ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्रस्ट पर उज्जैन की प्रॉपर्टी केस में उठे सवाल, कौन है ट्रस्टी, कैसे होते हैं चुनाव
कागजों में सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट का मुख्यालय ग्वालियर के जयविलास पैलेस परिसर में दर्ज है। ट्रस्ट के पास ग्वालियर के अलावा उज्जैन समेत कई शहरों में प्रॉपर्टी है। उज्जैन में बैजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स, गोपाल मंदिर और जवाहर मार्ग स्थित पाटनी बाजार की संपत्तियां भी ट्रस्ट से जुड़ी बताई जाती हैं। इन जगहों पर कई किराएदार लंबे समय से रह रहे हैं या कारोबार कर रहे हैं। इन्हीं किराएदारों को बेदखली के नोटिस मिलने के बाद मामला तूल पकड़ लिया है।
किस तरह से उठा मामला
बैजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स के दुकानदारों को 16 अक्टूबर 2019 को नोटिस मिला था। इसमें दुकानों का किराया बढ़ाकर 10 हजार रुपए करने की बात कही गई थी। दुकानदारों से पुराना बकाया चुकाने और दुकान खाली करने के लिए भी कहा गया था।
इसके खिलाफ दुकानदार उज्जैन जिला कोर्ट पहुंचे। मामला चतुर्थ व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ खंड की अदालत में गया, लेकिन वहां से दुकानदारों को राहत नहीं मिली। अक्टूबर 2025 में कोर्ट ने किराएदारों को बकाया राशि जमा करने और दो महीने के भीतर दुकान खाली करने का आदेश दिया थे।
मामला उच्च न्यायाधीश के पास पहुंचा
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ किराएदारों ने ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाया था। मामला उज्जैन के पंचम जिला न्यायाधीश की अदालत में पहुंचा। यहां सुनवाई के दौरान सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट को लेकर ही कई अहम सवाल खड़े हो गए थे।
सवाल सिर्फ प्रॉपर्टी तक सीमित नहीं रहे। अदालत में ट्रस्ट के अस्तित्व और उसकी कानूनी स्थिति को लेकर भी बहस हुई थी। इन सवालों पर ट्रस्ट की ओर से दिए गए जवाबों से अदालत संतुष्ट नहीं हुई थी। इसके बाद जिला न्यायाधीश ने निचली अदालत का आदेश खारिज कर दिया और किराएदारों को राहत दे दी गई थी।
अब सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट इस फैसले के खिलाफ इंदौर हाईकोर्ट पहुंचा है। यानी मामला अब केवल किराए और दुकान खाली कराने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ट्रस्ट के कानूनी अस्तित्व का सवाल भी इस विवाद के केंद्र में आ गया है।
सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट को लेकर यह सवाल
- सबसे बड़ा सवाल चेयरमैन को लेकर है। कोर्ट में लगी याचिका में ज्योतिरादित्य सिंधिया को ट्रस्ट का ट्रस्टी और चेयरमैन बताया गया है। लेकिन उनके हस्ताक्षर वाला कोई दस्तावेज या इस संबंध में कोई पत्र पेश नहीं किया गया।
- ट्रस्ट में और कौन-कौन ट्रस्टी हैं? इसकी जानकारी भी कोर्ट के सामने नहीं रखी गई।
- पहले ट्रस्टी कौन थे और नए ट्रस्टी कैसे चुने जाते हैं? इस प्रक्रिया के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी गई।
- किराएदारों को हटाने का फैसला कब हुआ? नोटिस जारी करने से पहले प्रस्ताव कब पास हुआ और किसने मंजूरी दी, इसका रिकॉर्ड भी सामने नहीं रखा गया।
- उज्जैन कोर्ट में केस किस अधिकार से पेश किया गया? ट्रस्ट की ओर से केस मैनेजर रंगनाथ इंगले और पुजारी अर्पित जोशी ने मामला पेश किया। बाद में बयान देने राणा करण सिंह पहुंचे। सवाल यह है कि इन्हें किसने अधिकृत किया, इसका कोई साफ रिकॉर्ड नहीं दिया गया।
- कोर्ट में बताया गया कि रंगनाथ इंगले का निधन हो चुका है और अर्पित जोशी का पता नहीं है।
- ट्रस्ट की ओर से कोई ठहराव-प्रस्ताव और ऑडिट रिपोर्ट कोर्ट में पेश नहीं की गई।
- सबसे अहम सवाल संपत्ति के मालिकाना हक पर है। यह दावा किया गया कि बैजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स ट्रस्ट की संपत्ति है, लेकिन इसके समर्थन में कोई दस्तावेज या सबूत पेश नहीं किया गया।
ट्रस्ट तो पुणे में रजिस्टर्ड है
सुनवाई के दौरान ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन को लेकर भी बड़ा सवाल सामने आया है। रिकॉर्ड के मुताबिक सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट 05 फरवरी 1958 को बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 के तहत पुणे, महाराष्ट्र में रजिस्टर्ड हुआ था। यानी ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन मध्य प्रदेश में नहीं हुआ थी।
दूसरी ओर ट्रस्ट की तरफ से दावा किया गया कि उसका रजिस्ट्रेशन जून 1952 में ग्वालियर में हुआ था। इसी विरोधाभास ने मामले को और उलझा दिया है।
एक और अहम बात सामने आई है। बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत किसी मुकदमे के लिए ट्रस्ट को संबंधित आयुक्त की मंजूरी लेना जरूरी होता है। अदालत में यह भी सामने आया कि इस मामले में ऐसी मंजूरी नहीं ली गई थी।
अभी ट्रस्ट में कौन है
जानकारी के मुताबिक, सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट में चेयरमैन ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। ट्रस्टियों में उनकी पत्नी प्रियदर्शनी राजे, पुत्र महानआर्यमन सिंधिया, मृणालिनी सिंह व अन्य हैं। सचिव राणा करण सिंह बताए गए हैं।
उज्जैन में यह संपत्तियां
वहीं उज्जैन के प्रसिद्ध श्री द्वारकाधीश गोपाल मंदिर समेत कई ऐतिहासिक धरोहरों का प्रबंधन सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट, ग्वालियर करता है।
ट्रस्ट के दायरे में उज्जैन का गोपाल मंदिर, राणोजी की छतरी, मदन मोहन मंदिर के साथ कुछ जमीनें और भवन भी बताए गए हैं। इन धार्मिक और ऐतिहासिक संपत्तियों के रखरखाव की जिम्मेदारी भी इसी ट्रस्ट के पास है।