नारी शक्ति पर क्रेडिट वॉर: सदन में महिला आरक्षण बना राजनीतिक हथियार, हकीकत फिर गायब

Ramanand Tiwari | Apr 27, 2026, 19:59 IST
women reservation
BHOPAL: मध्य प्रदेश विधानसभा में महिला आरक्षण पर बहस सियासी आरोप-प्रत्यारोप में उलझकर रह गई। जबकि असली मुद्दा महिला आरक्षण का जल्द और सही तरीके से लागू होना है।

मध्यप्रदेश विधानसभा में महिला आरक्षण पर बहस कम और सियासी टकराव ज्यादा दिखा। सरकार ने 33% आरक्षण का संकल्प पेश किया, लेकिन चर्चा महिलाओं के अधिकार से ज्यादा भाजपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई में बदल गई। सवाल यही है क्या महिलाओं को हक मिलेगा या यह मुद्दा राजनीति में उलझा रहेगा?



क्या हुआ सदन में?

सदन में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रस्ताव आया। लेकिन बहस के दौरान फोकस समाधान से हटकर आरोप-प्रत्यारोप पर चला गया। सरकार ने कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया, जबकि विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठे।



मंत्री कृष्णा गौर का कांग्रेस पर आरोप

राज्यमंत्री कृष्णा गौर ने साफ कहा कि बिल को लेकर जो उम्मीद थी, वह टूट गई और इसके लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। उन्होंने दावा किया कि महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देने की दिशा में केंद्र सरकार काम कर रही है, लेकिन विपक्ष इसमें रोड़ा बन रहा है। कृष्णा गौर ने यह भी कहा कि कांग्रेस की सोच कभी महिलाओं के पक्ष में नहीं रही और उसने हमेशा ऐसे प्रयासों को कमजोर किया है।



बड़े दावे, लेकिन जमीन पर सवाल

सरकार की तरफ से महिला सशक्तिकरण, समाज सुधार और योजनाओं की लंबी सूची गिनाई गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिलाओं को आगे बढ़ाने की बात भी कही गई। लेकिन इन दावों के बीच सबसे अहम सवाल फिर अनुत्तरित रहा आरक्षण लागू कब और कैसे होगा?



OBC और महिला मुद्दे का जिक्र

मंत्री कृष्णा गौर ने खुद को OBC महिला बताते हुए कहा कि कांग्रेस ने इस वर्ग का कभी समर्थन नहीं किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि महिलाओं के अधिकार देने की कोशिश को विपक्ष ने रोका। हालांकि, OBC महिलाओं को आरक्षण में वास्तविक हिस्सा कैसे मिलेगा, इस पर कोई ठोस रोडमैप सामने नहीं आया।



आधी आबादी को पूरा हक

हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि महिला आरक्षण सिर्फ एक मुद्दा नहीं, बल्कि देश की दिशा तय करने वाला फैसला है। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरण देकर महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की बात कही। लेकिन यहां भी फोकस विजन पर ज्यादा और क्रियान्वयन पर कम नजर आया।



आंकड़ों की बात, लेकिन समाधान फिर गायब

संसद में सीटों और जनसंख्या का अंतर बताते हुए तर्क दिया गया कि सीटें बढ़नी चाहिए। यह भी कहा गया कि इससे महिलाओं को अवसर मिलेंगे और दबाव कम होगा। लेकिन असली मुद्दा आरक्षण की टाइमलाइन फिर चर्चा से बाहर ही रहा।



धार्मिक संदर्भ भी जुड़े, लेकिन मुद्दा भटका

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मोहिनी एकादशी का जिक्र करते हुए इसे प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा। इससे बहस का माहौल तो बना, लेकिन महिलाओं के अधिकार का मूल मुद्दा कहीं पीछे छूटता नजर आया।



सदन की प्रक्रिया: समय तय, समाधान नहीं

विधानसभा अध्यक्ष ने चार घंटे की चर्चा तय की, जिसमें सत्ता पक्ष को ज्यादा समय मिला। लेकिन तय समय के बावजूद चर्चा का ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आ सका।



सबसे बड़ा सवाल

महिला आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे पर अगर बहस "किसने क्या किया" तक सीमित रह जाए, तो असली फायदा किसे मिलेगा? भाजपा कांग्रेस पर हमला कर रही है, जबकि कांग्रेस की चुप्पी भी सवाल खड़े कर रही है। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान उस "आधी आबादी" का हो रहा है, जो अब भी इंतजार में है। सदन में 'नारी शक्ति' की बात जोर-शोर से हुई, लेकिन ठोस फैसले की जगह राजनीति हावी रही। अगर यही स्थिति रही, तो महिला आरक्षण कानून भी सिर्फ भाषणों और आरोपों तक सीमित रह जाएगा, और असली बदलाव फिर टल जाएगा।



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