राजस्थान में कैंसर रिसर्च में बड़ी सफलता, मुंह से दवा देने की नई नैनो तकनीक को मिला पेटेंट
कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी और रेडिएशन के दुष्प्रभावों से परेशान मरीजों के लिए राजस्थान से अच्छी खबर सामने आई है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के फार्मेसी विभाग की प्रोफेसर डॉ. गरिमा जोशी और उनके शोधार्थी शेख शहनवाज कादिर ने कैंसर की दवा को मुंह से देने के लिए एक विशेष ओरल नैनो-फॉर्मूलेशन तकनीक विकसित की है। इस तकनीक को पेटेंट भी मिल चुका है। शुरुआती प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों में इसके उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं।
यह शोध खास तौर पर अग्नाशय यानी पैंक्रियाटिक कैंसर की दवा को शरीर में बेहतर तरीके से पहुंचाने पर केंद्रित रहा। शोधकर्ताओं के मुताबिक, नई तकनीक से तैयार दवा का अवशोषण सामान्य दवा की तुलना में 165 प्रतिशत से अधिक बेहतर पाया गया। इसके अलावा, कैंसर कोशिकाओं पर किए गए परीक्षणों में 31.4 प्रतिशत तक एपोप्टोटिक प्रभाव दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि परीक्षण के दौरान कैंसर कोशिकाओं की नियंत्रित मृत्यु से जुड़े परिणाम सामने आए।
नैनो तकनीक से दवा का अवशोषण बेहतर बनाने की कोशिश
प्रोफेसर डॉ. गरिमा जोशी के अनुसार, इस शोध की शुरुआत वर्ष 2021 में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) के तहत मिले शोध प्रोजेक्ट से हुई थी। इसके लिए विश्वविद्यालय में आधुनिक उपकरणों से लैस नैनो-फॉर्मूलेशन रिसर्च लैब स्थापित की गई।
शोध में कैंसर की दवा पैक्लिटैक्सेल को फॉस्फेटिडिलकोलीन की विशेष दोहरी परत में तैयार किया गया। इसका उद्देश्य आंतों की बाधाओं को पार कर दवा का शरीर में बेहतर अवशोषण सुनिश्चित करना है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस तकनीक से दवा को मुंह के जरिए देने की संभावनाओं पर आगे काम किया जा सकेगा।
ब्रिटेन में भी हुआ शोध, अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुतीकरण
इस शोध से जुड़े शेख शहनवाज कादिर को ब्रिटेन की कॉमनवेल्थ स्प्लिट-साइट फेलोशिप मिली। उन्होंने लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इमरान सलीम के मार्गदर्शन में अपने पीएचडी शोध का एक हिस्सा पूरा किया। इस शोध को ऑस्ट्रिया की ग्राज यूनिवर्सिटी में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में भी प्रस्तुत किया गया।
मरीजों तक पहुंचने में अभी लगेगा समय
हालांकि, इस उपलब्धि के साथ यह समझना भी जरूरी है कि नई तकनीक अभी प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों के स्तर पर है। मरीजों में इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित करने के लिए क्लीनिकल ट्रायल जरूरी होंगे। इसलिए फिलहाल इसे कैंसर का स्थापित इलाज या कीमोथेरेपी का विकल्प नहीं माना जा सकता।
यदि आगे के परीक्षण सफल रहते हैं, तो यह तकनीक भविष्य में कैंसर की दवा देने के अधिक सुविधाजनक तरीके विकसित करने में मदद कर सकती है। फिलहाल यह शोध राजस्थान के विश्वविद्यालय में कैंसर उपचार से जुड़ी नई संभावनाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।