बिजली प्लांट के लिए 1.19 लाख पेड़ों की बलि की तैयारी, कूनो से दूरी है मात्र 15 किलोमीटर
News In Short
- राजस्थान में शाहाबाद के जंगलों में 1.19 लाख पेड़ों के काटे जाने की तैयारी।
- लैंड डायवर्जन की प्रक्रिया में वन विभाग ने महज 22 दिन में हरी झंडी दिखाई।
- पर्यावरण प्रेमी और कुछ संस्था बिजली संयंत्रों का कर रही है विरोध।
- यह वन्यजीवों के आवागमन के लिएद संवेदनशील, कूनो से मात्र 15 किलोमीटर।
- राजस्थान वन विभाग ने दी अनुमति, अब फाइल मंजूरी के लिए केंद्र के पास।
News In Detail
जागेश्वर प्रसाद @ जयपुर
विकास और पर्यावरण के बीच चल रही जंग में फिर प्रकृति हारती नजर आ रही है। राजस्थान के बारां जिले में शाहाबाद के घने जंगलों को काटकर निजी कंपनी ग्रीनको एनर्जीज प्राइवेट लिमिटेड के पम्प्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट (बिजली प्लांट) स्थापित करने की तैयारी तेज हो गई है। ताज्जुब की बात यह है कि जिस लैंड डायवर्जन (भूमि परिवर्तन) की प्रक्रिया में महीनों लगते हैं, उसे वन विभाग ने महज 22 दिन के भीतर हरी झंडी दिखाकर केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए भेज दिया है। अनुमति मिली तो इस प्रोजेक्ट के लिए 1.19 लाख पेड़ काटे जाएंगे।
प्रोजेक्ट की बड़ी बातें
कंपनी: ग्रीनको एनर्जीज प्राइवेट लिमिटेड।
लोकेशन: राजस्थान में बारां का शाहाबाद।
कूनो नेशनल पार्क से मात्र 15 किमी दूर
प्रभावित क्षेत्र: 407 हेक्टेयर वन भूमि।
पेड़ों की कटाई: करीब 1.19 लाख पेड़ों को काटने का अनुमान।
निवेश: कंपनी ने इस प्रक्रिया के लिए 73.32 करोड़ रुपये जमा करा दिए हैं।
क्यों हो रहा है विरोध
पर्यावरण प्रेमियों और 'हम लोग' जैसी संस्थाओं का कहना है कि यह पूरा प्रोजेक्ट एक कंजर्वेशन रिजर्व के भीतर प्रस्तावित है। सबसे बड़ी चिंता चीता कॉरिडोर को लेकर है। कूनो नेशनल पार्क से महज 15 किलोमीटर दूरी के करीब होने के कारण यह इलाका वन्यजीवों के आवागमन के लिए बेहद संवेदनशील है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई से न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ेगा, बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास भी खत्म हो जाएंगे।
विभाग की 'सुपरफास्ट' कार्रवाई
सूत्रों के अनुसार वन विभाग ने जंगल काटने की इस फाइल को असाधारण गति से आगे बढ़ाया। कंपनी ग्रीनको एनर्जीज ने 18 फरवरी 2026 को डिमांड के तौर पर 73.32 करोड़ पैसे जमा किए। इसकी रिपोर्ट डीसीएफ को सौंपी। इसके बाद 6 मार्च को रिपोर्ट कोटा सीसीएफ से होते हुए वन विभाग के मुख्य कार्यालय पहुंची। नोडल अधिकारी और शासन सचिव के स्तर से होते हुए फाइल 10 मार्च को केंद्रीय मंत्रालय को दिल्ली भेज दी गई।
कोर्ट की है पैनी नजर
हालांकि वन विभाग ने कागजी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं, लेकिन अंतिम फैसला न्यायपालिका के हाथ में है। इस मुद्दे पर पहले हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया था। सुनवाई के बाद कोर्ट ने आदेश दिए थे कि वन विभाग अपनी प्रक्रिया पूरी करे, लेकिन पेड़ों की कटाई की अनुमति हाई कोर्ट से लेनी होगी।
अनिवार्य वनीकरण पर सवाल
सरकार का दावा है कि इस बिजली प्लांट के लिए जितने पेड़ काटे जाएंगे, उससे दोगुने पेड़ किसी अन्य खाली भूमि पर लगाए जाएंगे। हालांकि, रिकॉर्ड बताते हैं कि कागजों पर होने वाले वनीकरण और धरातल पर जीवित रहने वाले पेड़ों की संख्या में जमीन-आसमान का अंतर होता है। स्थानीय समुदायों को डर है कि इस प्रोजेक्ट से न केवल हवा प्रदूषित होगी, बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधन भी खत्म हो जाएंगे।
आगे क्या
अब सबकी नजरें केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हैं। क्या सरकार पर्यावरण की चिंताओं को दरकिनार कर बिजली संयंत्र को हरी झंडी देगी, या प्रोजेक्ट के डिजाइन में बदलाव कर पेड़ों को बचाने का कोई बीच का रास्ता निकाला जाएगा? आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से और गरमा सकता है।
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