मनी लॉन्ड्रिंग का डर दिखाकर एमपी के रिटायर्ड अफसर से 69 लाख की ठगी, 23 दिन तक रखा डिजिटल अरेस्ट, ऐसे खुला मामला
पुलिस अफसर बताकर की गई ठगी
मामला विदिशा के पार्वतीपुरम थाना क्षेत्र का है। यहां एमपी इलेक्ट्रिक बोर्ड (एमपीईबी) के एक रिटायर्ड अफसर को 5 अक्टूबर को फोन आया। खबरों के मुताबिक, पीड़ित की उम्र करीब 70 साल बताई गई है। उन्हें ठगों ने कॉल करके खुद को पुलिस अफसर होने का दावा किया था। इसके बाद उसने पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसने की बात कही थी।
इसके बाद आरोपी ने पीड़ित को गिरफ्तारी का डर दिखाया। उसने कहा कि जांच पूरी होने तक पीड़ित को निगरानी में रहना होगा। इसके बाद ठगों ने उन्हें वीडियो कॉल पर रखा। ठगों ने लगातार उनसे संपर्क में रहता था।
23 दिन तक हाउस अरेस्ट रखा गया
खबरों के मुताबिक, यह सिलसिला 23 दिन चला। ठगों ने पीड़ित को सुबह से शाम तक फोन पर बने रहने को कहता था। ठगों ने गिरफ्तार न करने के बदले पैसे की मांग की थी। कुल आठ ट्रांजेक्शन में 69 लाख रुपए भेजे गए।
अकाउंट होल्ड, 23 लाख रुपए बचे
खबरों के मुताबिक, ठगी के दौरान पीड़ित के खाते से लगातार पैसे भेजे जा रहे थे। उनके खाते में पेंशन और LIC से मिली रकम भी थी। आरोपियों ने इस रकम को भी ठगी का निशाना बनाया। हालांकि, बैंक को लेनदेन पर शक हुआ। इसके बाद बैंक ने खाते को होल्ड कर दिया। इस कार्रवाई से करीब 23 लाख रुपए बच गए। अगर बैंक समय रहते खाता होल्ड नहीं करता, तो नुकसान और बढ़ सकता था।
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के मामलों पर चिंता जताई है। एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 29 अक्टूबर को पूछा कि लोग ऐसी ठगी में कैसे फंस जाते हैं। मोबाइल फोन पर कोई किसी को गिरफ्तार कैसे कर सकता है?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच बैठी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जागरूकता अभियानों का भी जिक्र किया। कोर्ट ने पूछा कि जागरूकता के बाद भी लोग क्यों फंस रहे हैं। CJI सूर्यकांत ने पीड़ितों को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि लोग ऐसे जाल में कैसे फंस जाते हैं। क्या उन्हें जनरल बातें भी समझ नहीं आती? मोबाइल पर गिरफ्तारी का डर दिखाना कैसे संभव है?
कोर्ट ने बैंकों के कामकाज पर भी सवाल उठाए हैं। उसने पूछा कि बैंक अचानक बड़े लेनदेन की अनुमति कैसे देते हैं। क्या बैंक बिना जरूरी जांच के पैसे ट्रांसफर होने देते हैं? कोर्ट ने बुजुर्गों के खातों पर खास चिंता जताई। ऐसे खातों से बड़ी रकम निकलने पर भी सवाल उठाए हैं।
डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक तरीका है। इसमें ठग खुद को सरकारी अधिकारी बताते हैं। वे पुलिस, CBI या ED का अफसर बनकर फोन करते हैं। कई बार वे खुद को जज भी बताते हैं। फिर पीड़ित को किसी गंभीर मामले में फंसाने की धमकी देते हैं।
ठग कहते हैं कि पीड़ित का नाम किसी अपराध में आया है। वे आधार कार्ड या बैंक खाते के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाते हैं। कई बार मनी लॉन्ड्रिंग और ड्रग्स तस्करी की बात करते हैं। इन आरोपों से पीड़ित को डराने की कोशिश होती है।
इसके बाद ठग वीडियो कॉल शुरू कर देते हैं। वे पीड़ित को लगातार कॉल पर बने रहने को कहते हैं। कई बार घंटों तक उन्हें कॉल पर रखा जाता है। कुछ मामलों में यह सिलसिला कई दिनों तक चलता है। इस दौरान पीड़ित को किसी से बात नहीं करने देते। उन्हें बताया जाता है कि उनके खिलाफ जांच चल रही है।
साइबर ठगी से ऐसे बचें
सीबीआई, ईडी या पुलिस अफसर डिजिटल अरेस्ट नहीं करती है। ये एजेंसियां फोन पर रुपए भी नहीं मांगते हैं। किसी अनजान कॉल आए, तो घबराना नहीं चाहिए। शक होने पर सीधे नजदीकी पुलिस थाने से संपर्क करना चाहिए। इसके अलावा ठगी होने पर भारत सरकार का राष्ट्रीय साइबर वित्तीय धोखाधड़ी हेल्पलाइन नंबर (National Cyber Financial Fraud Helpline) 1930 पर शिकायत कर सकते हैं।
FAQs
- विदिशा में रिटायर्ड अधिकारी के साथ कितने रुपए की ठगी हुई?
पीड़ित के साथ कुल 69 लाख रुपए की ठगी हुई है। - ठगों ने पीड़ित को कितने दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखा?
ठगों ने पीड़ित को 23 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर रखा। - डिजिटल अरेस्ट की शिकायत कहां कर सकते हैं?
डिजिटल अरेस्ट की शिकायत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर की जा सकती है।