पोषण आहार में 270 करोड़ का घाटा या खेल? 7 प्लांट बंद, गोदामों में पड़ा करोड़ों का माल
पोषण आहार में 270 करोड़ का घाटा या खेल? 7 प्लांट बंद, गोदामों में पड़ा करोड़ों का माल
समझें क्या है पूरा मामला...
- सरकार पोषण आहार सप्लाई का काम निजी कंपनियों को देने जा रही है।
- महिला स्वसहायता समूहों से यह जिम्मेदारी छीनी जा रही है।
- वजह बताई गई करीब 270 करोड़ रुपए का घाटा।
- पड़ताल में यह घाटा सुनियोजित होने के संकेत मिले हैं।
- सात सहकारी प्लांट बंद हैं, करोड़ों का सामान अटका है।
बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण आहार बनाने का जिम्मा अब तक महिला स्वसहायता समूहों के पास था। अब सरकार यह काम निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी में है। इसकी वजह 270 करोड़ रुपए का घाटा बताई जा रही है। वहीं, गहराई से देखने पर यह घाटा अचानक नहीं बना। यह सालों की लापरवाही और गलत नीतियों का नतीजा है।
घाटे की असली कहानी
प्रदेश के सात सहकारी प्लांटों में पोषण आहार बनता है। यहां 2018 में तय दर पर ही 2026 तक काम होता रहा। इस दौरान कीमतें बढ़ती गईं, लेकिन रेट नहीं बदले गए। नतीजा यह हुआ कि हर साल घाटा बढ़ता चला गया।
जब काम छीनने की वजह पक्की करनी थी, तभी इसी घाटे को कैबिनेट के सामने बड़ा दिखाया गया। सूत्रों के मुताबिक 2024-25 और 2025-26 के बीच घाटा 150 करोड़ रुपए बढ़ गया। यानी यह लगभग दोगुना हो गया।
दिसंबर के बाद क्या हुआ
दिसंबर 2025 में घाटे की भरपाई के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया था। वहीं, इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया था। बाद में तय हुआ कि यह काम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन यानी एसआरएलएम (State Rural Livelihood Mission) से ले लिया जाए।
इसे महिला बाल विकास विभाग को सौंपने की योजना बनी थी। दिलचस्प बात यह है कि यह विभाग पहले भी यह काम संभाल चुका है। उस समय कैग (Comptroller and Auditor General) ने इसमें करोड़ों रुपए के घोटाले पकड़े थे।
80 करोड़ का हिसाब नहीं
प्लांट शुरू करने के लिए सरकार ने अंशपूंजी के तौर पर 80 करोड़ रुपए दिए थे। यह रकम दो साल में लौटानी थी। अधिकारियों का कहना है कि सरकार चाहती तो अनुदान देकर भी प्लांट चला सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। हर प्लांट बनाने में 10 से 12 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। अब इन प्लांटों का भविष्य क्या होगा, इसका कुछ तय नहीं है।
प्लांटों में करीब 20 करोड़ रुपए का कच्चा माल फंसा हुआ है। इसमें अनाज, दालें और मसाले शामिल हैं। इसी बीच एमपी एग्रो का बाड़ी प्लांट भी अगस्त 2024 से बंद पड़ा है।
इस प्लांट को 2021-22 और 2022-23 में हर महीने 50 लाख रुपए का घाटा हुआ था। रेसिपी नहीं बदली गई और उत्पादन लागत बढ़ती गई। अब सरकार ने केंद्र को रेट रिवाइज करने का प्रस्ताव भेजा है।
पुराने रेट पर राशन, नुकसान सप्लायरों को
गर्भवती और धात्री महिलाओं के लिए टीएचआर यानी टेक होम राशन (Take Home Ration) पर रोज सिर्फ 9.50 रुपए मिलते थे। छह साल तक के बच्चों के लिए यह राशि 8 रुपए प्रति दिन थी। किशोरियों को भी रोज 9.50 रुपए दिए जाते थे।
गंभीर कुपोषित और कम वजन वाले बच्चों के लिए 12 रुपए तय थे। वहीं, असल में सामान बनाने की लागत इससे कहीं ज्यादा थी। सप्लायर लगातार दाम बढ़ाने की मांग करते रहे। उन्हें हर बार कहा गया कि पहले सामान दें, पैसा बाद में मिलेगा। अब परेशान सप्लायर कोर्ट पहुंच गए हैं। सरकार अब उनकी रकम लौटाने की कोशिश में जुटी है।
