SEIAA में किसकी चलेगी? स्टाफ के तबादलों पर अध्यक्ष और ACS में ठनी, मामला मुख्य सचिव और केंद्र तक पहुंचा

Ramanand Tiwari | Oct 08, 2026, 12:30 IST
पर्यावरण मंजूरी की फाइलों के बीच अफसरों में खींचतान SEIAA अध्यक्ष ने ACS के खिलाफ लिखा पत्र
मध्यप्रदेश की पर्यावरणीय मंजूरी देने वाली संस्था SEIAA में प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर विवाद सामने आया है। SEIAA अध्यक्ष शिवनारायण सिंह चौहान ने अपर मुख्य सचिव (ACS) अनिरुद्ध मुखर्जी पर कामकाज में हस्तक्षेप और कर्मचारियों के बार-बार तबादले करने के आरोप लगाए हैं। उन्होंने इस मामले में मुख्य सचिव और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है।
​Madhya Pradesh SEIAA Chairman Shivnarayan Singh Chauhan has written to the Chief Secretary and the Union Ministry of Environment, alleging that Additional Chief Secretary (ACS) Aniruddh Mukherjee has interfered in staff transfers and the authority’s functioning.

पर्यावरणीय मंजूरियों पर फैसला करने वाली SEIAA के भीतर अब सवाल सिर्फ अफसरों के मतभेद का नहीं है। असली सवाल यह है कि अथॉरिटी के कार्यालय और स्टाफ पर प्रशासनिक नियंत्रण आखिर किस सीमा तक होना चाहिए? अध्यक्ष शिवनारायण सिंह चौहान ने मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को पत्र भेजकर ACS अनिरुद्ध मुखर्जी पर स्टाफ तबादलों और काम में हस्तक्षेप के आरोप लगाए हैं। इसी बीच करीब 200 लंबित मामलों और 237 ड्रीम्ड अनुमति प्रकरणों के निपटारे का दबाव भी बना हुआ है।



चेयरमैन का पत्र क्यों गंभीर है?

SEIAA यानी स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी का काम ऐसे मामलों पर निर्णय लेना है, जिनका सीधा संबंध परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृति से होता है। इसलिए यहां स्टाफ की उपलब्धता और फाइलों की नियमित प्रक्रिया केवल कार्यालयीन व्यवस्था का विषय नहीं रह जाती।



अध्यक्ष शिवनारायण सिंह चौहान ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि कार्यालयीन कर्मचारियों के बार-बार तबादले से काम प्रभावित हो रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कर्मचारियों पर काम सीमित रखने का दबाव बनाया जा रहा है और ऐसा नहीं करने पर हटाने की बात कही जाती है।



असली सवाल-स्टाफ बदला तो फाइलों पर क्या असर?

इस विवाद में सबसे बड़ा सवाल कर्मचारियों के बार-बार होने वाले तबादलों को लेकर है। किसी भी विभाग में जब कर्मचारी लगातार बदलते हैं तो नए कर्मचारियों को पुरानी फाइलें और कामकाज समझने में समय लगता है। उन्हें यह भी जानना पड़ता है कि कौन सा मामला कहां तक पहुंचा है और आगे क्या कार्रवाई करनी है।



SEIAA में करीब 200 मामले लंबित बताए जा रहे हैं। ऐसे में अगर अध्यक्ष के आरोप सही हैं तो यह देखना जरूरी है कि कर्मचारियों के तबादलों से कामकाज पर कितना असर पड़ा है। क्या इसकी वजह से मामलों की सुनवाई या फैसले लेने में देरी हुई है?



सिर्फ यह बताना काफी नहीं है कि कर्मचारियों के तबादले हुए हैं। यह भी साफ होना चाहिए कि कितने कर्मचारियों को बदला गया। उनके तबादले क्यों किए गए और इन तबादलों की वजह से कितनी फाइलों का काम प्रभावित हुआ।



237 प्रकरणों ने बढ़ाई संवेदनशीलता

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि SEIAA में कथित ड्रीम्ड अनुमति से जुड़े 237 मामले सामने हैं। इन मामलों की सुनवाई होनी है और नियमों के मुताबिक आगे की कार्रवाई भी पूरी की जानी है।



ऐसे समय में जब SEIAA के पास पर्यावरण से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मामले हैं, उसके अध्यक्ष ने कामकाज में दखल देने की शिकायत मुख्य सचिव और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंचाई है। इससे साफ है कि विभाग के अंदर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अध्यक्ष और अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी नजर आ रही है। हालांकि आरोपों की सच्चाई सामने आना अभी बाकी है।



पत्र सीधे मुख्य सचिव और केंद्र तक क्यों?

चौहान ने अपनी शिकायत केवल विभागीय स्तर तक सीमित नहीं रखी। उन्होंने मुख्य सचिव के साथ केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भी मामले की जानकारी दी है।



इस कदम का प्रशासनिक अर्थ महत्वपूर्ण है। अध्यक्ष चाहते हैं कि स्टाफ और SEIAA की कार्यप्रणाली से जुड़े विवाद पर उच्च स्तर से स्थिति स्पष्ट हो।



उन्होंने ACS अनिरुद्ध मुखर्जी को भी कथित हस्तक्षेप नहीं करने की सलाह दिए जाने की बात कही है।



अब जवाब तीन सवालों का चाहिए

सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि SEIAA कार्यालय के स्टाफ की पदस्थापना और स्थानांतरण के अधिकार की प्रशासनिक सीमा क्या है।



दूसरा, अध्यक्ष द्वारा लगाए गए दबाव, तबादले और कर्मचारियों को हटाने संबंधी आरोपों पर विभाग का तथ्यात्मक पक्ष क्या है।



तीसरा और सबसे अहम सवाल यह है कि इस विवाद के कारण लंबित पर्यावरणीय मामलों की सुनवाई या निर्णय प्रभावित हुए हैं या नहीं।



किसी पर्यावरणीय नियामक संस्था के अध्यक्ष को स्टाफ और कार्यप्रणाली में कथित हस्तक्षेप की शिकायत मुख्य सचिव और केंद्र तक पहुंचानी पड़े, तो यह संस्थागत समन्वय पर सवाल पैदा करता है। ऊपर से लंबित मामलों का दबाव इस विवाद को सामान्य प्रशासनिक मतभेद से अधिक गंभीर बनाता है।



अब सरकार के सामने चुनौती केवल पत्र का जवाब देने की नहीं है। उसे यह भी साफ करना होगा कि SEIAA में प्रशासनिक नियंत्रण की सीमा क्या है और लंबित पर्यावरणीय फाइलें इस खींचतान की कीमत तो नहीं चुका रहीं?

Tags:
  • seiaa
  • SEIAA
  • अनिरुद्ध मुखर्जी
  • स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी
  • शिवनारायण सिंह चौहान
  • केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय
  • मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल
  • पर्यावरणीय मंजूरियों