राजेंद्र भारती केस: दोषसिद्धि पर रोक की मांग, कोर्ट बोला- राहत दी तो हर दोषी देगा यही दलील

Neel Tiwari | Jul 11, 2026, 12:30 IST
राजेंद्र भारती केस
दतिया के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की दोषसिद्धि पर रोक लगाने की मांग दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। विस्तृत आदेश में अदालत ने बताया कि कोर्ट में क्या-क्या बहस हुई और क्यों यह माना कि केवल चुनाव लड़ने के लिए दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई जा सकती...

समझें क्या है पूरा मामला...

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने राजेंद्र भारती की दोषसिद्धि पर रोक लगाने की याचिका खारिज कर दी है।
  • पी. चिदंबरम ने कहा- चुनाव नहीं लड़ पाए तो अपूरणीय क्षति होगी।
  • बैंक ने आरोप लगाया कि बैंक अध्यक्ष रहते परिवार के ट्रस्ट को लाभ पहुंचाया गया था।
  • ट्रायल कोर्ट के फैसले में प्रथम दृष्टया कोई गंभीर कानूनी खामी नहीं दिखी है।
  • कोर्ट ने कहा- यदि इस आधार पर राहत दी गई तो हर दोषी सांसद और विधायक ऐसी ही मांग करेगा।

राजेंद्र भारती मामले की पूरी कहानी

दतिया के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की दोषसिद्धि पर रोक लगाने की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। अदालत ने सिर्फ राहत देने से इनकार नहीं किया, बल्कि 16 पन्नों के अपने आदेश में पूरी सुनवाई का जिक्र किया है।



आदेश में बताया गया है कि दोनों पक्षों ने क्या-क्या दलीलें दीं, कौन से कानूनी तर्क रखे गए और आखिर किन वजहों से कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि अभी दोषसिद्धि पर रोक लगाने की जरूरत नहीं है।



दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश में बताई मामले की पृष्ठभूमि

जज मनोज जैन ने अपने आदेश में कहा कि दतिया जिला सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक की शिकायत के मुताबिक, बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष राजेंद्र भारती ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल किया। उन्होंने 10 लाख रुपए की एफडी की अवधि तीन साल से बढ़ाकर पहले 10 साल और फिर 15 साल करवा दी।



इसका फायदा उनकी मां सावित्री भारती की अध्यक्षता वाले ट्रस्ट को मिला। ट्रस्ट को करीब 12 साल तक 13.5 प्रतिशत की दर से अतिरिक्त ब्याज मिलता रहा। कोर्ट के मुताबिक, इससे बैंक को आर्थिक नुकसान हुआ।



इसी मामले में ट्रायल कोर्ट ने राजेंद्र भारती को आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल का दोषी माना था।



चुनाव लड़ने का मौका खत्म होने की दी दलील

राजेंद्र भारती की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने कोर्ट में कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कई कानूनी और तथ्यों से जुड़ी गलतियों पर आधारित है। उन्होंने दलील दी कि अभियोजन पक्ष के पास अपराध साबित करने के लिए कोई मजबूत सबूत नहीं है।



उन्होंने कहा कि पूरी सजा उन बयानों पर टिकी है, जिनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। चिदंबरम ने कोर्ट से कहा कि अगर अभी दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई गई तो राजेंद्र भारती दतिया उपचुनाव में नामांकन भी दाखिल नहीं कर पाएंगे।



उन्होंने कहा कि अगर बाद में अपील में वे बरी हो जाते हैं तो चुनाव लड़ने का जो मौका निकल जाएगा, उसकी भरपाई नहीं हो पाएगी।



सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का दिया गया हवाला

पी. चिदंबरम ने अपनी बात के समर्थन में अफजल अंसारी, अब्बास अंसारी, दिलीप राय, मोहम्मद आजम खान और राजेश शांतिलाल अदानी जैसे मामलों का उदाहरण दिया।



उन्होंने कहा कि कुछ खास परिस्थितियों में अपीलीय अदालत दोषसिद्धि पर भी रोक लगा सकती है। उनके मुताबिक, राजेंद्र भारती का मामला भी ऐसी ही विशेष परिस्थितियों में आता है।



पद का इस्तेमाल कर परिवार के ट्रस्ट को पहुंचाया फायदा

शिकायतकर्ता बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहित माथुर ने कोर्ट में कहा कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं थी। राजेंद्र भारती उस समय विधायक होने के साथ-साथ बैंक के अध्यक्ष भी थे। उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बैंक के रिकॉर्ड में बदलाव करवाए। इससे उनके परिवार से जुड़े ट्रस्ट को आर्थिक फायदा पहुंचा।



बैंक ने यह भी कहा कि सह-आरोपी रघुवीर शरण प्रजापति ने पहले शपथपत्र और विभागीय जवाब में माना था कि ये बदलाव राजेंद्र भारती और उनकी मां के कहने पर किए गए थे। बाद में बयान बदल देने से पहले दिए गए स्वीकारोक्ति वाले बयान खत्म नहीं हो जाते।



राज्य ने भी कहा- राहत देने जैसा कोई आधार नहीं

दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक ने भी बैंक के तर्कों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि की है। साथ ही, इस स्तर पर अदालत के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।



दोषसिद्धि पर रोक का कानून क्या कहता है?

