



गोल संरचनाओं का रहस्य

यह चट्टान कुटावली गांव के पास मौजूद है। वैज्ञानिकों ने इसे धरती के शुरुआती दौर का दुर्लभ रिकॉर्ड बताया है। इस शोध में भारत के साथ-साथ विदेशी संस्थानों के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। इस खोज से यह समझने में मदद मिलेगी कि अरबों साल पहले धरती की सतह किस तरह बनी थी।



पिचहोर की चट्टान अपनी खास बनावट के कारण भूवैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। इसमें गोल आकार की संरचनाएं मौजूद हैं, जिन्हें ऑर्बिक्यूल्स कहा जाता है। ये संरचनाएं क्रिकेट की गेंद या पेड़ के तने की परतों जैसी दिखती हैं। कुछ ऑर्बिक्यूल्स का आकार करीब 30 सेंटीमीटर तक पाया गया है।



वैज्ञानिकों के अनुसार, ये संरचनाएं तब बनीं जब धरती के अंदर मौजूद गर्म मैग्मा में अचानक बदलाव आया। तापमान और रासायनिक बदलाव के कारण खनिजों की परतें एक केंद्र के चारों ओर जमा हो गईं। इस प्रक्रिया से ये अनोखे गोल आकार तैयार हुए।



महाद्वीपों के निर्माण की गवाह चट्टान

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह चट्टान उस समय की है जब धरती पर महाद्वीप बन रहे थे और स्थिर हो रहे थे। इस दौर को नियोआर्कियन युग कहा जाता है। यह समय करीब 280 करोड़ से 250 करोड़ साल पहले का माना जाता है।



उस दौर में धरती के अंदर लगातार भूगर्भीय गतिविधियां चल रही थीं। पुरानी चट्टानें पिघल रही थीं और उनसे नई चट्टानें बन रही थीं। पिचहोर की चट्टान इस बात का प्रमाण है कि धरती की सतह लंबे समय तक बदलाव से गुजरती रही।



जिरकॉन ने बताई सही उम्र

वैज्ञानिकों ने चट्टान की उम्र जानने के लिए यूरेनियम-लेड जिरकॉन डेटिंग तकनीक (Uranium-Lead Zircon Dating Technique) का इस्तेमाल किया। जिरकॉन एक मजबूत खनिज होता है, जो बनते समय मौजूद यूरेनियम को अपने भीतर सुरक्षित रखता है। करोड़ों साल में यह यूरेनियम धीरे-धीरे लेड में बदलता रहता है। इसी बदलाव को मापकर वैज्ञानिक चट्टान की सही उम्र तय करते हैं।



जांच में पिचहोर ग्रेनाइट की उम्र 2.56 अरब साल निकली। खास बात यह रही कि इसमें मिले कुछ जिरकॉन कण करीब 3.5 अरब साल पुराने पाए गए। इससे पता चलता है कि उस दौर में धरती की बहुत पुरानी चट्टानों को पिघलाकर नए भू-भाग बनाए जा रहे थे।



बुंदेलखंड क्रेटॉन के लिए अहम खोज

यह खोज मध्य भारत के बुंदेलखंड क्रेटॉन (Bundelkhand Craton) के अध्ययन के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। क्रेटॉन धरती के वे पुराने और स्थिर हिस्से होते हैं, जिनमें अरबों साल पुराने भूगर्भीय रिकॉर्ड सुरक्षित रहते हैं।



वैज्ञानिकों ने नियोडिमियम आइसोटोप (Neodymium Isotope) की जांच से पता लगाया कि यह चट्टान सीधे धरती के मेंटल से नहीं बनी थी। इसका निर्माण पहले से मौजूद पुरानी महाद्वीपीय चट्टानों के पिघलने से हुआ था। इससे साबित होता है कि यह क्षेत्र भी कभी सक्रिय भूगर्भीय बदलावों से गुजरा था।



खेती से खतरे में है यह धरोहर

वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि पिचहोर की यह दुर्लभ चट्टान मानव गतिविधियों से खतरे में है। स्थानीय क्षेत्र में खेती के विस्तार से इस भूवैज्ञानिक धरोहर को नुकसान पहुंच सकता है।



शोधकर्ताओं का कहना है कि पिचहोर जैसी जगहें धरती के इतिहास की जीवित किताब हैं। ये बताती हैं कि अरबों साल पहले हमारा ग्रह पृथ्वी कैसे बना था। इसलिए ऐसी दुर्लभ चट्टानों का संरक्षण जरूरी है।



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