अब FIR से फैसलों तक में नहीं चलेंगे अपमानजनक शब्द, नई जेंडर गाइडबुक को मंजूरी
समझें क्या है पूरा मामला...
- सुप्रीम कोर्ट ने नई जेंडर गाइडबुक के ड्राफ्ट को मंजूरी दी है।
- यह गाइडबुक भोपाल की नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी में तैयार हुई है।
- जस्टिस अनिरुद्ध बोस के नेतृत्व में पांच एक्सपर्ट की टीम ने इसे बनाया है।
- अदालतों और पुलिस में अब चरित्रहीन जैसे शब्द नहीं चलेंगे।
- दुष्कर्म पीड़िता से जुड़े कई पुराने अपमानजनक शब्द हटाए गए हैं।
देश की अदालतों और पुलिस व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं से जुड़े मामलों की भाषा पर नई पहल की है। कोर्ट ने जेंडर गाइडबुक के नए ड्राफ्ट को मंजूरी दे दी है। यह गाइडबुक अब पूरे देश की अदालतों में लागू होगी।
यह ड्राफ्ट भोपाल की नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (एनजेए) में तैयार हुआ है। एकेडमी के निदेशक जस्टिस (सेवानिवृत्त) अनिरुद्ध बोस ने इसका नेतृत्व किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने सभी अदालतों को निर्देश दिए हैं। एफआईआर और चार्जशीट में भी इस गाइडलाइन का पालन जरूरी है।
पुरानी हैंडबुक क्यों बदली गई
पुरानी हैंडबुक अगस्त 2023 में आई थी। उस समय सीजेआई (Chief Justice Of India) डीवाई चंद्रचूड़ ने इसकी पहल की थी। कोर्ट ने पाया कि पुरानी हैंडबुक बहुत तकनीकी और अकादमिक थी। आम लोगों और पुलिस को इसे समझने में दिक्कत होती थी। इसलिए नई हैंडबुक को सरल और व्यावहारिक बनाया गया है।
पुरानी हैंडबुक में एक विवादित टिप्पणी भी शामिल थी। इसमें लिखा था कि प्रभावशाली जातियों के पुरुष जातिगत वर्चस्व चाहते थे। इसके लिए वे यौन हिंसा का इस्तेमाल करते थे। इस विवादित लाइन को नई गाइडबुक से पूरी तरह हटा दिया गया है।
गाइडबुक से पुराने सांस्कृतिक मुहावरे भी हटाए गए हैं। जैसे जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता रमते हैं। कोर्ट का कहना है कि अब कानूनी अधिकारों पर ध्यान देना जरूरी है।
अब कौन से शब्द बदले गए
नई गाइडबुक में कई अपमानजनक शब्दों की जगह नए शब्द दिए गए हैं। जैसे प्रोस्टीट्यूट या कॉल गर्ल की जगह अब सेक्स वर्कर लिखा जाएगा। रखैल की जगह अब पार्टनर शब्द इस्तेमाल होगा।
पीड़ित महिला के लिए पुराने शब्द भी बदले गए हैं। प्रॉसीक्यूट्रिक्स (Prosecutrix) या असहाय महिला की जगह अब पीड़ित, शिकायतकर्ता या सर्वाइवर लिखा जाएगा। शीलभंग करना जैसे शब्द अब नहीं लिखे जाएंगे। इसकी जगह यौन हमला या स्वायत्तता उल्लंघन लिखा जाएगा।
चरित्रहीन शब्द को भी पूरी तरह हटा दिया गया है। इसकी जगह पीड़ित की शारीरिक स्वायत्तता के उल्लंघन जैसे शब्द इस्तेमाल होंगे। पीड़ित के चरित्र से जुड़े सबूत अब अदालत में अप्रासंगिक माने जाएंगे।
बच्चों से जुड़े शब्द भी बदले गए हैं। सिखाया गया बच्चा की जगह अब बाल गवाह, नाबालिग या बाल पीड़ित लिखा जाएगा। होमोसेक्सुअल शब्द अब इस्तेमाल नहीं होगा। पुरुष के लिए गे और महिला के लिए लेस्बियन शब्द लिखा जाएगा।
अदालती प्रक्रिया के नियम
नई गाइडबुक में अदालती प्रक्रिया के लिए भी कई नए नियम बनाए गए हैं। यौन अपराधों के मामलों में नाबालिग की सहमति मान्य नहीं होगी। कोर्ट अब सबूतों पर ध्यान देगा, ना कि अटकलों पर।
गोल्ड डिगर जैसी धारणाओं को भी खारिज किया गया है। पीड़िता के कपड़ों, व्यवहार या पुराने इतिहास पर सवाल नहीं उठाए जाएंगे। देर से रिपोर्ट करने को भी शक की नजर से नहीं देखा जाएगा।
टू फिंगर टेस्ट पर रोक
