Rajasthan Panchayat Election: कभी पाकिस्तान ने रखा था 2 लाख का इनाम, अब भारत में बना सरपंच
1971 के युद्ध में भारतीय सेना की मदद करने के लिए पदमसिंह और उनके भाई लक्ष्मणसिंह पर जासूसी के आरोप लगाए थे। पाकिस्तान की सरकार ने दोनों भाईयों पर 2-2 लाख रुपए का इनाम घोषित की था। खास बात यह है कि जिस छाछरो गांव के नाम से उनकी पहचान जुड़ी थी, वह कभी पाकिस्तान में था। अब भारत में उसी नाम से बने गांव की जिम्मेदारी उन्हें मिली है।
पाकिस्तान में छूटी हवेली
पदमसिंह की कहानी सिर्फ एक चुनावी जीत की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भी है। करीब 55 साल पहले उन्हें पाकिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा था। युद्ध के दौरान भारतीय सेना की मदद करने के कारण पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन पर और उनके भाई लक्ष्मणसिंह सोढ़ा पर जासूसी के आरोप लगाए थे। दोनों भाइयों पर 2-2 लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था।
पाकिस्तान में अपनी हवेली पर फहराया था तिरंगा
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पदमसिंह ने पाकिस्तान के छाछरो स्थित अपनी पुश्तैनी हवेली पर भारतीय तिरंगा फहराया था। युद्ध के माहौल में यह कदम बेहद जोखिम भरा था। इसके बाद उन्होंने अपनी हवेली और खानदानी जमीन छोड़ कर परिवार के साथ भारत आ गए थे।
पदमसिंह का परिवार छाछरो क्षेत्र के पुराने राजपूत शासक परिवारों में शामिल रहा है। उनके बड़े भाई लक्ष्मणसिंह सोढ़ा का भी सार्वजनिक जीवन में अहम स्थान रहा। वे पाकिस्तान के पूर्व रेलमंत्री रहे और बाद में राजस्थान के चौहटन क्षेत्र में प्रधान भी बने। परिवार का इतिहास सीमावर्ती इलाके की राजनीति और 1971 के युद्ध से जुड़ा रहा है।
भारतीय सेना के अभियान में भी निभाई भूमिका
1971 के युद्ध में पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में भारतीय सेना (Indian Army) के अभियान के दौरान छाछरो का नाम चर्चा में आया था। 6 दिसंबर 1971 को ब्रिगेडियर भवानी सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तान की ओर गए सिविल दस्ते में पदमसिंह भी शामिल थे।
भारतीय सेना की 10 पैरा कमांडो यूनिट (Para Commando Unit) ने युद्ध के दौरान पाकिस्तान के अंदर जाकर छाछरो और आसपास के इलाकों में अभियान चलाया था। इस कार्रवाई का मकसद पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर दबाव बनाना था और दुश्मन की गतिविधियों को रोकना था।
बावड़ी कलां में बसाया नया ठिकाना
पाकिस्तान छोड़ने के बाद पदमसिंह पहले चौहटन पहुंचे। इसके बाद उन्होंने बावड़ी कलां में अपना नया घर बनाया। लेकिन पाकिस्तान में छूटे गांव छाछरो की यादें उनके साथ हमेशा बनी रहीं। इसलिए उन्होंने खुद का नाम पदमसिंह छाछरो रख लिया था।
करीब डेढ़ साल पहले राजस्थान में गांवों के पुनर्गठन के दौरान बावड़ी कलां का नाम बदलकर आधिकारिक तौर पर छाछरो रख दिया था। इस नाम के पीछे क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और 1971 के युद्ध से जुड़ी यादों को सम्मान देना बताया गया था।
अब उसी नाम से बनी ग्राम पंचायत में पदमसिंह सोढ़ा का सरपंच चुना जाना उनके लिए खास उपलब्धि है। जिस गांव की पहचान वे दशकों तक अपने नाम के साथ जोड़ते रहे, अब उसी नाम वाले भारतीय गांव की जिम्मेदारी उनके हाथ में है।
338 वोटों से दर्ज की जीत
24 अक्टूबर को हुए चुनाव में पदमसिंह को 950 वोट मिले। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी धना राम को 612 वोट हासिल हुए। इस तरह पदमसिंह ने 338 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। उनकी जीत के बाद क्षेत्र में परिवार के पुराने इतिहास और युद्ध के दौरान उसके योगदान की चर्चा फिर तेज हो गई।
पदमसिंह की यह जीत एक ऐसे व्यक्ति की कहानी सामने लाती है, जिसने युद्ध के दौरान अपना पुश्तैनी घर छोड़ा, भारत में नया जीवन बसाया और दशकों बाद उसी नाम से जुड़े गांव का नेतृत्व संभालने का मौका पाया।