सरकारी नीलामी से खरीदी संपत्ति पर वास्तविक कीमत के आधार पर ही लगेगी स्टांप ड्यूटी

Ratan Kumar Mishra | Jul 02, 2026, 23:58 IST
सरकारी नीलामी से खरीदी संपत्ति पर
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने खुली सरकारी नीलामी में तय कीमत को बाजार मूल्य माना। कोर्ट ने 5.49 करोड़ रुपए की अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और दो प्रतिशत मासिक जुर्माना रद्द कर दिया।

समझें क्या है पूरा मामला

  • सरकारी नीलामी संपत्ति पर वास्तविक बिक्री मूल्य मान्य होगा।
  • कलेक्टर गाइडलाइन से अतिरिक्त शुल्क वसूली गैर-कानूनी है।
  • हाईकोर्ट ने 5.49 करोड़ रुपए का आदेश निरस्त किया।
  • दो प्रतिशत मासिक जुर्माने का आदेश भी रद्द हुआ।
  • मामला मुरैना बस डिपो की ई-नीलामी से जुड़ा था।

ग्वालियर हाईकोर्ट ने क्या कहा

ग्वालियर खंडपीठ की सिंगल बेंच ने यह अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि सरकारी ओपन ऑक्शन से खरीदी गई संपत्ति पर स्टांप ड्यूटी वास्तविक बिक्री मूल्य पर ही देय होगी। ऐसे मामलों में कलेक्टर गाइडलाइन के आधार पर ज्यादा शुल्क मांगना मनमाना और गैर-कानूनी माना गया है।



जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने इस मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जब कोई संपत्ति खुली सरकारी नीलामी के जरिए बिकती है, तो उसका बाजार मूल्य वही माना जाएगा जो प्रतिस्पर्धी बोली में तय हुआ हो। ऐसे में गाइडलाइन के आधार पर अतिरिक्त मांग कानून के अनुसार सही नहीं है।



क्या था पूरा विवाद

यह मामला मुरैना में स्थित बस डिपो-कम-बस स्टैंड की जमीन से जुड़ा था। यह जमीन ब्लॉक-ए में स्थित है। मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने इस व्यावसायिक भूमि का बाजार मूल्य 1.12 लाख रुपए प्रति वर्गमीटर आंका था। निगम ने इसकी रिजर्व प्राइस 65.27 करोड़ रुपए तय की थी।



याचिकाकर्ता कंपनी मैसर्स श्री शांति सोल्वेक्स प्राइवेट लिमिटेड ने खुली प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लिया। कंपनी ने सबसे ऊंची बोली 67.35 करोड़ रुपए की लगाई। राज्य सरकार ने इस बोली को मंजूरी दे दी। इसके बाद 16 अक्टूबर 2023 को एसडीओ (SDO – Sub Divisional Officer) मुरैना ने राज्य सरकार की ओर से बिक्री विलेख का पंजीयन कराया।



कलेक्टर ने क्यों मांगा अतिरिक्त शुल्क

बिक्री विलेख के पंजीयन के बाद कलेक्टर ऑफ स्टांप्स, मुरैना ने अलग रुख अपनाया। कलेक्टर ने गाइडलाइन मूल्य के आधार पर स्टांप शुल्क की कमी बताई। इस कमी की राशि 5 करोड़ 49 लाख 46 हजार 247 रुपए आंकी गई।



कलेक्टर ने इस राशि पर 2 प्रतिशत प्रतिमाह की दर से जुर्माना भी लगाया। कंपनी ने इस आदेश को गलत मानते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। कंपनी का तर्क था कि जब बिक्री खुली प्रतिस्पर्धी नीलामी से हुई है, तो गाइडलाइन दर लागू करना उचित नहीं है।



कोर्ट ने आदेश को क्यों रद्द किया

हाईकोर्ट ने कंपनी की दलील को सही माना। कोर्ट ने कहा कि खुली नीलामी में तय हुई कीमत ही असली बाजार मूल्य दर्शाती है। ऐसे में कलेक्टर गाइडलाइन को आधार बनाकर अतिरिक्त शुल्क मांगना तर्कसंगत नहीं है।



इसी आधार पर कोर्ट ने कलेक्टर के आदेश को अवैध करार दिया। कोर्ट ने साढ़े पांच करोड़ रुपए की स्टांप शुल्क कमी और उस पर लगे जुर्माने को पूरी तरह रद्द कर दिया। यह फैसला याचिकाकर्ता कंपनी के पक्ष में आया है।



इस फैसले का असर किन पर होगा

यह फैसला सरकारी नीलामी से संपत्ति खरीदने वाले सभी खरीदारों के लिए राहत भरा माना जा रहा है। खासकर उन मामलों में जहां संपत्ति प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया से बेची जाती है। ऐसे खरीदारों को अब गाइडलाइन दर पर अतिरिक्त स्टांप शुल्क का डर नहीं रहेगा।


कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला आगे के समान मामलों में नजीर बन सकता है। सरकारी विभाग या निगम जब खुली नीलामी से संपत्ति बेचते हैं, तो अब स्टांप शुल्क को लेकर स्पष्टता बनी रहेगी।



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