योग का प्रचार खूब पर नौकरियों में पड़ा अकाल! विश्वविद्यालयों में 50% सीटें खाली
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश की चार बड़ी यूनिवर्सिटी में योग के कोर्स चलते हैं।
- इन कोर्सेस में कुल 330 सीटें हैं।
- सत्र 2025-26 में सिर्फ 175 सीटों पर ही एडमिशन हुआ।
- इसका मतलब कि लगभग आधी सीटें खाली रह गईं।
- सरकारी नौकरियों की कमी और रोजगार के सीमित मौके इसकी वजह है।
योग का बाजार लगातार बढ़ रहा है। आधुनिक जीवनशैली में इसे करियर का अच्छा विकल्प भी बताया जाता है। इसी वजह से कई यूनिवर्सिटी में यूजी, पीजी और डिप्लोमा स्तर के योग कोर्स चलाए जा रहे हैं। वहीं एडमिशन के आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं।
योग कोर्सेस में सीटें ज्यादा, एडमिशन कम
बीयू, एमसीयू, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय और सांची बौद्ध विश्वविद्यालय में योग के सभी कोर्स मिलाकर 330 सीटें हैं। सत्र 2025-26 में सिर्फ 175 सीटों पर ही एडमिशन हुआ। यानी लगभग आधी सीटें खाली रह गईं।
इसकी वजह साफ है। योग का प्रचार तो बहुत हुआ, लेकिन सरकारी क्षेत्र में रोजगार के मौके नहीं बढ़े। ऐसे में ज्यादातर छात्रों के सामने सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं। या तो वे निजी संस्थान में प्रशिक्षक बनें या खुद का योग केंद्र खोलें।
बीयू में एडमिशन का हाल
बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में योग से जुड़े चार कोर्स चलते हैं। एमए इन योगिक साइंस में 30 सीटें हैं। 2023-24 में 29, 2024-25 में 34 और 2025-26 में 27 एडमिशन हुए। 2024-25 में सीटें बढ़ाई गई थीं। इसलिए उस साल ज्यादा एडमिशन हुए थे।
बता दें कि पीजी डिप्लोमा इन योगिक साइंस में 60 सीटें हैं। तीन सालों में क्रमशः 47, 42 और 49 एडमिशन हुए। यह कोर्स बाकी कोर्सेस से थोड़ा बेहतर स्थिति में है।
एम.एससी इन योगिक साइंस में 30 सीटों के मुकाबले 2023-24 में 27 एडमिशन हुए। वहीं 2024-25 में 18 और 2025-26 में सिर्फ 16 एडमिशन हुए। सर्टिफिकेट इन योगिक साइंस योग थैरेपी कोर्स में 30 सीटें हैं। यहां दाखिले की संख्या लगातार बढ़ी है, 2023-24 में 15 से 2025-26 में 21 तक।
एमसीयू और सांची विवि का हाल
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा कोर्स में 30 सीटें हैं। यहां हर साल सिर्फ 15 से 20 छात्र ही एडमिशन लेते हैं।
सांची विश्वविद्यालय में योगिक साइंस के एमए और एम.एससी कोर्स मिलाकर 20 सीटें हैं। दोनों ही सत्रों में सिर्फ 13-13 एडमिशन हुए। यानी यहां भी सीटें आधी से ज्यादा खाली रहीं।
हिंदी विवि में हालत सबसे खराब
अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टिट्यूट में योग कोर्सेस की स्थिति सबसे चिंताजनक है। यहां कोर्सेस की कुल 100 सीटें हैं। लेकिन सत्र 2025-26 में सिर्फ 23 छात्रों ने ही एडमिशन लिया। यानी सिर्फ 23% सीटें ही भर पाईं।
सरकारी नौकरी न होना सबसे बड़ी वजह
एडमिशन में कमी की सबसे बड़ी वजह सरकारी क्षेत्र में अवसरों की कमी है। स्कूलों और कॉलेजों में योग शिक्षक के नियमित पद बहुत कम हैं। केंद्रीय विद्यालयों में योग शिक्षक रखे तो जाते हैं, लेकिन संविदा आधार पर। इससे छात्रों में स्थायी करियर को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है।
जो छात्र पीएचडी कर भी लेते हैं, उन्हें भी नियमित नौकरी के लिए जूझना पड़ता है। यही वजह है कि कई छात्र योग कोर्स करने से कतराते हैं। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
सरकार को ठोस कदम उठाना जरूरी
इस मुद्दे पर शिक्षा जगत से जुड़े एक्सपर्ट का मानना है कि सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। स्कूल और कॉलेज स्तर पर नियमित पद बनाने से ही इस समस्या का हल निकल सकता है। साथ ही सरकारी अस्पतालों में भी योग थैरेपिस्ट के पद बनाए जाने की जरूरत बताई गई है।
हालांकि जो छात्र खुद का योग केंद्र खोलते हैं, उनकी कमाई भी अच्छी हो सकती है। कई छात्र महीने में 50 हजार रुपए तक भी कमा लेते हैं। लेकिन यह विकल्प सरकारी नौकरी जैसी स्थिरता नहीं देता।
आने वाले समय में अगर सरकार योग शिक्षकों और थैरेपिस्ट के लिए नियमित पद नहीं बनाती, तो इन कोर्सेस में दाखिले की संख्या और गिर सकती है। इससे योग शिक्षा से जुड़े संस्थानों के सामने भी चुनौती बढ़ेगी।
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