भोपाल-ग्वालियर के बारे में सामने आया अनसुना रहस्य, ब्रिटिश काल से निकला कनेक्शन

Aman Vaishnav | Jul 06, 2026, 10:27 IST
रतलाम से मिला 149 साल पुराना दस्तावेज
एमपी के रतलाम जिले से 149 साल पुराना एक दुर्लभ शाही दस्तावेज मिला है। यह दस्तावेज साल 1877 के ऐतिहासिक दिल्ली दरबार के समय लिथोग्राफी तकनीक से तैयार किया गया था। इसमें अंग्रेजों द्वारा रियासतों की हैसियत तय करने के लिए तोपों की सलामी देने के का जिक्र है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • रतलाम जिले की जावरा रियासत से एक दुर्लभ शाही दस्तावेज मिला है।
  • यह दस्तावेज 149 साल पुराना है।
  • इसे ज्ञान भारत मिशन के तहत खोजा गया है।
  • यह 1877 के दिल्ली दरबार के समय लिथोग्राफी तकनीक से तैयार हुआ था।
  • इसमें अंग्रेजों की रियासतों के प्रति नीति का पूरा रिकॉर्ड है।

रतलाम से मिला 149 साल पुराना शाही दस्तावेज

मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में पुरातत्व विभाग को एक बड़ी कामयाबी मिली है। यहां जावरा रियासत से जुड़ी एक पुरानी लिखित प्रति सामने आई है। यह प्रति लगभग 149 साल पुरानी बताई जा रही है। इसे 1877 में हुए ऐतिहासिक दिल्ली दरबार के दौरान लिथोग्राफी तकनीक से तैयार कराया गया था।



यह दस्तावेज देवनागरी और उर्दू-फारसी मिश्रित खड़ी बोली में लिखा गया है। इसमें ब्रिटिश हुकूमत की भारतीय रियासतों के प्रति नीति दर्ज है। इसमें राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक तीनों पहलुओं का जिक्र है। यह जानकारी उस दौर की सत्ता व्यवस्था को समझने में मदद करती है।



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तोपों से तय होती थी हैसियत

दस्तावेज बताता है कि अंग्रेज रियासतों की हैसियत तोपों की सलामी से आंकते थे। नेपाल, बड़ौदा और ग्वालियर को सबसे ऊंचा दर्जा मिला था। इन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। वहीं भोपाल, त्रावणकोर और कोल्हापुर दूसरे नंबर पर थे। इन्हें 19 तोपों की सलामी मिलती थी।



खास बात यह है कि हिंदुस्तान से बाहर के शासकों को भी यह दर्जा मिला था। मस्कट जैसे क्षेत्र को सामरिक महत्व के कारण सर्वोच्च श्रेणी में रखा गया था। इससे पता चलता है कि अंग्रेजों की नजर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी।



अंग्रेजों की इनाम-दंड नीति

दस्तावेज में 1857 की क्रांति के बाद की नीति का भी जिक्र है। बड़ौदा रियासत ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसके बदले उसका तीन लाख रुपए का टैक्स माफ हुआ था। ग्वालियर और कोल्हापुर को अंग्रेजों का करीबी सहयोगी बताया गया है।



इस दस्तावेज में प्राकृतिक संसाधनों का भी जिक्र है। नेपाल के लौह, सोना, चांदी और गंधक जैसे खनिजों का विवरण दर्ज है। जम्मू-कश्मीर के केसर, अकीक और बिल्लौर का भी उल्लेख है। यह दिखाता है कि अंग्रेज रियासतों के संसाधनों पर भी नजर रखते थे।



मध्य प्रदेश पुरातत्व आयुक्त मदन बिभीषण नागरगोजे ने इस खोज पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बताया कि ज्ञान भारत मिशन के तहत प्रदेश से कई दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं। ये दस्तावेज भारत के अनछुए इतिहास को सामने ला रहे हैं। विभाग इन्हें अब डिजिटलाइज कर रहा है।



काबुल-मस्कट का सैन्य ब्यौरा

पुरातत्व विभाग के सलाहकार और लिपि विशेषज्ञ नईम उद्दीन ने इस दस्तावेज की पृष्ठभूमि बताई। यह प्रति जावरा रियासत के नवाब परिवार से जुड़ी है। रतलाम पुरातत्व टीम ने इसे जावरा के पुजारी संघ के प्रमुख महेश शर्मा से हासिल किया।



दस्तावेज में 17 प्रमुख देसी रियासतों का ब्यौरा है। इसके साथ काबुल और मस्कट जैसे भारत से बाहर के क्षेत्रों का भी उल्लेख है। इनका सैन्य, प्रशासनिक और आर्थिक विवरण दर्ज है। इससे साफ है कि अंग्रेज अपनी सुरक्षा के लिए इन क्षेत्रों पर भी नजर रखते थे।



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