प्रतिमा बागरी जाति विवाद: जिस मुनादी पर मंत्री हुए नाराज, वो सालों से नियम में
समझें क्या है पूरा मामला
- प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र पर विवाद चल रहा है।
- जांच के दौरान गांवों में मुनादी कराई गई थी।
- मुनादी को लेकर छह मंत्री सीएम से मिले।
- मंत्रियों ने अधिकारी पर कार्रवाई की मांग रखी।
- 1997 के नियमों में मुनादी का प्रावधान मौजूद है।
मुनादी पर क्यों मची सियासत
मध्यप्रदेश की राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में अब जांच प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। मामला तब चर्चा में आया जब जाति छानबीन समिति ने जांच के दौरान सतना जिले के कुछ गांवों में मुनादी कराई। गांवों में डुगडुगी बजाकर लोगों से जाति से जुड़े दस्तावेज और आपत्तियां मांगी गईं। इस कार्रवाई के बाद सरकार के छह मंत्री नाराज हो गए। मंत्रियों ने मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात कर संबंधित अधिकारी की कार्रवाई की मांग की।
मंत्रियों का कहना था कि जांच पूरी होने से पहले इस तरह सार्वजनिक सूचना देने की जरूरत क्यों पड़ी। हालांकि दूसरी तरफ प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े नियम बताते हैं कि जाति जांच में मुनादी करना तय प्रक्रिया का हिस्सा है।
छह मंत्री सीएम से मिले थे
दरअसल, बुधवार को कैबिनेट बैठक के बाद छह मंत्रियों ने मुख्यमंत्री मोहन यादव से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा भी शामिल रहे। इसके अलावा जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह, दिलीप जायसवाल, गौतम टेटवाल और लखन पटेल भी मौजूद रहे।राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार भी इस बैठक में शामिल हुए।
मंत्रियों ने मुख्यमंत्री के सामने अपनी नाराजगी रखी। उनका कहना था कि मंत्री पद पर बैठी महिला नेता के खिलाफ जांच प्रक्रिया में जल्दबाजी दिखाई गई। मंत्रियों ने मुनादी कराने वाले अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी रखी। यह बैठक करीब आधे घंटे तक चली। मुख्यमंत्री ने मंत्रियों की बात सुनी और पूरे मामले की जानकारी ली।
क्या मुनादी नियमों में है
इस विवाद का सबसे अहम पहलू यह है कि जिस मुनादी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वह जांच प्रक्रिया का हिस्सा है। मध्यप्रदेश शासन के 1997 के परिपत्र में जाति छानबीन प्रक्रिया तय की गई है। इस प्रक्रिया में जांच अधिकारी को स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने का अधिकार दिया गया है। जरूरत पड़ने पर गांव या मोहल्ले में सार्वजनिक सूचना भी दी जा सकती है।
इसका उद्देश्य यह होता है कि संबंधित जाति दावे पर कोई व्यक्ति आपत्ति या जानकारी देना चाहता है तो वह सामने आ सके। मुनादी के जरिए प्रशासन स्थानीय लोगों तक सूचना पहुंचाता है। इसके बाद मिलने वाली जानकारी को जांच में शामिल किया जा सकता है। यानी मुनादी कोई नई प्रक्रिया नहीं है। यह लंबे समय से जाति प्रमाण पत्र जांच व्यवस्था का हिस्सा रही है।
बागरी मामले में क्या हुआ
प्रतिमा बागरी सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट से विधायक हैं। रैगांव सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें मोहन सरकार में नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने उनकी जाति को चुनौती दी।
मामला हाईकोर्ट पहुंचा। याचिका में दावा किया गया कि प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाण पत्र सही नहीं है। हाईकोर्ट ने मामले की जांच जाति छानबीन समिति को सौंपी। समिति को तय समय में जांच पूरी करने के निर्देश दिए गए। जांच के दौरान सतना के वसुधा, हरदुआ और मझोल गांवों में मुनादी कराई गई। लोगों से जाति संबंधी दस्तावेज और जानकारी मांगी गई।
प्रतिमा बागरी ने आरोपों को गलत बताया
प्रतिमा बागरी ने अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि वे बागरी समाज से आती हैं। उनके अनुसार मध्यप्रदेश में बागरी समाज अनुसूचित जाति सूची में शामिल है। उन्होंने दावा किया कि उनके पास पुराने दस्तावेज मौजूद हैं।
प्रतिमा बागरी ने इसे राजनीतिक साजिश बताया है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार का राजनीतिक इतिहास भी पुराना है। उनके दादा जुगल किशोर बागरी भी विधायक रह चुके हैं। उन्होंने कहा कि एक अनुसूचित जाति महिला का आगे बढ़ना कुछ लोगों को पसंद नहीं आ रहा है।
विवाद में नियम बनाम राजनीति
प्रतिमा बागरी मामले में अब असली विवाद जांच से ज्यादा जांच प्रक्रिया को लेकर दिखाई दे रहा है। एक तरफ मंत्री और समर्थक मुनादी को लेकर आपत्ति जता रहे हैं। दूसरी तरफ नियमों में इसकी अनुमति होने की बात सामने आ रही है। जाति प्रमाण पत्र की जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए सार्वजनिक सूचना का प्रावधान रखा गया है। इसका मकसद किसी व्यक्ति को बदनाम करना नहीं बल्कि सभी पक्षों को मौका देना होता है। अब सवाल यह है कि क्या मुनादी नियम के तहत हुई या प्रक्रिया में कोई गलती हुई। इसका जवाब जांच रिपोर्ट के बाद ही साफ होगा।
जांच रिपोर्ट पर नजर
जाति छानबीन समिति जल्द अपनी रिपोर्ट तैयार कर सकती है। रिपोर्ट हाईकोर्ट में भी प्रस्तुत की जाएगी। अगर प्रमाण पत्र सही पाया जाता है तो विवाद खत्म हो जाएगा। अगर रिपोर्ट विपरीत आती है तो मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ा हो सकता है। फिलहाल जांच जारी है। इस मामले में किसी भी पक्ष के खिलाफ अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
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