एमपी में मरीजों की जान को जोखिम में डाल रही, खून की कालाबाजारी

Sanjay Sharma | Jun 09, 2026, 23:29 IST
Photograph: (the sootr)
एमपी में लाल खून की कालाबाजारी नहीं थम रही है। सरकारी अस्पतालों में भी संक्रमित रक्तदाता का खून चढ़ाकर मरीजों की जान को खतरे में डाला जा रहा है। सतना में थैलेसीमिया पीड़ित 2 बच्चियों को पेड डोनर का संक्रमित खून चढ़ाने के लिए प्रबंधन जिम्मेदार है।

पांच पाइंट में समझें पूरा मामला

  • सतना में 2 थैलेसीमिया बच्चियों को संक्रमित खून चढ़ाने के केस से हुआ खुलासा।
  • HIV पॉजिटिव डोनर से खून लेकर मरीज को चढ़ाने से पहले नहीं की जांच ।
  • जरूरतमंद मरीजों को ब्लड यूनिट उपलब्ध कराने के नाम पर दलाली का खेल ।
  • जांच रिपोर्ट में सामने आई अस्पताल प्रबंधन और बिचौलियों की भी साठगांठ ।
  • अनाधिकृत और संग्रमित डोनर से ब्लड यूनिट लेने से जोखिम में मरीजों की जान।

सतना जिला अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित दो बच्चियों का इलाज चल रहा था। दोनों को हर 15 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है। अप्रैल 2026 में जांच के दौरान एक बच्ची HIV पॉजिटिव मिली। दूसरी बच्ची को हेपेटाइटिस B का संक्रमण हुआ। परिजनों के हंगामे के बाद जांच शुरू हुई। जिसमें सामने आया है कि ब्लड बैंक ने पेड डोनर से यह खून लिया था। दोनों ही ब्लड यूनिट देने वाले डोनर एचआईवी और हेपेटाइटिस से संक्रमित थे।



यह ब्लड यूनिट दलालों के जरिए बेचा गया था जिस पर जांच रिपोर्ट के जो लेवल चस्पा किए गए थे वे फर्जी थे। सतना जिला अस्पताल में संक्रमित खून चढ़ाने के मामले की जांच रिपोर्ट ने व्यवस्था से पर्दा हटा दिया है। वहीं मरीजों के परिजन उनके जीवन को जोखिम में डालने वाले जिम्मेदारों की संवेदनहीनता से स्तब्ध हैं।



सरकारी अस्पताल भी चपेट में

पेड डोनर का खेल सिर्फ निजी अस्पतालों तक सीमित नहीं है। प्रदेश के कई सरकारी अस्पताल के ब्लड बैंक भी दलालों की सक्रियता से अछूते नहीं है। साथ में ब्लड डोनर न होने और मरीज की गंभीर स्थिति के चलते परिजनों को अब भी खून खरीदने जैसे हालात का सामना करना पड़ रहा है। एक यूनिट के 2000 से 5000 रुपए तक वसूले जाते हैं।



खून उपलब्ध कराने वाले दलाल नशे की लत के शिकार और आर्थिक तंगी से घिरे जरूरतमंदों से रक्तदान कराते हैं। यही दलाल ब्लड बैंक को रक्तदान कराने के बाद उसे संबंधित जरूरतमंद मरीज को कीमत वसूलकर बेंच देते हैं। इसमें ब्लड बैंक के कर्मचारियों की जल्दबाजी के चलते अकसर ब्लड सैंपल की दोबारा जांच ही नहीं कराई जाती।



बैंकों में ब्लड यूनिट की कमी

MP में खून की जरूरत का 60 प्रतिशत हिस्सा पेड डोनर से पूरा होता है। NACO की गाइडलाइन के अनुसार केवल स्वैच्छिक रक्तदान होना चाहिए। लेकिन अस्पतालों में डोनर नहीं मिलने पर परिजन दलालों से संपर्क करते हैं। सतना में पिछले एक साल में एक भी बड़ा रक्तदान शिविर नहीं लगा। जागरूकता की कमी से संकट बढ़ रहा है।