दुष्कर्म के मामलों में टू फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। कोर्ट ने इसे अपमानजनक और अप्रासंगिक करार दिया है। यह टेस्ट पीड़िता की गरिमा के खिलाफ माना गया है। महिला संगठन लंबे समय से इस टेस्ट को बंद करने की मांग करते हैं।
गवाहों को मिलेगा सम्मान
नई गाइडबुक में गवाहों के लिए भी नया नजरिया अपनाया गया है। अब गवाहों को डराने वाले सवाल नहीं पूछे जाएंगे। कोर्ट में उन्हें सम्मान के साथ पेश आने का निर्देश दिया गया है। गाइडबुक कहती है कि गवाह अब अतिथि की तरह माने जाएंगे।
कमेटी में कौन कौन शामिल
इस गाइडबुक का ड्राफ्ट पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने तैयार किया है। समिति की अध्यक्षता जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने की। इसमें गुजरात हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सोनिया गोकानी भी शामिल थीं।
समिति में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. सूरत सिंह भी थे। शिक्षाविद प्रो. लूसी जेवलो ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। अनुराधा शंकर सिंह मध्य प्रदेश कैडर की पूर्व आईपीएस (Indian Police Service) अधिकारी हैं। वे भी समिति का हिस्सा थीं। इनमें से दो सदस्य भोपाल से जुड़े हैं।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह गाइडबुक महिलाओं के लिए न्याय आसान बनाएगी। पुलिस अफसरों को भी अब इसी भाषा में एफआईआर और चार्जशीट लिखनी होगी। इससे पीड़िताओं को कोर्ट में बार बार शर्मिंदा होने से राहत मिलेगी।
कानूनी जानकारों का कहना है कि भाषा बदलने से सोच भी बदलती है। अदालत के पुराने शब्द अक्सर पीड़िता पर ही सवाल खड़े करते थे। नई गाइडबुक इस पुरानी सोच को खत्म करने की कोशिश है। इससे पीड़िता को दोषी जैसा महसूस नहीं होगा।
महिला अधिकार संगठनों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि पुरानी भाषा से न्याय मिलने में देरी होती थी। कई बार गवाह और पीड़िता दोनों कोर्ट जाने से डरते थे। नई गाइडबुक से यह डर काफी हद तक कम होगा।
अब देखना है कि निचली अदालतें और थाने इसे कितनी जल्दी अपनाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इसका पालन अनिवार्य होगा। आने वाले समय में इसका असर पुलिस और अदालतों में साफ दिखेगा।
सोर्स: सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल की आधिकारिक जानकारी पर आधारित।
FAQ
- नई जेंडर गाइडबुक क्या है?
यह सुप्रीम कोर्ट की एक नई हैंडबुक है, जिसे भोपाल की नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी में जस्टिस अनिरुद्ध बोस के नेतृत्व में तैयार किया गया है। इसका मकसद अदालतों और पुलिस में महिलाओं के प्रति इस्तेमाल होने वाली भाषा को सुधारना है। इसमें चरित्रहीन जैसे अपमानजनक शब्दों को हटाकर तटस्थ और सम्मानजनक शब्द जोड़े गए हैं। यह गाइडबुक पुरानी अगस्त 2023 वाली हैंडबुक की जगह लेगी। - टू फिंगर टेस्ट पर रोक क्यों लगाई गई?
सुप्रीम कोर्ट ने टू फिंगर टेस्ट को अपमानजनक और वैज्ञानिक रूप से अप्रासंगिक माना है। यह टेस्ट दुष्कर्म पीड़िता की गरिमा और निजता के खिलाफ पाया गया। महिला अधिकार संगठन लंबे समय से इसे बंद करने की मांग कर रहे थे। नई गाइडबुक में अब इस टेस्ट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। - नई जेंडर गाइडबुक से आम लोगों को क्या फायदा होगा?
इससे पुलिस एफआईआर और चार्जशीट में महिलाओं के लिए सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल होगा। पीड़िता के चरित्र, कपड़ों या व्यवहार पर सवाल नहीं उठाए जाएंगे। गवाहों को भी अदालत में अतिथि जैसा सम्मान मिलेगा। इससे न्याय प्रक्रिया तेज, निष्पक्ष और मानवीय बनेगी।
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