नीट री-एग्जाम: 2 मिनट की देरी से नहीं मिली एंट्री, बेटी रोई-पिता गिड़गिड़ाया पर बेअसर

Jitendra Shrivastava | Jun 22, 2026, 16:20 IST
Photograph: (thesootr)
विदिशा में एक छात्रा महज 2 मिनट की देरी से नीट री-एग्जाम नहीं दे पाई। पिता गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन सिस्टम नहीं पिघला। गलती व्यवस्था की थी, सजा बेटी को मिली।

ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...

  • 2 मिनट की देरी ने छीन लिया पूरा साल।
  • बेटी रोती रही, व्यवस्था निर्लज्ज खड़ी रही।
  • पेपर लीक माफ, 2 मिनट की देरी नहीं।
  • विदिशा: पिता गिड़गिड़ाया, सिस्टम टस से मस नहीं हुआ।
  • नीट री-एग्जाम में देर माफ नहीं, गलती किसकी थी?

मध्यप्रदेश के विदिशा में एक छात्रा महज 2 मिनट की देरी से नीट री-एग्जाम नहीं दे पाई। पिता ने गुहार लगाई, लेकिन सिस्टम नहीं पसीजा। छात्रा इस परीक्षा में इसलिए बैठ रही थी क्योंकि पहली नीट परीक्षा में गड़बड़ी हुई थी।



गलती व्यवस्था की थी, लेकिन सजा छात्रा को मिली। यह घटना उस संवेदनहीनता की मिसाल है जहाँ नियम बचाए जाते हैं और न्याय खो दिया जाता है।



2 मिनट और टूट गया सपना

विदिशा में एक पिता और उसकी बेटी परीक्षा केंद्र के बाहर खड़े थे। बेटी की आँखों में आँसू थे। पिता बार-बार गुहार लगा रहा था, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। बस 2 मिनट की देरी थी। और इन्हीं 2 मिनटों ने एक छात्रा का पूरा साल बर्बाद कर दिया।



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व्यवस्था की गलती, सजा छात्रा को

सबसे बड़ा सवाल...

यह है कि यह बच्ची दोबारा परीक्षा देने आई ही क्यों थी।



जवाब सीधा है...

पहली नीट (NEET – National Eligibility cum Entrance Test) परीक्षा में इतनी गड़बड़ियां हुई थीं कि लाखों छात्रों को दोबारा परीक्षा की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।



गलती किसकी थी?...

छात्रा की नहीं। फिर सजा उसे क्यों मिली? जब राज्य या व्यवस्था की वजह से किसी छात्र को दोबारा परीक्षा देनी पड़ रही हो, तो उस व्यवस्था की कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं बनती क्या?



नियम बचा, न्याय गया

इसी देश में मंत्रियों और वीआईपी (VIP – Very Important Person) काफिलों के लिए हजारों लोग घंटों इंतजार करते हैं। सड़कें रोकी जाती हैं। ट्रेनें रोकी जाती हैं। आम नागरिक खड़े रहते हैं, लेकिन एक छात्रा, जो अपने भविष्य के लिए दौड़ रही थी, उसे 2 मिनट की देरी पर परीक्षा से बाहर कर दिया गया।



कानून का मकसद न्याय होना चाहिए, केवल प्रक्रिया नहीं...

...पेपर लीक माफ, 2 मिनट नहीं।



...पेपर लीक होने से कोई फर्क नहीं पड़ा। परीक्षा से कुछ देर पहले परीक्षा केंद्र बदल देने से कोई फर्क नहीं पड़ा।



...लेकिन 2 मिनट की देरी से फर्क पड़ा।



...जिस व्यवस्था ने खुद गलती की, उसने खुद को माफ कर लिया। और जिस छात्रा ने कोई गलती नहीं की, उसे सजा मिली।



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मानवीय प्रावधान की जरूरत...

जरूरी सवाल यह भी उठते हैं-

  • क्या ऐसे मामलों में आपदा, बारिश, ट्रैफिक जाम या तकनीकी देरी जैसी परिस्थितियों के लिए कोई मानवीय प्रावधान नहीं होना चाहिए?
  • खासकर तब, जब परीक्षा खुद व्यवस्था की गलती की वजह से दोबारा हो रही हो।
  • शिक्षा व्यवस्था का मकसद बच्चों को अवसर देना है, अवसर छीनना नहीं।

पिता-बेटी को फर्क पड़ता है...

  • पिता असहाय खड़ा था। जानता था कि बेटी का परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा।
  • बेटी को समझ नहीं आ रहा था कि पिता को संभाले या अपने दर्द पर रोए।
  • सिस्टम को फर्क नहीं पड़ा। लेकिन इस पिता-बेटी को फर्क पड़ता है। और हमें भी फर्क पड़ना चाहिए।

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