ट्रेन में सामान की जिम्मेदारी यात्री की न कि रेलवे की, HC में कर्मचारी की अपील खारिज
ग्वालियर हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। मामला ट्रेन यात्रा के दौरान सरकारी रिकॉर्ड चोरी से जुड़ा था। यह रिकॉर्ड बिजली कंपनी के कर्मचारियों से संबंधित था। चोरी के बाद संबंधित कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई हुई। कर्मचारी ने इस कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
मामला मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी से जुड़ा था। छेदालाल कनौजिया वहां कार्यालय सहायक ग्रेड दो थे। अगस्त 2013 में वे सरकारी काम से जबलपुर जा रहे थे। वे ग्वालियर से श्रीधाम एक्सप्रेस में सवार हुए थे। यात्रा के दौरान उनका सूटकेस चोरी हो गया।
सूटकेस में रखे थे जरूरी सरकारी रिकॉर्ड
सूटकेस में कर्मचारियों की सर्विस बुक रखी थी। इसके साथ गोपनीय चरित्रावली से जुड़ी फाइलें भी थीं। ये रिकॉर्ड कर्मचारी को विभाग की ओर से सौंपे गए थे। सूटकेस चोरी होने के बाद रेलवे पुलिस में रिपोर्ट हुई। इटारसी रेलवे पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। मामले की जांच के बाद विभाग ने कार्रवाई की। विभाग ने कर्मचारी की लापरवाही को जिम्मेदार माना। उसकी एक वेतनवृद्धि रोकने का आदेश दिया गया। इस रोक का असर आगे मिलने वाली बढ़ोतरी पर पड़ा।
कर्मचारी ने रेलवे की जिम्मेदारी का तर्क दिया
कर्मचारी ने कार्रवाई के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। उसकी दलील थी कि चोरी एक अचानक हुई घटना थी। उसने आरक्षित कोच में यात्रा करने की बात भी कही। उसके अनुसार सामान की सुरक्षा रेलवे की जिम्मेदारी थी। उसने कहा कि चोरी को उसकी लापरवाही नहीं माना जा सकता। उसने विभागीय सजा को भी चुनौती दी थी। मामला पहले हाई कोर्ट की एकल पीठ के सामने पहुंचा। एकल पीठ ने 2022 में उसकी याचिका खारिज कर दी थी।
डबल बेंच ने भी कर्मचारी को राहत नहीं दी
इसके बाद कर्मचारी ने रिट अपील दाखिल की। मामले की सुनवाई डबल बेंच ने की। बेंच में न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के शामिल थे। न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव भी इस बेंच में शामिल थे। डबल बेंच ने कर्मचारी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने विभागीय जांच में कोई बड़ी गलती नहीं पाई। कोर्ट ने सजा को भी बहुत ज्यादा नहीं माना। इसलिए पहले दिया गया आदेश बरकरार रहा।
कोर्ट ने सरकारी रिकॉर्ड को लेकर क्या कहा
कोर्ट ने सरकारी रिकॉर्ड की सुरक्षा पर जोर दिया। अदालत ने कहा, रिकॉर्ड कर्मचारी को सौंपे गए थे। इसलिए उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी कर्मचारी की थी। सिर्फ चोरी होने से कर्मचारी की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। अदालत ने रेलवे की जिम्मेदारी को अलग मुद्दा माना। इसका मतलब कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी रेलवे पर नहीं डाल सकता। सरकारी रिकॉर्ड की सुरक्षा उसकी ड्यूटी का हिस्सा थी। इसी आधार पर कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई सही मानी।
क्या ट्रेन में हर चोरी के लिए रेलवे जिम्मेदार है?
यहां इस फैसले का एक जरूरी पहलू समझना होगा। कोर्ट का फैसला हर यात्री की चोरी पर नहीं था। मामला सरकारी रिकॉर्ड संभालने वाले कर्मचारी से जुड़ा था। फिर भी रेलवे के सामान संबंधी नियम महत्वपूर्ण हैं। रेलवे कानून में यात्री के सामान की अलग व्यवस्था है। रेलवे एक्ट की धारा 100 इस जिम्मेदारी को बताती है।
यात्री अपने पास सामान लेकर यात्रा करता है। ऐसे सामान की सुरक्षा की पहली जिम्मेदारी यात्री की होती है। लेकिन इसका मतलब रेलवे कभी जिम्मेदार नहीं होगा। रेलवे की लापरवाही साबित होने पर जिम्मेदारी बन सकती है। कानून में इस स्थिति के लिए साफ व्यवस्था है। यानी हर चोरी का पूरा बोझ रेलवे पर नहीं पड़ता।
यात्री को अपने सामान की सुरक्षा क्यों करनी चाहिए ?
ट्रेन में यात्री अपने निजी सामान का मालिक होता है। सामान उसके पास रहता है और वही उसे संभालता है। इसलिए यात्रा के दौरान सावधानी रखना जरूरी है। सामान छोड़कर जाने पर जोखिम बढ़ सकता है। महंगे सामान को सुरक्षित रखना यात्री के हित में है। जरूरी कागजों को भी सुरक्षित जगह रखना चाहिए। यात्रा के दौरान सामान पर नजर रखना समझदारी है। खासकर रात की यात्रा में ज्यादा सावधानी जरूरी होती है।
रेलवे कब सामान चोरी के लिए जिम्मेदार हो सकता है?
रेलवे एक्ट में इसकी स्थिति अलग तरीके से बताई गई है। यात्री के पास रखे सामान पर नियम लागू होते हैं। रेलवे की लापरवाही साबित होने पर जिम्मेदारी बन सकती है। रेलवे कर्मचारी की गलती भी इस दायरे में आ सकती है। बुक कराए गए सामान के नियम भी अलग हैं। ऐसे सामान के लिए रेलवे की जिम्मेदारी अलग हो सकती है। सामान बुक कराने पर यात्री को रसीद मिलती है।इसलिए सामान बुक कराने वाले यात्रियों को रिकॉर्ड रखना चाहिए।
इस फैसले से यात्रियों को क्या सीख मिलती है?
इस मामले की सबसे बड़ी सीख जिम्मेदारी से जुड़ी है। सामान अपने पास है तो उसकी सुरक्षा जरूरी है। सरकारी रिकॉर्ड है तो जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है। कर्मचारी को सौंपे रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना उसका काम है। दूसरी तरफ रेलवे की जिम्मेदारी भी कानून से तय होती है। रेलवे की गलती साबित होने पर यात्री दावा कर सकता है। लेकिन केवल चोरी होने से रेलवे दोषी नहीं बनता। हर मामले में घटनाओं और लापरवाही की स्थिति देखी जाएगी।
हाई कोर्ट के फैसले का सीधा मतलब क्या है?
सीधा मतलब यह है कि जिम्मेदारी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। सरकारी रिकॉर्ड संभालने वाले कर्मचारी से सावधानी अपेक्षित है। ट्रेन में चोरी को अपने आप हादसा नहीं माना जाएगा। अगर रिकॉर्ड कर्मचारी की निगरानी में था, जवाबदेही बनेगी। यात्री के निजी सामान के लिए नियम अलग हैं। यात्री को अपने सामान की उचित सुरक्षा करनी होगी। रेलवे की लापरवाही हो तो स्थिति बदल सकती है। इसलिए हर चोरी के मामले में तथ्य देखना जरूरी है।
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