सीनियर एडवोकेट बनने की शर्त पर हाईकोर्ट सख्त, रजिस्ट्रार जनरल और सरकार को नोटिस
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट पद से जुड़े एक नियम पर नोटिस जारी किया है। यह नियम सीनियर एडवोकेट बनने के लिए 12 लाख रुपए सालाना आय अनिवार्य करता है। भोपाल के वकील राजेश नेमा ने इस शर्त को असंवैधानिक बताते हुए याचिका दायर की। जबलपुर स्थित प्रधान पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की प्रधान पीठ जबलपुर में एक अहम याचिका पर सुनवाई हुई। यह याचिका सीनियर एडवोकेट के पदनाम से जुड़ी है। मामला सीधे प्रदेश के वकीलों के करियर से जुड़ा है।
क्या है पूरा विवाद
साल 2025 में एक नया नियम बना। इसका नाम है 'द हाईकोर्ट ऑफ मध्य प्रदेश (डेजिग्नेशन ऑफ सीनियर एडवोकेट्स) रूल्स, 2025'। इसमें सीनियर एडवोकेट बनने के लिए कई शर्तें रखी गईं।
इन्हीं में से एक शर्त पर अब सवाल उठा है। नियम 07 के तहत वकील को कम से कम 10 साल तक आयकर दाता होना जरूरी है। साथ ही पिछले तीन वित्तीय वर्षों का आईटीआर (ITR – Income Tax Return) देना होगा। इसमें वकालत से न्यूनतम 12 लाख रुपए सालाना शुद्ध आय दिखानी होगी।
याचिका में क्या तर्क
भोपाल निवासी अधिवक्ता राजेश नेमा ने यह याचिका दायर की है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान वे खुद कोर्ट में मौजूद रहे और अपना पक्ष रखा।
नेमा का कहना है कि नियम 07 पूरी तरह मनमाना है। यह वकीलों पर बेवजह दबाव बनाता है। उनके अनुसार यह शर्त संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है। याचिका में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी हवाला दिया गया है।
नेमा ने कोर्ट में कहा कि कई वकील अपनी ईमानदारी, ज्ञान और मेहनत से बार में ऊंचा स्थान रखते हैं। सिर्फ आय की सीमा तय करने से ऐसे योग्य वकील आवेदन से वंचित रह जाते हैं।
अन्य राज्यों से तुलना
सुनवाई के दौरान एक अहम बिंदु सामने आया। मध्य प्रदेश के पड़ोसी राज्यों में सीनियर एडवोकेट पद के लिए ऐसी कोई न्यूनतम आय शर्त नहीं है। याचिका में बताया गया कि उन राज्यों में प्रति व्यक्ति आय मध्य प्रदेश से ज्यादा है। इसके बावजूद वहां यह शर्त लागू नहीं है।
अदालत ने क्या कहा
मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने की। पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब देने के निर्देश दिए गए हैं।
सुनवाई में रजिस्ट्रार जनरल की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ सेठ मौजूद रहे। राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता डॉ. एस. एस. चौहान ने पक्ष रखा। दोनों ने अग्रिम नोटिस पर उपस्थिति दर्ज कराई।
आगे क्या होगा
युगलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है। तब तक रजिस्ट्रार जनरल और राज्य सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा। इस पर कोर्ट का फैसला प्रदेश के कई वकीलों के करियर को प्रभावित कर सकता है।
यह याचिका डब्ल्यूपी नंबर 28492/2026 (W.P. – Writ Petition) के नाम से दर्ज है। इसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की वेबसाइट पर देखा जा सकता है।
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