मध्यप्रदेश स्वामित्व योजना: 25 दिन बाद मकानों की रजिस्ट्री फिर शुरू, पटवारियों के अधिकार से लेकर दस्तावेजों तक बदले नियम
रजिस्ट्री की रफ्तार और फील्ड पर काम का दबाव
बता दें कि 17 सितंबर से शुरू हुई मध्यप्रदेश स्वामित्व योजना (mp swamitva yojana) को लेकर प्रशासन पर तय समय में लक्ष्य पूरा करने का दबाव बना हुआ है। इसी दबाव के चलते पटवारी अब रात के समय भी गांवों में जाकर मकानों और जमीनों की फोटो खींच रहे हैं।
अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो सोमवार के दिन पूरे प्रदेश में कुल 5 हदार 723 रजिस्ट्रियां दर्ज की गईं। वहीं राजधानी भोपाल में इस दौरान सिर्फ 46 रजिस्ट्रियों का काम पूरा हो सका है।
पुराने और नए नियमों में क्या-क्या बदलाव हुए?
प्रशासन ने रजिस्ट्री की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए दस्तावेजों और अधिकारियों की जिम्मेदारी से जुड़े कई नियमों को बदल दिया है।
पहले लागू थे ये पुराने नियम
- रजिस्ट्री में पटवारी की भूमिका: पहले रजिस्ट्री करने वाले पटवारी को ही सीधे तौर पर अधिकारी बना दिया गया था।
- दस्तावेज पर पता: कागजों में सरकारी दफ्तर की जगह पटवारी के खुद के घर का पता दर्ज किया जाता था।
- पदनाम का उल्लेख: दस्तावेज के हर पन्ने पर सिर्फ नियामक शब्द लिखा रहता था।
- जमीन का रिकॉर्ड: रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी तरह भूलेख पोर्टल के पुराने रिकॉर्ड पर टिकी थी।
- भत्ते की व्यवस्था: पटवारियों को मकान नंबर तय करने के बदले अलग से भत्ता मिलता था।
- जानकारी छिपाने की शर्त: विवादित संपत्ति की बात छिपाने पर जवाबदेही की कोई अलग शर्त तय नहीं थी।
अब लागू हो चुके हैं ये नए नियम
- सरकारी हैसियत: अब पटवारी निजी तौर पर नहीं, बल्कि सरकार की ओर से तय संशोधित पदनाम के साथ रजिस्ट्री करेंगे।
- दफ्तर का पता: अब कागजों पर पटवारी के घर का पता नहीं, बल्कि संबंधित तहसील और कार्यालय का नाम लिखा जाएगा।
- नया पदनाम: अब हर पन्ने पर योजनांतर्गत अधिकृत निम्नांकित अधिकारी लिखा होना जरूरी कर दिया गया है।
- नया रिकॉर्ड आधार: अब भूलेख पोर्टल के बजाय रजिस्ट्री वाले दिन मौजूद स्वामित्व अधिकार रिकॉर्ड को मुख्य आधार माना जाएगा।
- भत्ते की शर्त हटी: अब मकान नंबर कायम करने वाली भत्ते की पुरानी शर्त रजिस्ट्री के दस्तावेज से पूरी तरह हटा दी गई है।
- मालिक की जिम्मेदारी: अगर किसी ने जमीन या मकान के पुराने झगड़े की जानकारी छिपाई, तो उसके लिए सीधे संपत्ति धारक को जिम्मेदार माना जाएगा।
विवादित मकानों की रजिस्ट्री पर क्या खड़ा हुआ है संकट?
वहीं अगर किसी विवादित मकान या जमीन की रजिस्ट्री हो जाती है, तो क्या होगा? कई गांवों में जमीन की सीमाओं और मालिकाना हक को लेकर पहले से विवाद चल रहे हैं। कई जगहों पर जमीन का सही सीमांकन भी नहीं हुआ है। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि किसकी जमीन कहां खत्म होती है और दूसरे की कहां से शुरू होती है।
ऐसे में अगर कोई गलत जानकारी देकर या मिलीभगत से रजिस्ट्री करा लेता है, तो विवाद और बढ़ सकता है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि तहसील कोर्ट में चल रहे ऐसे मामलों को सुलझाने के लिए अब तक कोई अलग गाइडलाइन नहीं बनाई गई है। यानी अगर किसी विवादित जमीन या मकान की रजिस्ट्री हो जाती है, तो पीड़ित को अपने हक के लिए सिविल कोर्ट जाना पड़ेगा।