बंगाल जीत से भूपेंद्र का बढ़ा कद, असम से जितेंद्र को लगा झटका, एक शहर की दो कहानी
Alwar: भारतीय राजनीति के मानचित्र पर राजस्थान का अलवर इन दिनों सत्ता के गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। संयोग देखिए कि देश के दो राज्यों पश्चिम बंगाल और असम में चुनावी बिसात बिछाने वाले महारथी एक ही शहर अलवर से ताल्लुक रखते हैं।
4 मई को आए चुनाव परिणामों ने जहां भाजपा के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को एक अजेय रणनीतिकार के रूप में स्थापित कर दिया है, वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह के लिए असम की हार एक बड़ा राजनीतिक झटका बनकर उभरी है।
यह मुकाबला केवल दो राज्यों के चुनाव का नहीं था, बल्कि अलवर से निकली दो अलग-अलग विचारधाराओं के संकटमोचकों की प्रतिष्ठा का भी था। आज एक खेमे में जीत का गुलाल उड़ रहा है, तो दूसरे खेमे में सन्नाटा पसरा है।
भूपेंद्र यादव: बंगाल की जीत और बढ़ता सियासी कद
भाजपा ने जब भूपेंद्र यादव को पश्चिम बंगाल चुनाव प्रभारी नियुक्त किया था, तभी यह साफ हो गया था कि पार्टी नेतृत्व उन पर कितना भरोसा करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की टीम के सबसे विश्वसनीय सदस्य माने जाने वाले यादव अपनी शांत और गंभीर कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं।
बंगाल जैसे कठिन राज्य में जहां तृणमूल कांग्रेस का मजबूत ढांचा था, वहां भूपेंद्र यादव ने सांगठनिक स्तर पर अभूतपूर्व काम किया। मतदान के दो चरण पूरे होने के बाद जब वे 30 मई को संक्षिप्त प्रवास पर अलवर आए थे, तब उनके चेहरे की मुस्कुराहट ने ही परिणामों का संकेत दे दिया था।
इन चुनाव नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यादव की बिछाई हुई बिसात ने बंगाल में भाजपा को बड़ी बढ़त दिलाई है। भाजपा के कार्यकर्ताओं का कहना है कि बंगाल की जीत ने यादव का कद राष्ट्रीय राजनीति में कई गुना बढ़ा दिया है। अब वे केवल एक कैबिनेट मंत्री नहीं, बल्कि पार्टी के नेशनल विनिंग फैक्टर बन चुके हैं।
भंवर जितेंद्र सिंह: असम की हार और नेतृत्व पर सवाल
दूसरी ओर, कांग्रेस नेता राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले भंवर जितेंद्र सिंह के लिए असम का रण अग्निपरीक्षा की तरह था। लंबे समय से असम के प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे सिंह ने वहां कांग्रेस की खोई जमीन वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था।
उधर, भंवर जितेंद्र सिंह ने कहा कि हमने असम में मजबूती से चुनाव लड़ा। यह विकट स्थिति का चुनाव था, क्योंकि भाजपा ने हर क्षेत्र में 50 करोड़ रुपए तक खर्च किए। भाजपा के लोग वोटरों को डरा रहे थे, धमका रहे थे। कांग्रेस वोटरों के साथ खड़ी रही। हमने पांच साल के कुशासन को उखाड़ने के लिए अच्छी लड़ाई लड़ी।
सोमवार को जब असम चुनाव परिणाम आए तो अलवर स्थित उनके आवास 'फूलबाग' पर सन्नाटा पसरा रहा। इक्का-दुक्का समर्थकों के अलावा वहां कोई चहल-पहल नहीं दिखी। हालांकि उनके समर्थक कह रहे हैं कि असम में जितनी भी सीटें मिली हैं, वह जितेंद्र सिंह की मेहनत का नतीजा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी महासचिव के तौर पर वे राज्य में सत्ता विरोधी लहर को भुनाने में नाकाम रहे। कांग्रेस के अंदरूनी हलकों में अब इस हार की जवाबदेही तय करने की मांग उठने लगी है।
राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध जनआवाज
