झुंझुनूं में सड़क बना रहे 8 मजदूरों की करंट से मौत, 5 झुलसे; 15 लाख मुआवजा और नौकरी पर बनी सहमति
सात घंटे के धरने के बाद मुआवजे पर सहमति
आठ मौतों के बाद ग्रामीणों और परिजनों में भारी आक्रोश फैल गया। उन्होंने मृतकों के परिवारों को दो-दो करोड़ रुपये मुआवजा और नौकरी देने की मांग की। करीब सात घंटे तक धरना और प्रशासन से बातचीत चली। शाम को सहमति बनी कि प्रत्येक मृतक के परिवार को अलग-अलग सरकारी योजनाओं के तहत कुल 15 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। साथ ही परिवार के एक सदस्य को संविदा पर नौकरी देने का आश्वासन दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हादसे पर दुख जताया। उन्होंने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से प्रत्येक मृतक के परिजन को दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा की। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने शोक व्यक्त करते हुए घायलों के बेहतर इलाज, प्रभावित परिवारों को तत्काल सहायता और घटना की जांच के निर्देश दिए।
11 हजार वोल्ट की बिजली लाइन से हुआ हादसा
यह हादसा सोमवार सुबह करीब 10 बजे हुआ था। छापोली से कदमकुंड की ओर जाने वाले रास्ते पर सीसी सड़क बनाने का काम चल रहा था। इस दौरान रोड़ी-बजरी मिलाने वाली मिक्सर मशीन को दूसरी जगह ले जाया जा रहा था। मशीन का हाइड्रोलिक जैक ऊपर से गुजर रही 11 हजार वोल्ट की बिजली लाइन से टकरा गया। इसके बाद मशीन में करंट फैल गया और उसके आसपास मौजूद मजदूर इसकी चपेट में आ गए।
एक ही परिवार के चार लोगों की मौत
हादसे में जान गंवाने वालों की पहचान हरिराम गुर्जर (30), मंगलचंद गुर्जर (22), कालूराम गुर्जर (29), पवन गुर्जर (23), ठेकेदार विष्णु सैनी (38), सुरेंद्र उर्फ सुरेश सैनी (30), मुकेश सैनी (27) और फतेहचंद सैनी (32) के रूप में हुई है। इनमें चार मजदूर हालेड़ा मंडावरा गांव के रहने वाले थे और एक ही परिवार से जुड़े बताए गए हैं। बाकी मृतक छापोली और आसपास के क्षेत्र के निवासी थे।
हादसे में पांच लोग झुलस गए। इनमें गीता देवी, संतरा देवी, मंजू देवी, महेंद्र और गीगाराम शामिल हैं। घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने घटनास्थल का जायजा लिया और घायलों के इलाज की जानकारी ली।
बिजली विभाग पर ग्रामीणों ने लगाए आरोप
हादसे के बाद ग्रामीणों ने बिजली विभाग और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि बिजली लाइन पहले सड़क से दूर थी, लेकिन कुछ दिन पहले पोल और लाइन की स्थिति बदली गई। इसके बाद तार सड़क के ऊपर आ गए और नीचे लटकने लगे। ग्रामीणों का दावा है कि लाइन की ऊंचाई कम होने के कारण मशीन उससे टकराई।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि हादसे के बाद बिजली बंद कराने के लिए ग्रिड सब स्टेशन पर फोन किया गया, लेकिन कर्मचारियों ने कॉल नहीं उठाया। ऑटो कट सिस्टम के काम नहीं करने की बात भी सामने आई है। हालांकि, लाइन की वास्तविक ऊंचाई, पोल शिफ्टिंग और बिजली आपूर्ति बंद होने में हुई देरी जैसे तकनीकी पहलुओं की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही होगी।
चंदा जुटाकर बनवा रहे थे सड़क
इस हादसे की एक और अहम बात है। जिस सड़क के निर्माण के दौरान आठ लोगों की जान गई, उसे गांव के लोग अपने स्तर पर बनवा रहे थे। ग्रामीणों के मुताबिक, कदमकुंड मंदिर तक जाने वाला करीब डेढ़ किलोमीटर का रास्ता लंबे समय से खराब था। इसके लिए वे करीब पांच साल से जिला प्रशासन के चक्कर काट रहे थे।
प्रशासन की ओर से रास्ते को वन विभाग की जमीन से जुड़ा बताते हुए जरूरी अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बाद ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाकर सड़क बनाने का फैसला किया। हालांकि, ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर ने कहा कि सड़क का काम सरकारी योजना के तहत नहीं, बल्कि जनसहयोग से कराया जा रहा था। जमीन वन विभाग की होने के कारण जरूरी प्रक्रिया पूरी किए बिना निर्माण करना नियमों के अनुरूप नहीं था।
कांग्रेस ने भी उठाए सवाल
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने हादसे पर दुख जताते हुए निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग की। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी घटना की जांच कराने और पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा देने की बात कही।
ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर ने कहा कि तकनीकी अधिकारियों को मौके पर भेजकर हादसे के कारणों की जांच कराई जा रही है। यदि बिजली विभाग की ओर से कोई तकनीकी या प्रशासनिक चूक सामने आती है तो कार्रवाई की जाएगी। अब जांच में यह साफ होना बाकी है कि हाईटेंशन लाइन के आसपास सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए गए और मशीन के संपर्क में आने के बाद बिजली आपूर्ति तत्काल बंद क्यों नहीं हुई।