झीलों में डी-सिल्टिंग पर विवाद, कांग्रेस ने लगाए 80 करोड़ के घोटाले के आरोप
समझें क्या है पूरा मामला
- अजमेर की झीलों में डी-सिल्टिंग के 78.80 करोड़ के प्रोजेक्ट पर विवाद।
- कांग्रेस ने इसे करीब 80 करोड़ का नया घोटाला बताया।
- कांग्रेस का आरोप- प्रोजेक्ट हाईकोर्ट और NGT के आदेशों का उल्लंघन।
- विशेषज्ञों के अनुसार डी-सिल्टिंग से झीलों का इकोसिस्टम बिगड़ सकता है।
- कांग्रेस ने सरकार से प्रोजेक्ट तत्काल रोकने की मांग की है।
अजमेर की ऐतिहासिक आनासागर और वरुण सागर झीलों में डी-सिल्टिंग के लिए 78.80 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को लेकर विवाद शुरू हो गया है। जल संसाधन विभाग ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया है। अजमेर शहर जिला कांग्रेस कमेटी ने इसे करीब 80 करोड़ का नया घोटाला बताया है।
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि यह काम हाई कोर्ट और एनजीटी के आदेशों का उल्लंघन है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा गया कि इस प्रोजेक्ट से झीलों के इकोसिस्टम और जलीय जीवन को नुकसान पहुंच सकता है।
400 करोड़ के बाद अब 80 करोड़ की तैयारी
कांग्रेस शहर अध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल ने आरोप लगाया कि अजमेर में पहले ही स्मार्ट सिटी और अन्य परियोजनाओं के नाम पर करीब 400 करोड़ रुपए का घोटाला हो चुका है।
उन्होंने कहा कि प्रशासन की बनाई चौपाटी और सेवन वंडर्स तक टूट गए लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब झीलों में डी-सिल्टिंग के नाम पर भ्रष्टाचार का नया अध्याय शुरू करने की तैयारी है।
हाई कोर्ट और NGT के आदेशों की अनदेखी
कांग्रेस के कानूनी सलाहकार विवेक पाराशर ने कहा कि जोधपुर हाई कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के स्पष्ट निर्देश हैं कि वेटलैंड क्षेत्र (आर्द्रभूमि) में इस तरह की गतिविधियां नहीं की जा सकतीं। उन्होंने बताया कि अब्दुल रहमान प्रकरण में उच्च न्यायालय ने झीलों की 1947 की स्थिति को बहाल रखने के निर्देश दिए हैं।
इसके साथ ही राजस्थान के मुख्य सचिव ने वर्ष 2025 में एनजीटी में हलफनामा देकर छह महीने में आनासागर के वेटलैंड क्षेत्र का सीमांकन करने का आश्वासन दिया था। पाराशर ने सवाल उठाया कि डेडलाइन बीत जाने के बाद भी इस पर अमल क्यों नहीं हुआ।
मिट्टी निकालने से बिगड़ेगा इकोसिस्टम
पाराशर ने पर्यावरणीय खतरों की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार मानसून के दौरान झील से मिट्टी निकालने से पानी में नाइट्रोजन और फास्फेट का संतुलन बिगड़ सकता है।
इससे ऑक्सीजन का स्तर कम हो सकता है। मछलियों की मौत, जलकुंभी की समस्या और प्रवासी पक्षियों के आगमन पर भी बुरा असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अजमेर ऐसी पर्यावरणीय समस्याओं का खामियाजा पहले भी भुगत चुका है।
झीलें कमाई का जरिया बन गईं
कांग्रेस नेताओं ने विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यदि उदयपुर की झीलों के साथ इसी तरह का व्यवहार होता तो वहां की झीलें भी खतरे में पड़ जातीं।
पाराशर ने कहा कि यह पूरा प्रोजेक्ट मिट्टी बेचने और सरकारी धन की बर्बादी का माध्यम बन सकता है। कांग्रेस नेताओं ने सरकार से मांग की कि इस प्रोजेक्ट को तत्काल रोका जाए और हाईकोर्ट व एनजीटी के आदेशों का पालन किया जाए।
FAQ
- डी-सिल्टिंग क्या होती है और इसे क्यों किया जाता है?
डी-सिल्टिंग (De-silting) का मतलब है झील या तालाब की तली में जमा मिट्टी और गाद निकालना। इससे झील की गहराई बढ़ती है और जल संग्रहण क्षमता में सुधार होता है। लेकिन गलत समय पर या गलत तरीके से की गई डी-सिल्टिंग पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती है। - NGT क्या है और इसके आदेश कितने बाध्यकारी हैं?
NGT यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाला विशेष न्यायालय है। इसके आदेश सभी राज्य सरकारों और विभागों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं। NGT के आदेश की अवहेलना पर दंड और मुआवजे का प्रावधान है। - मानसून के दौरान डी-सिल्टिंग से क्या खतरा है?
मानसून में मछलियों का प्रजनन काल होता है। इस दौरान मिट्टी निकालने से पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम होता है, नाइट्रोजन और फास्फेट का संतुलन बिगड़ता है और जलीय जीवन को नुकसान पहुंच सकता है।
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