सिंधिया ने फटकारा, दिग्विजय ने मांगी माफी! अफसरशाही से डील करने के कैसे-कैसे तरीके ?
News Strike. एक अफसर की खातिर दिग्विजय सिंह ने कैलाश विजयवर्गीय सहित दूसरे विधायकों से माफी मांगी थी। ये बात उस समय की है, जब दिग्विजय सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। दो दशक से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद विजयवर्गीय ने खुद इस घटना का जिक्र किया है। इसे इत्तेफाक ही कहा जा सकता है कि जब विजयवर्गीय अफसरों से जुड़ा ये किस्सा सुना रहे थे तब प्रदेश के एक हिस्से में उन्हीं की पार्टी के केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक कलेक्टर को लताड़ रहे थे। एक किस्सा दरियादिली का है तो दूसरा क्लास लगाने का है। आप दोनों सुनिए और बताइए कि अफसरों के साथ डील करने में जनप्रतिनिधि का कौन सा रवैया बेहतर है।
नमस्कार,
ये मध्यप्रदेश की अफसरशाही से जुड़े दो किस्से। दोनों में एक ही फेक्टर कॉमन है, वो है अफसरों की मनमानी। लेकिन उससे डील करने का तरीका अलग-अलग है। एक दिग्विजय के दौर का किस्सा है और एक ताजा किस्सा है। जो चंद घंटे पहले ही हुआ है। दिलचस्प बात ये है कि दिग्विजय के दौर के किस्से की तारीफ भी बीजेपी के ही नेता और दिग्गज मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने की है। वो भी भरी सभा में, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, सीएम मोहन यादव और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार भी मौजूद थे। और दूसरे किस्से के नायक हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया। हम पुराने किस्से की बात बाद में करेंगे, ताजा किस्सा पहले जान लेते हैं।
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सिंधिया के तेवर देख अफसरशाही कांप रही होगी
आमतौर पर सिंधिया बहुत शालीनता के साथ अपनी सभाओं में नजर आते हैं। एक-एक कदम सधा हुआ। सोच समझकर बोला गया एक-एक शब्द और बॉडी लेंग्वेज पर फुल कंट्रोल। लेकिन इस बार मंच पर सिंधिया ने जो तेवर दिखाए हैं उसे देखकर यकीनन प्रदेश की पूरी अफसरशाही थर थर कांप रही होगी। उनके आगे जिले के कलेक्टर की बोलती बंद थी और वो किसी बाबू की तरह कागजों को जमा रहा था।
ये मामला अशोक नगर में हुए जनसुनवाई कार्यक्रम का है। अशोक नगर जनपद पंचायत में जनसुनवाई कार्यक्रम में सिंधिया के सामने थोक में शिकायतें आईं। सिंधिया ने कई शिकायतें इत्मिनान से सुनीं और कई बार कार्रवाई के निर्देश भी दिए। साथ ही जनता को आश्वासन भी दिया कि उनकी शिकायतें जल्द दूर होंगी। कार्यक्रम पूरा हुआ तो सभास्थल का बोरिया बिस्तरा समेटा जाने लगा। वहां मौजूद कलेक्टर साकेत मालवीय भी जनसुनवाई में आई शिकायतों को थैले में रखकर जाने लगे, लेकिन सिंधिया ने जब ये नजारा देखा तो कलेक्टर साहेब को रोक ही लिया।
उन्होंने बिना देर किए कलेक्टर को फटकार लगाई। उनका कहना था कि वो सब कागज नहीं लोगों की उम्मीदें हैं, जिन्हें ठीक से रखा जाना चाहिए। उसके बाद कलेक्टर खुद ही एक-एक कर सारे कागज जमाने पर मजबूर हो गए। उन्होंने कुछ कागज वापस थैले में रखे। लेकिन सिंधिया का पारा इतना हाई था कि उन्होंने कागज फिर से निकालकर कलेक्टर को दिए और कहा कि सारे एकसाथ करके अच्छे से रखिए। आप भी सिंधिया का ये अंदाज देखिए.