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस मनोज जैन ने सुप्रीम कोर्ट के रामा नारंग, के.सी. सरीन, रविकांत एस. पाटिल, अफजल अंसारी और एंटनी राजू जैसे कई मामलों का हवाला दिया।



उन्होंने कहा कि अदालत के पास दोषसिद्धि पर रोक लगाने का अधिकार जरूर है, लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ बेहद खास और असाधारण मामलों में ही किया जा सकता है।



कोर्ट ने साफ किया कि सजा पर रोक लगना और दोषसिद्धि पर रोक लगना दोनों अलग-अलग बातें हैं। सिर्फ सजा रुक जाने से दोषसिद्धि अपने आप नहीं रुकती।



राहत दी तो हर दोषी जनप्रतिनिधि यही राहत मांगेगा

फैसले का सबसे अहम हिस्सा चुनाव लड़ने के अधिकार से जुड़ी दलील पर था। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सिर्फ इस वजह से दोषसिद्धि पर रोक लगा दी जाए कि कोई विधायक या सांसद उपचुनाव या अगला चुनाव नहीं लड़ पाएगा, तो फिर हर दोषी ठहराए गए नेता इसी आधार पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा।



अदालत ने कहा कि ऐसी परेशानी सिर्फ राजेंद्र भारती की नहीं है। हर उस सांसद या विधायक को इसका सामना करना पड़ता है, जिसे दोषसिद्धि के बाद जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव लड़ने से अयोग्य कर दिया जाता है। इसलिए इसे किसी एक व्यक्ति की खास या असाधारण स्थिति नहीं माना जा सकता।



कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव लड़ने का मौका खत्म होना कानून का सामान्य असर है। सिर्फ इस वजह से दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई जा सकती।



अदालत ने कहा कि यदि हर मामले में चुनाव लड़ने के अधिकार को आधार बनाकर दोषसिद्धि रोक दी जाएगी, तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का मकसद ही कमजोर हो जाएगा। इस कानून का उद्देश्य गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए लोगों को सार्वजनिक पदों से दूर रखना है।



ट्रायल कोर्ट के फैसले में नहीं दिखी कोई कानूनी खामी

दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की जांच के बाद कहा कि पहली नजर में फैसले में ऐसी कोई बड़ी गलती या कानूनी खामी नजर नहीं आती, जिससे लगे कि दोषसिद्धि आगे टिक नहीं पाएगी।



कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि एफडी (FD) की अवधि धीरे-धीरे बढ़ाई गई थी। कई सालों तक अतिरिक्त ब्याज लिया गया और सह-आरोपी ने शुरुआती बयानों में इस बदलाव की बात मानी थी। ऐसे में इस चरण पर दोषसिद्धि पर रोक लगाने के लिए कोई मजबूत आधार नहीं बनता।



नैतिकता के खिलाफ अपराधों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने यह भी कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि राजेंद्र भारती ने जनप्रतिनिधि और बैंक अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर रहते हुए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया। इससे उनके परिवार से जुड़े ट्रस्ट को फायदा पहुंचा।



कोर्ट ने कहा कि जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश जैसे अपराध गंभीर माने जाते हैं। ऐसे मामलों में अदालतों को दोषसिद्धि पर रोक लगाने का फैसला बहुत सोच-समझकर और सावधानी से लेना चाहिए।



आखिरकार कोर्ट ने खारिज कर दी याचिका

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि राजेंद्र भारती ऐसा कोई खास और असाधारण कारण नहीं बता पाए, जिसके आधार पर दोषसिद्धि पर रोक लगाई जा सके।



अदालत को ट्रायल कोर्ट के फैसले में भी ऐसी कोई बड़ी कानूनी गलती नहीं मिली, जिससे इस स्तर पर दखल देने की जरूरत पड़े। इसी वजह से कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।



हालांकि हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां सिर्फ अंतरिम आवेदन पर फैसला देने तक सीमित हैं। मुख्य आपराधिक अपील की अंतिम सुनवाई के समय पूरे मामले पर नए सिरे से विचार किया जाएगा।



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