कल धूम-धाम से निकलेगी बाबा महाकाल की सवारी, क्या रहेगा रूट, जानें सब कुछ
Ujjain Mahakal Sawari 2026: मध्य प्रदेश की पवित्र नगरी उज्जैन को अवंतिका भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, बाबा महाकाल उज्जैन के राजा माने जाते हैं। यहां सावन और भादौ के महीने में भव्य उत्सव मनाया जाता है।
सावन के हर सोमवार को बाबा महाकाल नगर भ्रमण पर निकलते हैं। राजा महाकाल अपनी राजसी पालकी में बैठकर प्रजा का हाल चाल जानते हैं। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए लाखों श्रद्धालु उज्जैन आते हैं।
पूरा शहर ढोल, नगाड़े और शंख की आवाजों से गूंज उठता है। चारों तरफ जय श्री महाकाल का गगनभेदी उद्घोष सुनाई देता है। यह पवित्र नजारा हर किसी को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर देता है। ऐसे में आइए जानें 2026 में कब निकलेगी श्रावण सवारी।
कब निकलेगी श्रावण सवारी
हिन्दू पंचांग के मुताबिक, इस साल सावन की शुरुआत जुलाई के अंत में होगी। इसके बाद पहला सोमवार अगस्त महीने के शुरुआती हफ्ते में आने वाला है। सोमवार तीन अगस्त को महाकाल की पहली शाही सवारी निकलेगी।
सवारी निकलने का समय हर साल की तरह निश्चित रहेगा। शाम 4:00 बजे श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रांगण से पालकी रवाना होगी। बाबा महाकाल पूरे राजसी ठाठ-बाट के साथ नगर भ्रमण पर निकलेंगे।
पालकी में बाबा सबसे पहले श्री मनमहेश स्वरूप में विराजमान होते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर पुलिस बैंड अपनी मधुर धुन बजाता है। इसके बाद सशस्त्र जवानों द्वारा बाबा को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।
महाकाल की सवारी का इतिहास
सावन और भादौ के प्रत्येक सोमवार को उज्जैन महाकाल सवारी निकलती है। हर सोमवार को बाबा महाकाल एक नए सुंदर स्वरूप में दर्शन देते हैं।
- पहली सवारी में बाबा मनमहेश या चंद्रमौलेश्वर रूप में होते हैं।
- दूसरी सवारी में बाबा के दो स्वरूप एक साथ दिखाई देते हैं।
- तीसरी सवारी के दिन शिव भक्त उनके तांडव स्वरूप के दर्शन करते हैं।
- चौथी सवारी में उमा-महेश का अद्भुत रूप देखने को मिलता है।
- पांचवीं सवारी में होल्कर स्टेट का मुखारविंद पालकी में शामिल होता है।
- भाद्रपद महीने के अंतिम सोमवार को सबसे बड़ी शाही सवारी निकलती है।
- इस आखिरी दिन बाबा के सभी स्वरूप एक साथ रथ पर सवार होते हैं।
इस बार रूट बदलने की क्यों है संभावना
रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल उज्जैन में बाबा महाकाल की सवारी का रूट बदल सकता है। इसके पीछे की मुख्य वजह सड़कों पर चल रहा कंस्ट्रक्शन का काम है। पारंपरिक सवारी मार्ग इन दिनों पूरी तरह से बदहाल स्थिति में है।
सवारी के आधे मार्ग पर सड़क चौड़ीकरण और नाली का काम चल रहा है। बचे हुए हिस्से में सीवरेज प्रोजेक्ट के तहत पाइप लाइन बिछाई जा रही है। इस वजह से जगह-जगह सड़कों पर बड़ी खोदाई की गई है।
मुख्य मार्ग से जुड़ी कई छोटी गलियां भी पूरी तरह उखड़ी हुई हैं। भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस हमेशा इन गलियों का ही इस्तेमाल करती है। सड़कों की हालत को देखते हुए भक्त परिवार ने चिंता जताई है।
क्या होगा सवारी का नया संभावित रूट
सवारी मार्ग की बदहाली को देखते हुए प्रशासन नए विकल्प तलाश रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार नया मार्ग चुना जा सकता है। पालकी बड़े गणेश मंदिर से हरसिद्धि के रास्ते निकल सकती है।
हरसिद्धि मंदिर वाला ये रास्ता पूरी तरह व्यवस्थित और चौड़ा माना जाता है। कोरोना काल के संकट के समय भी इसी मार्ग का उपयोग हुआ था। तब इसी रास्ते से राजसी वैभव के साथ सवारी निकाली गई थी।
अगर पुराने मार्ग की बात करें तो वह बहुत संकरा है। पुराना रूट महाकाल चौराहे से गुदरी बाजार और बक्षी बाजार जाता था। वहां से कहारवाड़ी होते हुए पालकी सीधे पवित्र रामघाट पहुंचती थी।
रामघाट पर महा-अभिषेक की रस्म
