स्कूल शिक्षा विभाग के अफसरों को 62 साल तक नौकरी का हक नहीं, 60 में ही होगा रिटायरमेंट, HC से 14 याचिकाएं खारिज

Neel Tiwari | Sootr Creatives | Oct 08, 2026, 18:26 IST
62 साल की नौकरी का दावा खारिज: शेखर चंद्र वर्मा समेत 14 याचिकाओं पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का अहम फैसला
MP High Court ने स्कूल शिक्षा विभाग की retirement age पर फैसला सुनाया। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की बेंच ने 14 याचिकाएं खारिज कीं। कोर्ट ने 62 साल की नौकरी का दावा नहीं माना। लोक शिक्षण संचालनालय के उप संचालक शेखर चंद्र वर्मा मुख्य याचिकाकर्ता थे। अंतरिम आदेश के दौरान मिला वेतन वापस नहीं होगा। पेंशन 60 साल के आधार पर बनेगी।

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र को लेकर लंबे समय से चल रहे 14 मामलों का एक साथ फैसला किया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की बेंच ने शेखर चंद्र वर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य को मुख्य मामला मानते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। इन मामलों में कर्मचारियों ने 60 साल की जगह 62 साल तक सेवा में बने रहने का अधिकार मांगा था।



समझें क्या है पूरा मामला

1. हाईकोर्ट में 14 याचिकाओं में 60 की जगह 62 साल तक सेवा का लाभ मांगा गया था।



2. याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़े हैं, इसलिए उन्हें बढ़ी हुई उम्र का लाभ मिलना चाहिए।



3. कोर्ट ने कहा कि केवल प्रशासनिक पद पर काम करना किसी कर्मचारी को शासकीय शिक्षक नहीं बनाता।



4. जिन मामलों में 20 साल की जरूरी शैक्षणिक सेवा पूरी नहीं हुई, वहां भी 62 साल की उम्र का लाभ नहीं मिलेगा।



5. अंतरिम आदेश के कारण 60 साल के बाद किया गया काम का वेतन वापस नहीं लिया जाएगा, लेकिन पेंशन 60 साल की उम्र के आधार पर तय होगी।




विवाद की जड़ में क्या था FR 56(1-A)

पूरे विवाद का केंद्र मूलभूत नियम यानी FR 56(1-A) और उससे जुड़ा स्पष्टीकरण था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि स्कूल शिक्षा विभाग में काम करने वाले और शैक्षणिक काम से जुड़े अधिकारियों को 62 साल की सेवानिवृत्ति उम्र का लाभ मिलना चाहिए। दूसरी तरफ राज्य का तर्क था कि यह लाभ हर कर्मचारी को नहीं दिया जा सकता। इसके लिए कर्मचारी का शैक्षणिक संवर्ग से जुड़ा होना जरूरी है।



शेखर चंद्र वर्मा का मामला कैसे शुरू हुआ

मुख्य याचिकाकर्ता शेखर चंद्र वर्मा लोक शिक्षण संचालनालय में उप संचालक के पद पर थे। उनकी शुरुआती नियुक्ति 1980 में सहायक सांख्यिकी अधिकारी के रूप में हुई थी। बाद में वे सहायक संचालक और उप संचालक बने। सरकार ने उन्हें 31 जनवरी 2016 को 60 साल की उम्र पूरी होने पर रिटायर करने का आदेश जारी किया था। उन्होंने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।




याचिकाकर्ता ने क्यों मांगी 62 साल की उम्र

शेखर चंद्र वर्मा की ओर से तर्क दिया गया कि उन्होंने स्कूल शिक्षा विभाग में रहते हुए अनौपचारिक शिक्षा केंद्र, टीकमगढ़ में अध्यापन और शैक्षणिक कार्य भी किया था। इसके समर्थन में 3 मई 1982 का एक प्रमाण पत्र पेश किया गया। उनका कहना था कि बाद में प्रशासनिक पद पर पदोन्नति होने के कारण उन्हें शिक्षकों को मिलने वाले 62 साल की सेवा के लाभ से बाहर नहीं किया जा सकता।



