चहेती फर्मों को थमाई ठेके की चाबी, CVC पहुंची शिकायत-ये क्लर्क की गलती नहीं, सुनियोजित साजिश

Sanjay Sharma | May 27, 2026, 22:34 IST
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पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में किराए पर वाहन लेने के टेंडर्स में गड़बड़ी सामने आई है। वाहन उपलब्ध कराने वाली दो फर्मों को फायदा पहुंचाने के लिए अफसरों की भूमिका संदेह के दायरे में हैं। टेंडर की शर्तों और नियमों की भी अनदेखी की गई है।

पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में 7 करोड़ के वाहन टेंडर में गड़बड़ी सामने आई। आरोप है कि इंजीनियरिंग विभाग के अफसरों ने कागजों की हेराफेरी कर दो पसंदीदा ट्रैवल्स कंपनियों को ठेका दिया। बाकी कंपनियों को तकनीकी खामी दिखाकर बाहर कर दिया गया। मामला इतना गंभीर है कि फाइल सेंट्रल विजिलेंस कमीशन और पीएमओ पोर्टल तक पहुंच गई। रेलवे के सीनियर डीईएन (कोऑर्डीनेशन) रामेन्द्र पांडेय से इस मामले पर पूछताछ की गई, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।



कैसे चला ठेके का पहिया ?

रेलवे में बड़े अफसरों के दौरे, निरीक्षण और साइट विजिट के लिए टैक्सी, मिनी लोडिंग और ट्रक किराए पर लिए जाते हैं। इसके लिए GeM पोर्टल पर टेंडर निकाले जाते हैं। भोपाल मंडल ने भी 7 टेंडर निकाले। कुल रकम करीब 7 करोड़। कई ट्रैवल्स कंपनियां मैदान में उतरीं। पर यहां से शुरू हुआ असली खेल।



शिकायतकर्ता विकास शर्मा ने CVC को सौंपे दस्तावेजों में दावा किया कि जिन दो फर्मों को काम मिला, उनके टेंडर फॉर्म अधूरे थे। जरूरी दस्तावेज नदारद थे। फिर भी अफसरों के ‘इशारे’ पर ठेका दे दिया गया। दूसरी तरफ, पूरी तैयारी के साथ आई कंपनियों को छोटी-छोटी कमी निकालकर रेस से बाहर कर दिया। नतीजा- प्रतिस्पर्धा खत्म। रेट मनमाने। रेलवे को हर महीने लाखों की चपत।



एक- सा पैटर्न, 7 बार वही कहानी

शिकायत में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह गड़बड़ी एक-दो टेंडर में नहीं हुई। सातों टेंडर में एक जैसा पैटर्न है। हर बार ज्यादातर बोलीदाताओं को बाहर का रास्ता दिखाया गया और एक-दो खास फर्मों को फायदा पहुंचाया गया। विकास शर्मा का सीधा आरोप है, “यह किसी क्लर्क की गलती नहीं है। यह सुनियोजित साजिश है। 7 अलग-अलग निविदाओं में एक जैसा खेल कैसे हो सकता है? इससे साफ है कि ऊपर से नीचे तक सिस्टम मिला हुआ है।



अफसरों की भूमिका पर उठे सवाल

शिकायत में सीनियर डीईएन केके निगम की भूमिका भी कटघरे में है। दस्तावेजों के मुताबिक सभी निविदाओं की स्क्रूटनी और फर्म के चयन की प्रक्रिया उन्हीं के मार्गदर्शन में पूरी हुई। इसलिए शिकायतकर्ता ने CVC से खासतौर पर उनकी भूमिका की जांच की मांग की है। सवाल यह है कि जब सीनियर अफसर की निगरानी में टेंडर हो रहे थे तो इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? क्या आंख बंद कर साइन हो गए या फिर आंख खोलकर खेल किया गया?



PMO तक पहुंचा कच्चा-चिट्ठा

विकास शर्मा यहीं नहीं रुके। उन्होंने हर टेंडर की फाइल खंगाली। कहां, कैसे, किस नियम को तोड़ा गया- इसका पूरा ब्यौरा तैयार किया। 7 टेंडर, उनमें हिस्सा लेने वाली कंपनियों के दस्तावेज, किसे क्यों बाहर किया गया और किसे क्यों अंदर लिया गया- सब कुछ एक फोल्डर में भरकर cvc group के साथ-साथ पीएमओ पोर्टल पर भी अपलोड कर दिया है।



रेलवे का किराया और जनता का भाड़ा

रेलवे में एक अफसर की किराए की गाड़ी पर रोज 3 से 5 हजार तक खर्च होता है। महीने का हिसाब लगाएं तो एक गाड़ी का बिल लाख पार कर जाता है। भोपाल मंडल में दर्जनों अफसरों के लिए गाड़ियां लगती हैं। अब जब 7 करोड़ के टेंडर में ही इतना बड़ा झोल है तो सोचिए पूरे जोन में हर साल कितने करोड़ का ‘किराया’ बेवजह बह रहा होगा। फिलहाल गेंद CVC के पाले में है। देखना है कि विजिलेंस की जांच इस घोटाले की गाड़ी को कब और कहां तक रोक पाती है।