पूरी सवारी के दौरान रामघाट सबसे मुख्य और पवित्र पड़ाव होता है। बाबा महाकाल की पालकी मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी के तट पर पहुंचती है। यहां नदी के किनारे विशेष धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है।
घाट पर मौजूद पुजारियों द्वारा क्षिप्रा के जल से महा-अभिषेक होता है। पालकी में विराजित बाबा के मुखारविंद को पवित्र जल से नहलाया जाता है। इस दौरान पूरे घाट पर गूंजते वेद मंत्र मन को शांति देते हैं।
अभिषेक के बाद सवारी वापस शहर के व्यस्त इलाकों की तरफ बढ़ती है। रामानुजकोट, मोढ़ की धर्मशाला और कार्तिक चौक होते हुए पालकी आगे जाती है। छतरी चौक के व्यापारी बाबा का बहुत भव्य स्वागत करते हैं।
हरि-हर मिलन का अलौकिक दृश्य
सवारी का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव प्रसिद्ध गोपाल मंदिर माना जाता है। गोपाल मंदिर पहुंचने पर हरि-हर मिलन की अनूठी रस्म निभाई जाती है। यहां सृष्टि के दो बड़े भगवान एक दूसरे से मिलते हैं।
भगवान शिव यानी हर स्वयं भगवान विष्णु यानी हरि से मिलते हैं। इस खास मौके पर सिंधिया राजघराने के प्रतिनिधि पूजा करते हैं। वे बाबा महाकाल (उज्जैन में हरिहर मिलन) का विधि-विधान से विशेष अर्चन और स्वागत करते हैं।
इस मिलन को देखने के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। गोपाल मंदिर से निकलकर सवारी पटनी बाजार की तरफ आगे बढ़ती है। फिर गुदरी बाजार होते हुए पालकी वापस महाकाल मंदिर लौटती है।
सवारी के पीछे की पौराणिक कथा
महाकाल की इस शाही सवारी के पीछे बहुत गहरा धार्मिक महत्व है। शिव पुराण और स्थानीय लोक कथाओं में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में राजा अपनी प्रजा का दुख जानने बाहर निकलते थे।
चूंकि उज्जैन के असली और एकमात्र राजा स्वयं भगवान महाकालेश्वर हैं। इसलिए वे सावन में हर सोमवार को अपनी प्रजा का हाल देखने आते हैं। वे देखते हैं कि उनकी प्रजा सुखी है या दुखी।
एक अन्य मान्यता के मुताबिक, सावन प्रकृति के पुनर्जन्म का महीना है। तपती गर्मी के बाद बारिश की बूंदें धरती को पूरी तरह तृप्त करती हैं। ऐसे में भगवान शिव का नगर भ्रमण पृथ्वी को शीतलता प्रदान करता है।
श्रद्धालुओं के लिए जरूरी टिप्स
अगर आप सावन 2026 में उज्जैन जाने का प्लान बना रहे हैं। तो आपको कुछ बहुत जरूरी बातें ध्यान में रखनी चाहिए। सावन के सोमवार को उज्जैन में लाखों लोग आते हैं। भारी भीड़ के कारण होटलों की बुकिंग मिलना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए अपनी यात्रा से दो महीने पहले ही होटल जरूर बुक कर लें।
भीड़ से बचने के लिए छतरी चौक या ढाबा रोड का स्थान चुनें। जुलाई और अगस्त के महीनों में मालवा क्षेत्र में तेज बारिश होती है। अपने साथ रेनकोट, छाता और जरूरी दवाइयां रखना बिल्कुल न भूलें। प्रशासन के सुरक्षा नियमों और ट्रैफिक रूट का हमेशा पूरा पालन करें।
FAQ
- वर्ष 2026 में बाबा महाकाल की पहली श्रावण सवारी कब निकलेगी?
वर्ष 2026 के हिन्दू पंचांग के अनुसार, सावन महीने की शुरुआत जुलाई के अंत में हो रही है। इस वजह से अगस्त के पहले सोमवार को शाम ठीक 4:00 बजे बाबा महाकाल की पहली सवारी धूमधाम से निकाली जाएगी। - इस बार महाकाल सवारी का रूट क्यों बदला जा सकता है?
पारंपरिक सवारी मार्ग पर इन दिनों सीवरेज प्रोजेक्ट और सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। जगह-जगह खोदाई और सड़कों की बदहाली के कारण प्रशासन इस बार बड़े गणेश से हरसिद्धि वाला नया रूट चुन सकता है। - महाकाल सवारी के दौरान 'हरि-हर मिलन' की रस्म कहाँ और क्या होती है?
यह रस्म उज्जैन के प्रसिद्ध गोपाल मंदिर में होती है। जब बाबा महाकाल (हर) की पालकी यहाँ पहुँचती है, तो उनका भगवान विष्णु (हरि) से प्रतीकात्मक मिलन कराया जाता है, जहाँ सिंधिया स्टेट द्वारा विशेष पूजा की जाती है।
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