पहले भी सामने आए मामले

सतना में संक्रमित व्यक्ति का ब्लड मरीजों को चढ़ाने का मामला इकलौता नहीं है। ऐसे मामले बार-बार सामने आने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग व्यवस्था को चाक चौबंद नहीं कर पा रहा है। मई 2025 में रीवा मेडिकल कॉलेज में तीन थैलेसीमिया बच्चों को HIV संक्रमित व्यक्ति का खून चढ़ा दिया गया था।



2024 में जबलपुर में हेपेटाइटिस C से पीड़ित मरीजों से रक्तदान कराने के मामले सामने आए थे। इन मामलों के बाद हर बार जांच के आदेश हुए, लेकिन अब भी दलालों पर लगाम नहीं कसी जा सकी। वहीं विभाग की ओर से पुलिस में दर्ज मामले भी सिर्फ एफआईआर और जांच तक की सिमटे हुए हैं।



दलालों का नेटवर्क मजबूत

खून के दलालों का पूरा नेटवर्क काम करता है। ये अस्पताल के बाहर मंडराते रहते हैं। जरूरतमंद परिजनों को फंसाकर मोटी रकम वसूलते हैं। कई बार अस्पताल के कर्मचारी भी मिले होते हैं। पेड डोनर को 500 रुपए देकर 5000 रुपए तक में खून बेचा जाता है। इनमें से ज्यादातर डोनर नशे के आदी होते हैं। उनकी जांच भी ठीक से नहीं होती है। इस वजह से थैलेसीमिया और दूसरी बीमारियों से जूझ रहे मरीज रक्तदान के बाद और भी जोखिम का शिकार हो रहे हैं।



रक्तदान पर टिकी जिंदगी

MP में 4000 से ज्यादा थैलेसीमिया बीमारी से पीड़ित बच्चे हैं। हर महीने हर एक पीड़ित को 1 से 2 यूनिट खून चढ़ाना होता है। इनमें से ज्यादातर मरीजों को तो ब्लड बैंक में उपलब्धता के आधार पर ब्लड यूनिट मिल जाती है। इसके बावजूद कुछ बच्चों को उनकी जरूरत के मुताबिक ब्लड ग्रुप नहीं मिल पाता। बच्चों के लिए परिजनों को दौड़भाग करनी होती है।



हर महीने रक्तदान करना मुनासिब नहीं होने के कारण उन्हें इसके लिए दूसरों पर निर्भर रहता होता है। इसी वजह से अकसर वे दलालों के संपर्क में आ जाते हैं। खून की उपलब्धता पर्याप्त न होने के कारण सरकार द्वारा थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को निशुल्क ब्लड यूनिट मुहैया कराने के दावे भी फीके पड़ रहे हैं।



FAQ

  1. सतना में थैलेसीमिया बच्चियों के साथ क्या हुआ है?
    सतना जिला अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित दो बच्चियों को संक्रमित खून चढ़ाया गया। एक बच्ची HIV पॉजिटिव और दूसरी हेपेटाइटिस B से संक्रमित हुई। जांच में सामने आया कि यह खून पेड ब्लड डोनर से लिया गया था। दलालों ने नकली रिपोर्ट के जरिए सरकारी ब्लड बैंक में खून बेचा था।
  2. पेड ब्लड डोनर पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है?
    प्रशासन स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा नहीं दे पाया है। अस्पतालों में खून की कमी होने पर परिजन दलालों से संपर्क करते हैं। सरकारी और निजी ब्लड बैंक में जांच में लापरवाही होती है। पुलिस की कार्रवाई सिर्फ कागजी होती है। जागरूकता की कमी और सख्ती न होने से पेड ब्लड डोनर का धंधा चल रहा है।
  3. पेड डोनर का खून थैलेसीमिया मरीजों के लिए क्यों खतरनाक है?
    थैलेसीमिया मरीजों को हर 15 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है। पेड डोनर अक्सर नशे के आदी या बीमार होते हैं। बिना सही जांच के उनका खून लेने से HIV, हेपेटाइटिस B और C का खतरा रहता है। सतना और रीवा में ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। इससे बच्चों की जान को गंभीर खतरा होता है।

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