हेराफेरी की कहानी को विस्तार से समझना जरूरी है

1. पहला टेंडर GEM/2025/B/6569545 का मूल्य 32,39,928 रुपए था। टैक्सी वाहन उपलब्ध कराने का यह टेंडर पांडेय इंटरप्राइजेज को दिया गया। जबकि फर्म द्वारा जमा कि गए दस्तावेज अपूर्ण थे। इस पर टेंडर नंबर भी दर्ज नहीं था और न ही संबंधित विभाग का नाम लिखा था। टेंडर की 8 नंबर की शर्त में टेंडर के ब्यौरे का भी उल्लेख नहीं किया गया था। जरूरी घोषणा भी अधूरी थी। इसके बावजूद टेंडर को तकनीकी बिड के लिए स्वीकार कर लिया गया।



2. दूसरा टेंडर GEM/2025/B/6637694 की वैल्यू 88,89,480 रुपए, तीसरे टेंडर GEM/2025/B/6637910 की कीमत 72,41,184 रुपए, चौथे टेंडर GEM/2025/B/6677423 की कीमत 75,29,184 रुपए और टेंडर नंबर GEM/2025/B/6690831 का मूल्य 78,17,184 रुपए था। दूसरे टेंडर में 8 फर्म, तीसरे टेंडर में 7, चौथे टेंडर में 9 और पांचवे टेंडर के लिए 5 फर्मों में प्रतिस्पर्धा थी।



इसके बावजूद चारों टेंडर में एक ही पैटर्न के आधार पर प्रतिस्पर्धी फर्मों को बाहर कर दिया गया और सभी काम ताज ट्रांसपोर्ट कंपनी को दे दिए गए। ये चारों टेंडर मिनी लोडिंग वाहनों से संबंधित थे। जिस फर्म को तकनीक बिड के आधार पर टेंडर दिए गए उसके दस्तावेजों में भी खासी कमियां हैं। ताज ट्रांसपोर्ट कंपनी के दस्तावेज टेंडर के लिए जरूरी पूर्तियों के अनुरूप नहीं थीं। तकनीकी बिड में बिड रिक्वायरमेंट और फर्म द्वारा दिए गए ऑफर में भिन्नता थी। इसके अलावा फर्म द्वारा बैंकिंग दस्तावेजों के साथ सीए सर्टिफिकेट नहीं दिया गया और बिड के दस्तावेज में दूसरी कमियां भी रखी गईं।



3. जेम पोर्टल पर पमरे के छठवे टेंडरGEM/2026/B/7389969 का मूल्य 1,70,17,776 रुपए था। जबकि सातवां टेंडर GEM/2025/B/7375785 की वैल्यू 1,91,77,776 रुपए थी। ये दोनों टेंडर ट्रक जैसे भारी वाहनों के लिए थे। इन दोनों टेंडर में 15 फर्मों ने सहभागिता की लेकिन 14 फर्मों को तकनीकी बिड में अपात्र घोषित कर ताज ट्रांसपोर्ट कंपनी को काम दे दिया गया। इन फर्मों को दस्तावेजों की जिन कमियों के आधार पर बाहर किया गया वहीं कमी सफल बताई गई फर्म के दस्तावेजों में भी थी। रेलवे के अधिकारियों के पक्षपात से विभाग को भी लाखों रुपए का नुकसान इन दोनों टेंडरों में हुआ है। छठवें टेंडर के लिए 16 प्रतिशत और सातवे टेंडर के लिए 30 प्रतिशत ज्यादा रेट स्वीकार किए गए।



कैसे हुआ टेंडर का खेल

1. पारदर्शिता भूल गए : ज्यादातर ठेकेदारों को तकनीकी चरण में ही बाहर कर दिया गया। सिर्फ एक या दो फर्म को ही क्वालिफाई किया गया।


2. अधूरे कागज मंजूर : सफल बोलीदाता के दस्तावेज अधूरे थे। टेंडर नंबर, विभाग का नाम, फर्म का नाम तक नहीं भरा था। ATC की शर्तों की अनदेखी कर ठेका दिया गया।


3. दोहरा मापदंड : बैंक गारंटी, लिक्विडिटी, ऑडिटेड बैलेंस शीट जैसी शर्तें सब पर एक जैसी लागू नहीं की गईं। जिस फर्म को फायदा देना था, उसके लिए शर्तें नरम कर दी गईं।


4. एक फर्म को लाभ : सात टेंडर में टैक्सी का ठेका एक कंपनी को दिया गया जबकि मिनी लोड़िंग और ट्रक ट्रांसपोर्ट के सभी 6 ठेके एक अन्य कंपनी को दिए गए।



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टेंडर चयन में पक्षपात

शिकायत में कहा गया है कि यह किसी एक क्लर्क की गलती नहीं है। 7 अलग-अलग निविदाओं में एक जैसा पैटर्न दिखता है। हर बार ज्यादातर बोलीदाताओं को बाहर कर एक खास फर्म को फायदा पहुंचाया गया। इससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई। सार्वजनिक खरीद के पारदर्शिता और समान अवसर के नियम टूटे। निविदाओं की स्क्रूटनी और फर्म के चयन की प्रक्रिया सीनियर डीईएन केके निगम के मार्गदर्शन में पूरी हुई है। इस वजह से उनकी निगरानी पर भी सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ता ने सीवीसी को तथ्य सौंपकर सीनियर सीईएन की भूमिका की जांच की भी मांग की है।



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