भूपेंद्र यादव ने अलवर के नाम अपनी पाती में सिर्फ इतना लिखा, आज 4 मई देश के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। पश्चिम बंगाल में भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ पहली बार सरकार बनाने की दिशा में बढ़ रही है। यह जनादेश बरसों से चले आ रहे भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण और राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध जनता की स्पष्ट आवाज़ है। यह परिणाम केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि सुशासन, विकास और सुरक्षा के प्रति लोगों के विश्वास की मुहर है।
अब तक यादव की परफार्मेंस शानदार
पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले भी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का परफार्मेंस रिकॉर्ड बेहतर रहा है। यादव ने जिन प्रदेशों में प्रभारी और सह प्रभारी के रूप में काम किया, वहां भाजपा को अच्छी सफलता मिली। कुछ महीने पहले उन्हें बिहार चुनाव का प्रभारी बनाया गया था, जहां पार्टी ने सबसे ज्यादा सीटें जीतीं।
यादव को 2020 में भी बिहार का चुनाव प्रभारी बनाया गया था, जहां भाजपा ने अपनी स्थिति को बेहतर बनाया। उन्हें 2022 में मणिपुर चुनाव की जिम्मेदारी दी गई। यहां भी भाजपा को सफलता मिली। इसी तरह 2023 में मध्य प्रदेश और 2024 में महाराष्ट्र चुनाव का प्रभारी बनाया गया। दोनों राज्यों में भाजपा सत्ता में है।
राष्ट्रीय राजनीति का पावर सेंटर बना अलवर
यह पहली बार है जब किसी एक छोटे से शहर से निकले दो नेता देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों की चुनाव मशीनरी को कंट्रोल कर रहे थे। भाजपा में बंगाल चुनाव प्रभारी के रूप में भूपेंद्र यादव के जीत के बाद कद में भारी बढ़ोतरी हुई है। वहीं, असम में कांग्रेस की हार के भंवर जितेंद्र सिंह पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है।
इन दोनों नेताओं के कारण ही आज अलवर जिला दिल्ली की राजनीति में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यादव जहां मोदी-शाह की कोर टीम का हिस्सा हैं, वहीं जितेंद्र सिंह सोनिया-राहुल गांधी की टीम के महत्वपूर्ण सिपाही हैं।
'राजतंत्र बनाम लोकतंत्र'
चुनाव परिणामों के बाद जुबानी जंग भी तेज हो गई है। पूर्व विधायक बनवारीलाल सिंघल ने जितेंद्र सिंह पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जो व्यक्ति खुद अपनी लोकसभा सीट दो बार प्रचंड अंतर से हार चुका हो, वह किसी दूसरे राज्य में पार्टी को कैसे जिता सकता है?
सिंघल का कहना है कि कांग्रेस ने ऐसे व्यक्ति को असम का प्रभारी बनाया, जिसकी अपनी जमीन खत्म हो चुकी है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि अब राजतंत्र का दौर बीत चुका है, यह लोकतंत्र है जो केवल मूल्यों और प्रदर्शन पर चलता है।
भविष्य की राह
दोनों नेताओं की व्यस्तता का आलम यह था कि वे महीनों से अपने गृह क्षेत्र अलवर नहीं आ पाए। भूपेंद्र यादव बंगाल के बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने में जुटे रहे। उनके समर्थकों ने अब अलवर में उनके भव्य स्वागत की तैयारी शुरू कर दी है। आने वाले समय में संगठन या सरकार में उन्हें और भी बड़ी जिम्मेदारी मिलना तय माना जा रहा है।
भंवर जितेंद्र सिंह के लिए अब भविष्य की राह चुनौतीपूर्ण है। असम में मिली हार के बाद उन्हें पार्टी के भीतर और बाहर कड़े सवालों का सामना करना होगा। विशेषकर राजस्थान की राजनीति में भी उनके विरोधी इस हार को हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे।
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