Fathers day special: भोपाल के सरदार खान ने 310 अनाथ बच्चों को पालने घर तक रख दिया था गिरवी

Sanjay Dhiman | Jun 21, 2026, 18:15 IST
Photograph: (the sootr)
भोपाल के सरदार खान की खुद कोई संतान नहीं, फिर भी 39 साल में 310 बेसहारा बच्चों को पाला, पढ़ाया और डॉक्टर-इंजीनियर बनाया। मकान तक गिरवी रख दिया।

पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है


पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है



पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं


पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं...



कवि ओम व्यास की यह लाइनें भोपाल के उस शख्स पर सटीक बैठतीं है जिनकी खुद कोई संतान नहीं है। राजधानी भोपाल के सरदार खान, जो बेऔलाद है। उनके घर में कोई बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी। लेकिन उन्होंने इसे कमी नहीं बनने दिया। उन्होंने उन बच्चों को अपनाया जिन्हें दुनिया ने छोड़ दिया था।



39 साल पहले उन्होंने यह काम शुरू किया था। तब से अब तक 310 बच्चों की जिंदगी संवार चुके हैं। इनमें से कई बच्चे आज डॉक्टर और इंजीनियर हैं।



कोहेफिजा का ट्रेनिंग सेंटर बना उम्मीद की जगह

राजधानी भोपाल के कोहेफिजा इलाके में सरदार खान ने एक ट्रेनिंग सेंटर बनाया। यहां बच्चे सिर्फ पढ़ते नहीं है। वे हुनर भी सीखते है।



सरदार खान का मानना है कि असली मदद वही है जो इंसान को खुद खड़ा होना सिखाए। इसलिए उन्होंने बच्चों को ऐसे काम सिखाए जो उन्हें रोजी-रोटी दे सकें। अभी भी 30 बच्चे उनके साथ रह रहे हैं। वे उन्हें अलग-अलग हुनर की तालीम दे रहे हैं।



मकान गिरवी रखा, पर हौसला नहीं टूटा

इस सफर में आसान दिन नहीं थे। एक वक्त ऐसा भी आया जब पैसे खत्म हो गए। बच्चों की पढ़ाई रुकती दिखी। तब सरदार खान ने अपना मकान गिरवी रख दिया। पहली कक्षा से लेकर ग्रेजुएशन तक का खर्च उन्होंने खुद उठाया। कुछ जानने-पहचाने लोगों ने भी मदद की। मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया।



पिता ने दी थी यह सीख

सरदार खान बताते हैं कि यह नजरिया उन्हें अपने पिता जिया हुसैन खान से मिला। वे हवलदार थे। एक बार दुकान पर एक हट्टे-कट्टे भिखारी आए। सरदार ने उन्हें 5 रुपए दे दिए। पिता ने यह देखा तो नाराज हुए। उन्होंने कहा कि इस तरह पैसे देकर तुमने इस भले-चंगे इंसान को अपाहिज बना दिया। अगर वाकई मदद करनी है तो उसे कोई हुनर सिखाओ। यही बात सरदार खान के जीवन की बुनियाद बन गई।



बच्चों के लिए भगवान जैसे हैं सरदार खान

जिन बच्चों को सरदार खान ने पाला, वे उन्हें भगवान जैसा मानते हैं। उनका कहना है कि अपने तो दूर हो गए, लेकिन पापा ने कभी अनाथ नहीं महसूस होने दिया।



पढ़ाई के साथ मिली पहचान

बच्चों को सिर्फ डिग्री नहीं मिली। उन्हें आत्मनिर्भर बनाया गया। आज वे अपने परिवार चला रहे हैं। और उस शख्स को नहीं भूलते जिसने उन्हें जिंदगी दी।



अब आधुनिक हुनर की भी तैयारी

सरदार खान यहीं नहीं रुके। अब वे बच्चों को आधुनिक विधाओं की भी सीख देने की तैयारी कर रहे हैं। बदलते जमाने के हिसाब से बच्चों को तैयार करना उनकी नई जिम्मेदारी है।



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अनाथ बच्चों का सहारा



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