गांव बचाने किसानों ने दान की करोड़ों की जमीन, 14 साल बाद हुआ समस्या का समाधान
शिवपुरी के बिजरौनी गांव में हर मानसून में बाढ़ आती है। गांव तक पहुंचने वाली पुलिया नदी में डूब जाती है। सात किसानों ने अपनी करोड़ों की जमीन बिना मुआवजे के दान की। अब यहां 36 फीट चौड़ा नया बायपास बनेगा। सरकार ने इस सड़क के लिए 1.33 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं।
बाढ़ में टापू बनता गांव
शिवपुरी जिले के बदरवास इलाके में बिजरौनी गांव बसा है। हर बारिश में यहां हालात मुश्किल हो जाते हैं। गांव के पास बहने वाली बसेड़ी नदी उफान पर आ जाती है।
नदी की छोटी पुलिया पूरी तरह डूब जाती है। इससे गांव का बाकी इलाके से संपर्क टूट जाता है। लोग खुद को एक टापू पर फंसा हुआ महसूस करते हैं।
बीमार मरीजों को अस्पताल ले जाना मुश्किल हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई भी बाधित होती है। किसानों का व्यापार भी हर साल ठप पड़ जाता है।
36 फीट चौड़ा नया बायपास
इस पुरानी समस्या का हल अब निकल आया है। गांव के सात किसान खुद आगे आए। उन्होंने खेतों की जमीन देने की सहमति दी।
पहले यहां सिर्फ 5 फीट की कच्ची पगडंडी थी। अब यह 36 फीट यानी 12 मीटर चौड़ी बनेगी। यह बायपास करीब 1500 मीटर लंबा होगा।
रूट की पूरी जानकारी
रास्ता गांव के आयुर्वेदिक औषधालय से शुरू होगा। यह सीधे गौशाला तक जाएगा। आगे यह खतौरा रोड से जुड़ जाएगा। इससे लोगों को बार-बार नदी पार करने की जरूरत नहीं रहेगी।
किसानों ने नहीं मांगा मुआवजा
सातों किसानों ने 6 जुलाई को नोटरी के सामने शपथ पत्र तैयार कराया। यह शपथ पत्र लोक निर्माण विभाग (PWD – Public Works Department) को सौंपा गया।
शपथ पत्र में साफ लिखा है कि जमीन का कोई मुआवजा नहीं लिया जाएगा। न तो मौजूदा किसान और न ही उनके वारिस भविष्य में दावा करेंगे। इस तरह किसानों ने अपनी करोड़ों की जमीन बिना किसी शर्त के दान कर दी।
2012 से अटका था काम
इस सड़क की योजना नई नहीं है। इसकी शुरुआत साल 2012-13 में हुई थी। उस समय के विधायक स्वर्गीय रामसिंह यादव ने यह प्रस्ताव तैयार कराया था।
लेकिन जमीन की कमी के चलते काम आगे नहीं बढ़ पाया। अब उनके बेटे महेंद्र सिंह यादव कोलारस से मौजूदा विधायक हैं। उनकी अनुशंसा पर सरकार ने बजट मंजूर किया।
इस सड़क के लिए 1 करोड़ 33 लाख रुपये स्वीकृत हुए हैं। बजट होने के बावजूद जमीन नहीं मिलने से यह काम लंबे समय तक रुका रहा। अब किसानों की पहल से यह रुकावट दूर हो गई है।
गांव के 'महादानी' किसान
इस पहल में सात किसानों ने अहम भूमिका निभाई। इनमें प्रकाशपुरी गोस्वामी, नंदराम किरार और बृजेश किरार शामिल हैं।
इनके साथ राजा भैया किरार और गिर्राज किरार भी शामिल हुए। रमेश पटेल और विजय सिंह किरार ने भी जमीन दी। सभी सातों किसान बिजरौनी गांव के ही निवासी हैं।
गांव में अब इन्हें प्यार से 'महादानी' कहा जा रहा है। लोगों का कहना है कि यह त्याग आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बनेगा।
अब शुरू हुआ निर्माण कार्य
जमीन मिलते ही विभाग ने काम शुरू कर दिया है। प्रस्तावित रास्ते पर खुदाई का काम चल रहा है। शुरुआती निर्माण भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है।
जानकारों का मानना है कि बायपास बनने से आसपास की जमीन की कीमत भी बढ़ेगी। इससे गांव के अन्य किसानों को भी अप्रत्यक्ष फायदा हो सकता है।
मानसून में अब गांव का संपर्क नहीं टूटेगा। मरीजों, बच्चों और व्यापारियों को सीधी राहत मिलेगी। बिजरौनी गांव के लिए यह बदलाव बड़ी उम्मीद लेकर आया है।
आगे की चुनौतियां भी बाकी
जमीन मिलने के बाद भी काम पूरा होने में समय लगेगा। बायपास जितना लंबा है, उतनी ही मेहनत भी लगेगी। बारिश के मौसम में निर्माण कार्य धीमा भी पड़ सकता है।
विभाग को समय पर सामग्री और मजदूर उपलब्ध कराने होंगे। स्थानीय प्रशासन की निगरानी भी जरूरी रहेगी। ग्रामीणों को उम्मीद है कि काम बिना रुकावट पूरा होगा।
गांव के लिए बड़ी राहत
बिजरौनी गांव के लोग वर्षों से इस सड़क का इंतजार कर रहे थे। हर साल बारिश में उन्हें परेशानी झेलनी पड़ती थी। अब यह सपना हकीकत बनता दिख रहा है।
किसानों के इस त्याग ने पूरे इलाके में चर्चा शुरू कर दी है। लोग इसे सामूहिक जिम्मेदारी की मिसाल बता रहे हैं। ऐसे उदाहरण अन्य गांवों को भी प्रेरणा दे सकते हैं।
बिजरौनी की यह कहानी बताती है कि छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। सात किसानों के फैसले ने पूरे गांव का भविष्य बदल दिया है।
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