14 मामलों में दो तरह के विवाद थे

हाईकोर्ट ने इन मामलों को दो श्रेणियों में देखा। पहली श्रेणी में यह सवाल था कि संबंधित कर्मचारी शैक्षणिक संवर्ग से जुड़े थे या नहीं। दूसरी श्रेणी में ऐसे कर्मचारी थे, जिन्होंने पहले शैक्षणिक सेवा की थी, लेकिन 20 साल की जरूरी शैक्षणिक सेवा पूरी नहीं की थी। इनमें यह भी सवाल था कि प्रशासनिक पद पर नियुक्ति के बाद पुराने शैक्षणिक पद पर उनका पूर्वाधिकार यानी lien खत्म हो गया था या नहीं।




कोर्ट ने 62 साल की उम्र का दावा क्यों नहीं माना

बेंच ने साफ किया कि स्कूल शिक्षा विभाग में प्रशासनिक पद पर काम करने मात्र से कोई कर्मचारी बढ़ी हुई सेवानिवृत्ति उम्र का हकदार नहीं हो जाता। इसी तरह शिक्षा से जुड़े प्रशासनिक काम करना भी कर्मचारी को अपने आप शासकीय शिक्षक का दर्जा नहीं देता। इसके लिए नियमों में तय शर्तों को पूरा करना जरूरी है।



सिर्फ अध्यापन का दावा पर्याप्त नहीं

कोर्ट के मुताबिक किसी कर्मचारी ने कभी अध्यापन जैसा काम किया हो, इससे उसे अपने आप शैक्षणिक संवर्ग का कर्मचारी नहीं माना जा सकता। संबंधित व्यक्ति की नियुक्ति किस संवर्ग में हुई, उसके पास जरूरी योग्यता क्या थी और उसे आधिकारिक तौर पर किस पद पर नियुक्त किया गया था, ये बातें महत्वपूर्ण हैं।



20 साल की शैक्षणिक सेवा भी जरूरी

हाईकोर्ट ने उन मामलों पर भी स्थिति साफ की, जिनमें कर्मचारियों ने पहले शैक्षणिक सेवा की थी। कोर्ट ने कहा कि यदि निर्धारित 20 साल की qualifying teaching service पूरी नहीं हुई है, तो केवल पहले की शैक्षणिक सेवा के आधार पर 62 साल की सेवानिवृत्ति का लाभ नहीं दिया जा सकता।



प्रशासनिक पद पर नई नियुक्ति का भी असर

कोर्ट ने यह भी माना कि यदि कर्मचारी को प्रशासनिक पद पर लोक सेवा आयोग या किसी अलग चयन प्रक्रिया के जरिए नई नियुक्ति मिली और इसके कारण उसके पुराने शैक्षणिक पद पर lien खत्म हो गया, तो बाद की सरकारी सेवा को अपने आप शैक्षणिक सेवा नहीं माना जा सकता। सरकारी सेवा लगातार चलने से पुराने शैक्षणिक पद का पूर्वाधिकार भी लगातार बना रहे, यह जरूरी नहीं है।




शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक संवर्ग में अंतर सही

याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 14 और 16 के आधार पर भेदभाव का सवाल भी उठाया था। उनका कहना था कि समान प्रशासनिक पदों पर काम करने वाले अधिकारियों में सिर्फ संवर्ग के आधार पर अंतर नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक संवर्ग का अंतर नियुक्ति की प्रकृति, जरूरी योग्यता और संबंधित नियमों पर आधारित है।



