राजस्थान में नया कृषि समाधान: काजरी के वैज्ञानिकों ने मोठ की 4 नई किस्में लॉन्च कीं

Jyoti Mahender Bhardwaj | Oct 05, 2026, 10:51 IST
किसानों के लिए आई बड़ी राहत
काजरी ने राजस्थान के सूखा प्रभावित किसानों के लिए चार नई मोठ किस्में विकसित की हैं, जिसमें काजरी मोठ-4, 5, 6 और 7 शामिल हैं। ये किस्में कम जल में भी लम्बे समय तक जीवित रह सकती हैं और उपज को बढ़ावा दे सकती हैं। इनके बीज की सुरक्षा का भी लाभ मिलेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये किस्में कृषि उत्पादन में सुधार में सहायक होंगी।

समझें क्या है पूरा मामला

  • काजरी ने मोठ की चार नई किस्में तैयार की हैं।
  • इनका नाम काजरी मोठ-4, 5, 6 और 7 रखा गया है।
  • नई किस्में तेज गर्मी और पानी की कमी में भी लंबे समय तक हरी रह सकती हैं।
  • नई किस्मों में करीब 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिलने की उम्मीद है।
  • किसान फसल से प्राप्त बीज को अगली बुवाई के लिए भी सुरक्षित रख सकेंगे।

राजस्थान में मौसम की मार और पानी की कमी से परेशान किसानों के लिए राहत की खबर है। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के वैज्ञानिकों ने मोठ की चार नई और उन्नत किस्में तैयार की हैं। खास बात यह है कि इन किस्मों को कम बारिश और तेज गर्मी वाले इलाकों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।



काजरी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, नई किस्मों की फसल लंबे समय तक बिना बारिश के भी खेत में हरी-भरी रह सकती है। सामान्य परिस्थितियों में राजस्थान में मोठ की औसत पैदावार करीब 3.3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि नई किस्मों में करीब 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिलने की उम्मीद है। यानी कम पानी वाले हालात में भी किसानों को बेहतर पैदावार मिल सकती है।



सूखे इलाकों को ध्यान में रखकर तैयार की किस्में

काजरी के निदेशक डॉ. एचएस जाट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में मौसम में बदलाव और अल नीनो जैसी परिस्थितियों के कारण राजस्थान के सूखे क्षेत्रों में बारिश में कमी देखने को मिली है। ऐसे हालात में किसानों के सामने फसल को बचाए रखने की बड़ी चुनौती रहती है।



इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए मोठ की इन नई किस्मों को विकसित किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये किस्में कम पानी में भी लंबे समय तक खेत में टिके रहने की क्षमता रखती हैं।




एक महीने तक बारिश नहीं हुई, फिर भी फसल हरी

नई किस्मों का परीक्षण काजरी के जोधपुर स्थित फार्म पर किया गया। यहां 10 जुलाई को मोठ की बुवाई की गई थी। इसके बाद 2 अगस्त को करीब 86 मिलीमीटर बारिश हुई। बारिश के बाद एक महीने से ज्यादा समय तक वहां बारिश नहीं हुई।



इसके बावजूद नई किस्मों की फसल खेत में हरी-भरी बनी रही। वैज्ञानिकों के मुताबिक, लंबे समय तक बारिश नहीं होने के बाद भी फसल को नुकसान नहीं हुआ और इससे करीब 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिलने की उम्मीद है।



किसानों को अगले साल मिल सकता है बीज

काजरी कृषि वैज्ञानिक हंसराज मेहला के मुताबिक, संस्थान में मोठ के अलावा ग्वार, मूंग और इसबगोल जैसी फसलों की नई किस्मों पर भी काम किया जा रहा है। भारत सरकार ने वर्ष 2024 में काजरी मोठ-4 और काजरी मोठ-5 को मंजूरी दी थी। इसके बाद काजरी के वैज्ञानिकों ने करीब 50 क्विंटल अच्छी गुणवत्ता वाला बीज तैयार किया है। सरकारी पोर्टल के माध्यम से करीब 23 क्विंटल बीज की मांग भी सामने आई है। इसके अलावा काजरी फार्म पर लगभग 40 क्विंटल बीज तैयार होने की उम्मीद है।




एक बार खरीदने के बाद किसान रख सकेंगे बीज

इन किस्मों की एक खासियत यह भी है कि किसान फसल तैयार होने के बाद उसके बीज को अगली बुवाई के लिए सुरक्षित रख सकते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, बीज की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए अलग-अलग किस्मों के बीज को आपस में मिलाने से बचना जरूरी होगा।



काजरी की ओर से बीज निगम को बीज उपलब्ध कराने के साथ किसानों के लिए अलग से बीज तैयार किया जा रहा है। करीब 50 क्विंटल बीज किसानों को उपलब्ध कराने की तैयारी है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक क्विंटल बीज करीब सात हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त हो सकता है।



खेत की नमी बचाने पर भी जोर

वैज्ञानिकों ने किसानों को केवल अच्छी किस्म का बीज इस्तेमाल करने के साथ खेत की नमी बचाने पर भी ध्यान देने की सलाह दी है। नई किस्मों की बुवाई के करीब 25 से 30 दिन बाद खड़ी फसल के बीच हल चलाने से मिट्टी की ऊपरी परत टूट जाती है। इससे जमीन के अंदर मौजूद नमी के तेजी से भाप बनकर उड़ने की प्रक्रिया कम होती है।



यही नमी फसल को अगली बारिश तक टिकाए रखने में मदद करती है। इसके साथ ही खेत को खरपतवार से मुक्त रखना भी जरूरी बताया गया है, क्योंकि घास-पूस मिट्टी में मौजूद पानी और पोषक तत्वों का इस्तेमाल कर लेते हैं।



काजरी वैज्ञानिकों का कहना है कि राजस्थान जैसे कम बारिश वाले क्षेत्रों में पानी को खेत में रोकना, मिट्टी की नमी बचाना और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का इस्तेमाल फसल उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है।



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