मंत्री प्रतिमा बागरी विवाद: छानबीन समिति ने की सुनवाई, अब नजरें अंतिम रिपोर्ट पर
समझें क्या है पूरा मामला
- मंत्री प्रतिमा बोलीं, मेरे पास 110 साल के दस्तावेज हैं।
- जाति साबित करने गांव में कराई गई मुनादी, मंत्री दुखी।
- प्रतिमा बागरी की जाति पर छानबीन समिति में सुनवाई।
- कांग्रेस नेता बोले, फर्जी मंत्री को हटाएं मुख्यमंत्री।
- बागरी जाति विवाद में समिति के सामने पेश हुए दोनों पक्ष।
मध्य प्रदेश की मंत्री प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाणपत्र विवाद ( caste certificate dispute ) फिर सुर्खियों में आया है। राज्य स्तरीय छानबीन समिति के सामने इस मामले की सुनवाई हुई।
मंत्री ने खुद को बागरी समाज का बताते हुए वंशावली के दस्तावेज पेश किए। उन्होंने कहा कि जाति साबित करने गांव में मुनादी तक कराई गई। कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने भी समिति के सामने अपने तथ्य रखे।
छानबीन समिति के सामने सुनवाई
मध्य प्रदेश की नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाणपत्र मामले में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने इस विवाद पर सभी पक्षों को सुना। मंत्री प्रतिमा ने समिति के सामने अपनी वंशावली से जुड़े दस्तावेज पेश किए।
उन्होंने कहा कि वे बागरी समाज से आती हैं। यह समाज प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC – Scheduled Caste) में शामिल है। मंत्री ने बताया कि उनके पास 110 साल पुराने दस्तावेज मौजूद हैं।
मुनादी और अपराधियों जैसा व्यवहार
मंत्री प्रतिमा ने अपनी बात रखते हुए गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि उनकी जाति साबित करने के लिए गांव में मुनादी तक कराई गई। यह उनके लिए बेहद अपमानजनक अनुभव रहा।
उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में उनके साथ अपराधियों जैसा सलूक हुआ। मंत्री ने इस व्यवहार पर खुला दुख जताया। उनका कहना था कि यह उनकी गरिमा के खिलाफ है।
कांग्रेस नेता का पक्ष
कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार भी इस सुनवाई में शामिल हुए। उन्होंने समिति के सामने अपने दस्तावेज पेश किए। अहिरवार ने कहा कि 1950 की संवैधानिक स्थिति में तत्कालीन विंध्य प्रदेश की अनुसूचित जाति सूची में बागरी जाति शामिल नहीं थी।
उन्होंने बताया कि 1961 की जातीय जनगणना में भी सतना जिले में बागरी जाति दर्ज नहीं थी। अहिरवार के अनुसार 1976 में केंद्र सरकार ने एससी-एसटी (SC-ST – Scheduled Caste-Scheduled Tribe) वर्ग के लिए सीमा क्षेत्र का बंधन लागू किया। इसके बाद बागरी जाति एससी सूची में शामिल हो गई।
अहिरवार ने टीआरआई (TRI – Tribal Research Institute) की दो रिपोर्टों का भी हवाला दिया। उनके मुताबिक इन रिपोर्टों में साफ कहा गया है कि बागरी जाति अनुसूचित जाति में नहीं आती। उनका दावा है कि बागरी असल में राजपूत हैं।
2007 का गजट नोटिफिकेशन
अहिरवार ने सरकार के 2007 के एक गजट नोटिफिकेशन का भी जिक्र किया। इसमें कहा गया था कि बागरी और बागड़ी की राजपूत उपजातियों को संवैधानिक रूप से अमान्य किया गया है। यानी बागरी जाति एससी वर्ग में नहीं आती, ऐसा नोटिफिकेशन में दर्ज है।
पन्ना और सतना से भी कुछ अन्य आपत्तिकर्ता समिति के सामने पेश हुए। उन्होंने भी अपने आपत्ति दस्तावेज सौंपे। इन दस्तावेजों की जांच भी समिति करेगी।
छानबीन समिति का रुख
उच्च स्तरीय जाति प्रमाणपत्र छानबीन समिति के अध्यक्ष और प्रमुख सचिव गुलशन बामरा ने भी इस मामले में अपनी बात रखी। बामरा ने दस्तावेजी आधार पर यह स्वीकार किया कि 1950 में विंध्य प्रदेश की एससी सूची में बागरी जाति शामिल नहीं थी।
बामरा ने कहा कि उन्होंने 1961 और 1971 की जातीय जनगणना के मूल दस्तावेज भी समिति के सामने प्रस्तुत किए हैं। उन्हें उम्मीद है कि समिति उनके पक्ष में फैसला देगी। समिति सचिव सत्येंद्र सिंह और विषय विशेषज्ञ मातादीन कनेरिया व सुधीर श्रीवास्तव भी सुनवाई में मौजूद रहे।
आगे की प्रक्रिया
फिलहाल छानबीन समिति सभी पक्षों के दस्तावेजों की जांच कर रही है। समिति का अंतिम फैसला इस विवाद की दिशा तय करेगा। दोनों पक्ष अपनी बात के समर्थन में मजबूत दलीलें पेश कर चुके हैं।
अब सबकी नजरें समिति की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। इस रिपोर्ट के बाद ही यह साफ होगा कि मंत्री प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाणपत्र वैध है या नहीं।
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