चंबल में अवैध रेत खनन पर SC सख्त, कहा-सिर्फ ड्राइव ही नहीं असली माफिया को पकड़ना जरूरी
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में होने वाले अवैध रेत खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को सख्त संदेश दिया है।
अदालत ने साफ-साफ कहा है कि पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई सिर्फ ट्रकों के ड्राइवरों और हेल्परों को पकड़ने तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए।
इस खेल को सच में बंद करना है तो अवैध खनन के पीछे छिपे असली चेहरों तक पहुंचना बहुत जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल चंबल अभयारण्य में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन हो रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट खुद संज्ञान में लेकर सुनवाई कर रहा है। बुधवार, 20 मई को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले पर लंबी सुनवाई की।
इस दौरान मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए वकीलों ने बताया कि, उन्होंने कोर्ट के पुराने आदेशों का पालन करने के लिए क्या-क्या कदम उठाए हैं।
कोर्ट ने फिलहाल सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट ने कहा है कि 26 मई को इस पर एक बड़ा और विस्तृत आदेश जारी किया जाएगा।
राज्यों ने कोर्ट को क्या बताया?
सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू कोर्ट में पेश हुए थे। उन्होंने सरकार का पक्ष रखते हुए बताया कि जंगल के इलाकों में अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए निगरानी काफी बढ़ा दी गई है।
खासकर ऐसे वाहनों पर पैनी नजर रखी जा रही है जिनका कोई रजिस्ट्रेशन नहीं है। उन्होंने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि कई गाड़ियों के चालान काटे गए हैं। साथ ही अवैध खनन को रोकने के लिए लगातार जमीनी स्तर पर कार्रवाई की जा रही है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने टोकते हुए कहा कि छोटे कर्मचारियों या ड्राइवरों पर कार्रवाई करना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक आप इस पूरे नेटवर्क को नहीं तोड़ेंगे और मुख्य आरोपियों को नहीं पकड़ेंगे तब तक यह अवैध धंधा बंद नहीं होगा।
निगरानी के लिए तीन राज्यों का नया रोडमैप
अदालत में सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश, तीनों ही राज्यों ने अवैध खनन को रोकने के लिए एक आधुनिक प्लान तैयार किया है।
| राज्य | सुरक्षा और निगरानी का नया प्लान |
| मध्य प्रदेश, राजस्थान और यूपी | संवेदनशील इलाकों में जीपीएस सिस्टम और हाई-रिजॉल्यूशन सीसीटीवी कैमरे लगाने का रोडमैप पेश किया। |
| राजस्थान | अवैध खनन के लिए इस्तेमाल होने वाले 40 संवेदनशील रास्तों की पहचान की है। |
वरिष्ठ अधिवक्ता और अमिकस क्यूरी निखिल गोयल ने कोर्ट को बताया कि राज्यों ने अपनी रिपोर्ट तो जमा कर दी है। वहीं जमीन पर पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर और मजबूत निगरानी तंत्र तैयार करने के लिए उन्हें थोड़ा और समय चाहिए।
राजस्थान सरकार पर भी बरसी अदालत
इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में वन विभाग के ढीले कामकाज और फॉरेस्ट गार्ड की भारी कमी पर भी गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित स्टाफ का होना जरूरी है। वहीं राजस्थान में उनकी जगह होमगार्ड से काम लिया जा रहा है।
अदालत ने यहां तक कहा कि उन्हें ऐसी जानकारी मिली है कि होमगार्ड वन विभाग की गाड़ियां तक चला रहे हैं। ये सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल ठीक नहीं है।
राजस्थान सरकार की तैयारी
राजस्थान सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि चिन्हित किए गए 40 रास्तों पर कैमरे लगाने के लिए फंड मंजूर हो चुका है। सरकार इस पूरे काम को एक साल के भीतर पूरा कर लेगी।
इन कैमरों का सीधा कनेक्शन अभय कमांड कंट्रोल सेंटर से किया जाएगा ताकि लाइव नजर रखी जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को यह आदेश भी दिया है कि, वे फॉरेस्ट गार्ड की खाली पड़े पदों को भरने की प्रक्रिया को तेजी से पूरा करें।
मुरैना बॉर्डर के पुल पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण NHAI को भी पक्षकार बनाया है। कोर्ट का ध्यान मुरैना-धौलपुर बॉर्डर के पास बने एक मुख्य पुल की तरफ गया है।
अदालत ने एनएचएआई से इस पुल की सुरक्षा को लेकर एक विस्तृत हलफनामा मांगा है। कोर्ट का मानना है कि पुल के आस-पास जिस तरह से लगातार अवैध रेत खनन हो रहा है, उससे पुल की मजबूती और सुरक्षा को बड़ा खतरा हो सकता है।
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