मिजाज में तल्खी, लेकिन आपा नहीं खोया
गौर करने वाली बात ये भी है कि सिंधिया की आवाज में सख्ती जरूर थी और मिजाज में तल्खी थी, लेकिन उन्होंने आपा नहीं खोया। वर्ना मध्यप्रदेश में ऐसे बहुत से किस्से हैं, जब जनप्रतिनिधियों ने भरे मंच से अफसरों को जबरदस्त फटकार भी लगाई है। सिंधिया की तरह ही सीएम मोहन यादव भी अफसरों को समय समय पर मंच से डपटते रहे हैं और आम जनता के काम करने के लिए मोटिवेट करते रहे हैं। हालांकि कांग्रेस सरकार के इस रवैये को इवेंट की तरह प्रोजेक्ट करती रही है। कुछ दिन पहले ही हमने न्यूज स्ट्राइक पर इससे जुड़ी रिपोर्ट पेश की थी कि अफसरों को हड़काने की इस परंपरा पर कांग्रेस का क्या रिएक्शन है। उस एपिसोड की लिंक डिस्क्रिप्शन बॉक्स में है।
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कांग्रेस इसे इवेंट कह भी सकती है, क्योंकि कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार में आलम कुछ और रहा है। जिसका जिक्र मैंने शुरुआत में ही किया था। इसे महज किस्सा इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये बात खुद मोहन सरकार के आला मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कही है। वो भी तारीफ के अंदाज में। उन्होंने जिस मंच से ये बात कही उस मंच पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार भी बैठे थे, जो अफसरों को फटकार लगाने की परंपरा को इवेंट बता चुके हैं।
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विधायकों से बदसलूकी पर झुके दिग्विजय
ये कार्यक्रम विधानसभा की समितियों का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में कैलाश विजयवर्गीय विधानसभा समितियों के सदस्यों की ताकत बता रहे थे। उन्होंने कहा कि समितियों की ताकत विधानसभा के बराबर ही होती है, जो अफसरों को झुकने पर मजबूर कर देती है। आशय था विधायकों को समितियों की अहमियत समझाना। जिसके लिए उन्होंने एक पुराना किस्सा भी सुना। ये तब की बात है जब कैलाश विजयवर्गीय पहली बार विधायक बनकर सदन में पहुंचे थे, सीएम थे दिग्विजय सिंह। समझा जा सकता है सरकार कांग्रेस की थी और विजवर्गीय बीजेपी के विधायक थे। तब सागर के कलेक्टर और एसपी ने विधायकों के साथ बदसलूकी की थी। उस समय समिति से जुड़े होने के नाते विधायक काफी नाराज हुए। इसका खामियाजा कलेक्टर और एसपी को भुगतना पड़ सकता था। लेकिन तब सीएम दिग्विजय सिंह आगे आए और अफसरों के सलूक पर माफी मांगी। विजयवर्गीय ने चुटकी लेते हुए ये भी कहा कि दिग्विजय सिंह लोगों को मनाने में माहिर थे। उन्होंने विधायकों से पर्सनली बात की और माफी मांगी। उनका तर्क था कि विधायकों की नाराजगी से अफसरों के करियर पर दाग लग जाएगा। विजयवर्गीय ने ये भी कहा कि दिग्विजय सिंह के इस अंदाज से ब्यूरोक्रेसी में एक अच्छा मैसेज गया। वो विधायकों की ताकत को समझ गए। साथ ही सरकार के रवैये के भी कायल हो गए।
मध्यप्रदेश में अक्सर अफसरशाही के सिस्टम पर हावी होने की खबरें आती रहती हैं। साल 2023 के चुनाव से पहले भी अफसरशाही गंभीर समस्या बन चुकी थी। क्या इसलिए सांसद या मंत्री अफसरों को मंच पर फटकार कर ये जताने की कोशिश करते हैं कि उनके आगे अफसरों की नहीं चलती। अफसरशाही से डील करने के मैं आपको दोनों तरीके बता चुका हूं। मैंने पहले पूछा भी था, अब फिर पूछता हूं आपको दोनों में से कौन सा तरीका बेहतर या सही लगता है।
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