निर्मला सप्रे दलबदल केस में उमंग सिंघार को झटका, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
समझें क्या है पूरा मामला
- हाईकोर्ट ने निर्मला सप्रे के खिलाफ दायर दोनों याचिकाएं खारिज कीं।
- कोर्ट ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष कार्यवाही जारी है।
- न्यायालय को मामले में कोई विशेष तात्कालिकता नहीं दिखी।
- सप्रे पक्ष ने फिर कहा कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली है।
- स्पीकर को समयसीमा तय कर निर्णय देने का कोई निर्देश नहीं दिया गया।
निर्मला सप्रे मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे के कथित दलबदल मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और प्रदीप राय द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है। दरअसल बिजली सुनवाई के बाद यह फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। जिसे आज 25 जून को जारी किया गया है।
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता याचिका पर प्रक्रिया जारी है। कोर्ट को तत्काल निर्णय का कोई आधार नहीं मिला। अध्यक्ष को समयबद्ध निर्णय का निर्देश नहीं दिया गया। इस आदेश से निर्मला सप्रे को फिलहाल कानूनी राहत मिली।
क्या थी याचिकाकर्ताओं की मांग?
सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दायर अपनी अयोग्यता याचिका का शीघ्र निपटारा कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका दावा था कि मई 2024 में निर्मला सप्रे ने सार्वजनिक रूप से सीएम मोहन यादव की मौजूदगी में भाजपा में शामिल होने की घोषणा की थी।
इसके बाद संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल मामलों के निपटारे के लिए उचित समयसीमा तय करने की आवश्यकता बताई है। लेकिन लगभग दो वर्ष बीत जाने के बाद भी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।
सरकार ने बताया था राजनीतिक विवाद
सुनवाई में सरकार और विधानसभा अध्यक्ष ने पक्ष रखा और महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने बताया कि मामला अध्यक्ष के समक्ष विचाराधीन है तथा प्रक्रिया जारी है। शिकायत पर निर्मला सप्रे से जवाब लिया गया और भाजपा कांग्रेस दोनों पक्षों से टिप्पणियां ली गईं। उमंग सिंघार का बयान भी दर्ज हुआ। सरकार ने कहा कि कार्यकाल दो वर्ष से अधिक शेष है इसलिए न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
सप्रे का वही दावा : मैं कांग्रेस में हूं
निर्मला सप्रे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अग्रवाल ने कहा कि सप्रे ने न कांग्रेस छोड़ी है और न भाजपा की सदस्यता ली है। याचिका में लगाए गए आरोप निराधार बताए गए और कहा गया कि उन्हें राजनीतिक विवाद में घसीटा जा रहा है। सुनवाई में पक्ष ने दोहराया कि दलबदल के आरोप तथ्यहीन हैं और सप्रे अभी भी कांग्रेस की सदस्य हैं।
हाईकोर्ट ने नहीं दिए स्पीकर को कोई भी निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में कांग्रेस से निष्कासन या भाजपा सदस्यता का कोई दस्तावेज नहीं है। अदालत ने प्रतिवादी के लगातार खंडन को नोट किया। विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष कार्यवाही जारी और प्रगति पर है। ऐसे में कोई तात्कालिक परिस्थिति नहीं दिखी और स्पीकर को समयबद्ध निर्णय का निर्देश नहीं दिया गया।
फैसला सुरक्षित रखने के बाद आया अंतिम आदेश
गौरतलब है कि 18 जून को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।
उस समय मुख्य बहस इस प्रश्न पर केंद्रित रही कि क्या हाईकोर्ट विधानसभा अध्यक्ष को दलबदल याचिका के निपटारे के लिए निश्चित समयसीमा तय करने का निर्देश दे सकता है।
लगभग एक सप्ताह बाद आए अंतिम आदेश में खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया कि वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा कोई निर्देश देने की आवश्यकता नहीं है और दोनों याचिकाओं को खारिज किया जाता है।
हाईकोर्ट के इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि निर्मला सप्रे के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिका समाप्त हो गई है। अदालत ने केवल स्पीकर को निर्देश देने से इनकार किया है और याचिकाओं को खारिज किया है।
अब पूरा मामला फिर से विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष ही आगे बढ़ेगा, जहां दलबदल कानून के तहत अंतिम निर्णय लिया जाएगा। राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से यह मामला अभी भी महत्वपूर्ण बना हुआ है क्योंकि अंतिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष को ही करना है कि निर्मला सप्रे पर दलबदल कानून लागू होता है या नहीं।
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