मैनेजमेंट में भी बड़ी खामियां
एसआरएलएम के प्लांटों में जनपद सीईओ और तकनीकी स्टाफ प्रतिनियुक्ति पर रखे गए। इनका वेतन सरकार दे सकती थी, लेकिन यह पैसा प्लांटों से ही दिया गया। प्लांट पहले से घाटे में थे।
फिर भी कई जनपद सीईओ ने प्रभाव का इस्तेमाल कर खुद को प्लांट सीईओ बनवा लिया। हर महीने जरूरत सिर्फ 9500 से 10 हजार टन पोषण आहार की थी। लेकिन सातों प्लांटों की कुल क्षमता 15 हजार टन थी।
इस अतिरिक्त क्षमता का व्यावसायिक इस्तेमाल भी किया जा सकता था। इसके अलावा प्लांट को पूरे महीने चलाने की बजाय जरूरत के हिसाब से चलाया जा सकता था। इससे लागत भी कम आती।
अफसरों की राय अलग-अलग
पूर्व सीईओ एलएम बेलवाल आईएफएस यानी इंडियन फॉरेस्ट सर्विस अधिकारी रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने कभी उत्पादन दर रिवाइज ही नहीं की। उनके मुताबिक सहकारी प्लांटों में बनी सामग्री की क्वालिटी बेहतर होती है। ठेकेदार का कमीशन भी इसमें नहीं जुड़ता। उनका मानना है कि आज भी रेट बढ़ा दिए जाएं तो प्लांट अच्छे से चल सकते हैं।
पूर्व सीईओ केदार सिंह आईएएस यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस अधिकारी हैं। वे सिर्फ छह महीने इस पद पर रहे। उनके मुताबिक एमपी के मंत्री प्रह्लाद पटेल ने प्लांट को मुनाफे में लाने का निर्देश दिया था। उनका सुझाव था कि अतिरिक्त मशीनरी से दलिया बनाकर कहीं और बेचा जा सकता था। उनका कहना है कि सरकार की कोई भी चीज घाटे में नहीं जानी चाहिए।
दीपक आर्य सिर्फ डेढ़ महीने सीईओ रहे। उन्होंने कहा कि इतने कम समय में वे ज्यादा कुछ नहीं बता सकते। वहीं मनोज पुष्प और हर्षिका सिंह ने भी इस विषय पर बोलने से इनकार कर दिया। गौर करने वाली बात यह है कि हर्षिका सिंह के कार्यकाल 2024-25 से 2025-26 के बीच ही घाटा सबसे ज्यादा बढ़ा।
आगे क्या होना बाकी है
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। महिला स्वसहायता समूहों से काम लेकर निजी कंपनियों को देना आसान समाधान लग सकता है। लेकिन असली वजह प्रबंधन की कमी और नीतिगत लापरवाही है।
यदि रेट समय पर बढ़ाए जाते तो शायद यह नौबत ही नहीं आती। अब सरकार को प्लांटों के भविष्य पर जल्द फैसला लेना होगा। साथ ही फंसे सामान और सप्लायरों के भुगतान का हल निकालना जरूरी है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर सीधे जनता के पैसे और बच्चों की पोषण योजना से जुड़ी है। सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता बनाए रखना जनता का बुनियादी अधिकार है। यह रिपोर्ट सरकारी दस्तावेजों और अधिकारियों के बयान पर आधारित है।
इसमें किसी व्यक्ति या पद के खिलाफ पूर्वाग्रह नहीं रखा गया है। मकसद सिर्फ तथ्य सामने लाना और जवाबदेही तय करना है। महिला स्वसहायता समूहों की आजीविका से जुड़ा यह विषय सामाजिक न्याय से भी जुड़ता है।
FAQ
- एमपी के पोषण आहार में 270 करोड़ का घाटा किस वजह से हुआ?
सात सहकारी प्लांटों में 2018 की तय दर पर ही 2026 तक पोषण आहार बनाया गया। इस दौरान लागत लगातार बढ़ती गई, लेकिन रेट नहीं बदले गए। इससे हर साल घाटा बढ़ता गया और 2024-25 से 2025-26 के बीच यह दोगुना हो गया। - मध्यप्रदेश सरकार अब पोषण आहार का काम किसे सौंपने की तैयारी में है?
सरकार महिला स्वसहायता समूहों से यह काम लेकर निजी कंपनियों को सौंपने की योजना बना रही है। इससे पहले यह काम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन यानी एसआरएलएम से लेकर महिला बाल विकास विभाग को देने का फैसला हुआ था।
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