फर्जी प्रमाण पत्र के आरोप पर भी पक्ष रखा गया

शेखर चंद्र वर्मा की ओर से पेश 1982 के प्रमाण पत्र की प्रामाणिकता पर भी राज्य ने सवाल उठाया था। याचिकाकर्ता ने इसका खंडन किया और कहा कि प्रमाण पत्र पर लिखी तारीख को गलत तरीके से पढ़ा गया है। उन्होंने सेवा पुस्तिका और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, टीकमगढ़ से मिले दस्तावेजों का भी हवाला दिया। हालांकि कोर्ट ने इन दावों के बावजूद 62 साल की सेवा का अधिकार स्वीकार नहीं किया।



पुराने फैसलों का भी दिया गया हवाला

याचिकाकर्ताओं की ओर से 1989 के मप्र सहायक जिला शाला निरीक्षक संघ मामले का भी हवाला दिया गया। उनका कहना था कि उस फैसले में स्कूल शिक्षा विभाग के प्रशासनिक पक्ष से जुड़े अधिकारियों के लिए 62 साल की उम्र को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई थी और सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने मौजूदा मामलों के तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर अलग निष्कर्ष निकाला।



अंतरिम आदेश से 60 साल के बाद मिली नौकरी का वेतन नहीं लौटाना होगा

इस मामले में कर्मचारियों के लिए एक राहत भी है। कुछ याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों के कारण 60 साल की उम्र पूरी होने के बाद भी नौकरी करते रहे। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने न्यायालय के आदेश के संरक्षण में वास्तव में काम किया है। इसलिए उस अवधि में मिला वेतन और दूसरे मौद्रिक लाभ उनसे वापस नहीं लिए जाएंगे।



लेकिन पेंशन 60 साल के आधार पर ही मिलेगी

हाईकोर्ट ने साफ किया कि अंतरिम आदेश के कारण 60 साल के बाद की सेवा से 62 साल की रिटायरमेंट का स्थायी अधिकार नहीं बनता। अब संबंधित कर्मचारियों की पेंशन और दूसरे सेवानिवृत्ति लाभों की गणना 60 साल की उम्र को ही रिटायरमेंट उम्र मानकर की जाएगी।



14 याचिकाएं खारिज, सरकार को लाभों की गणना के निर्देश

अदालत ने सभी संबंधित रिट याचिकाएं खारिज कर दीं। राज्य को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ताओं की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 साल मानकर पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभों का पुनरीक्षण किया जाए। हालांकि अंतरिम आदेश के दौरान 60 साल के बाद दी गई सेवा के बदले पहले भुगतान की गई रकम की वसूली नहीं होगी।



  1. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र को लेकर क्या फैसला सुनाया है?
    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 60 साल की उम्र पर सेवानिवृत्त होने का आदेश दिया और सभी 14 याचिकाएं खारिज कर दीं, जिसमें कर्मचारियों ने 62 साल की सेवा का अधिकार मांगा था।
  2. क्या सभी स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारी 62 साल तक सेवा में रह सकते हैं?
    नहीं, केवल उन कर्मचारियों को 62 साल की सेवानिवृत्ति उम्र का लाभ मिलेगा जो शैक्षणिक संवर्ग से जुड़े हैं और जिन्होंने 20 साल की आवश्यक शैक्षणिक सेवा पूरी की हो।
  3. अगर किसी कर्मचारी ने 60 साल के बाद काम किया है, तो क्या उनका वेतन वापस लिया जाएगा?
    नहीं, हाईकोर्ट ने कहा है कि अंतरिम आदेश के तहत 60 साल के बाद की सेवा के लिए मिला वेतन वापस नहीं लिया जाएगा, लेकिन पेंशन 60 साल की उम्र के आधार पर तय होगी।
Tags:
  • मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
  • सेवानिवृत्ति की उम्र
  • 62 साल की नौकरी
  • स्कूल शिक्षा विभाग
  • शेखर चंद्र वर्मा
  • लोक शिक्षण संचालनालय
  • MP High Court
  • स्कूल शिक्षा विभाग में प्रशासनिक पद
  • लोक सेवा आयोग
  • टीकमगढ़