सरकार से मध्यस्थता की मांग लेकर डीपीआई के सामने शिक्षकों का हल्ला बोल
News in Short
- टीईटी अनिवार्यता के आदेश के खिलाफ शिक्षक संगठनों ने विरोध किया।
- 1.5 लाख से अधिक शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं।
- शिक्षकों ने टीईटी आदेश को रेट्रोस्पेक्टिव और अन्यायपूर्ण बताया।
- शिक्षक संगठनों ने सरकार से टीईटी आदेश रद्द करने की मांग की।
- 18 अप्रैल को प्रदेश स्तर पर बड़ा महाधरना आयोजित करने की योजना।
News in Detail
मध्यप्रदेश के शिक्षक संगठनों ने टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) को अनिवार्य करने के आदेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। भोपाल में लोक शिक्षण संचालनालय के बाहर प्रदेश के कई जिलों से शिक्षक जमा हुए और प्रदर्शन किया। इसके साथ ही शिक्षकों के संगठनों ने सरकार से पुराने शिक्षकों की सेवाओं को सुरक्षित रखने की मांग की। वहीं शिक्षक संगठनों ने प्रदर्शन के दौरान सरकार द्वारा अनदेखी करने पर चरणबद्ध आंदोलन की रणनीति भी तैयार की।
नए नियम के विरोध में पुराने शिक्षक
शिक्षक संगठनों का कहना है कि 2011 से पहले नियुक्त हुए 70,000 शिक्षक इस आदेश से प्रभावित होंगे। वे इसे रेट्रोस्पेक्टिव और अन्यायपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि टीईटी 2011 में अनिवार्य किया गया था। ऐसे में इसे पुराने शिक्षकों पर लागू करना तार्किक नहीं है। इससे पुराने शिक्षकों की योग्यता और नौकरी पर संकट आ गया है।
DPI के आदेश से सुलगा विरोध
लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा टीईटी की अनिवार्यता के आदेश ने शिक्षकों को नाराज कर दिया है। इस आदेश के जरिए्र सेवानिवृत्ति पांच साल से अधिक होने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी परीक्षा पास करनी होगी। आदेश में शिक्षकों को टीईटी पास करने के लिए दो साल की अवधि भी तय की गई है। इस आदेश को शिक्षक अपनी नौकरी के लिए खतरा मान रहे हैं।
आगामी आंदोलन की योजना
शिक्षक संगठनों ने 11 अप्रैल को ब्लॉक स्तर पर आंदोलन और ज्ञापन सौंपने की घोषणा की है। वे स्थानीय विधायकों, मंत्रियों और सांसदों को ज्ञापन सौंपेंगे। इसके बाद भी सरकार अनदेखी करती है तो 18 अप्रैल को प्रदेश स्तर पर महाधरना होगा। महाधरने में टीईटी आदेश को निरस्त करने, पुराने शिक्षकों के हितों की रक्षा की प्रमुख मांग उठाई जाएगी।
पुनर्विचार याचिका की तैयारी
टीईटी के खिलाफ शिक्षक संगठनों ने सरकार से सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका पेश करने की मांग की है। संगठनों का कहना है कि आदेश पुराने शिक्षकों के अधिकारों का उल्लंघन करता है। सरकार को इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका के जरिए शिक्षकों का पक्ष रखना चाहिए।
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