15.95 करोड़ का क्लेम, उपभोक्ता आयोग के बहुमत फैसले को अध्यक्ष का मानने से इंकार, नई बेंच गठित
जस्टिस देवेंद्र कच्छावा ने नई बैंच में सुनवाई के दिए आदेश
अध्यक्ष जस्टिस देवेंद्र कच्छावा ने दो सदस्यों के फैसले से असहमति जताते हुए और उसमें कई कमियां निकालकर 24 अक्टूबर को नई बैंच में सुनवाई के लिए आदेश कर दिए हैं। जबकि उपभोक्ता कानून की धारा-47 के तहत किसी भी मामले में बहुमत के आधार पर ही फैसला होता है।
इसके बावजूद अध्यक्ष देवेंद्र कच्छावा ने अजमेर सर्किट बैंच में मामले को पुन: सुनवाई के लिए 24 अक्टूबर को लिस्ट करने के आदेश दिए हैं। जबकि कानूनी रुप से आयोग के आदेश से असहमत होने पर दोनों ही पक्षकारों के पास इसे राष्ट्रीय आयोग में चुनौती देने का अधिकार है।
क्या था पूरा मामला:
भीलवाड़ा जिला उपभोक्ता आयोग ने तीन जून, 2024 को यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ परिवादी मैसर्स ऐडिग जेमटेक्स प्रा.लि. का परिवाद स्वीकार करते हुए 15,95,65,010 रुपये की क्षतिपूर्ति राशि 9% वार्षिक ब्याज और 2.5 लाख रुपये मुकदमे खर्च सहित 2 महीने में चुकाने का आदेश दिया था।
इंश्योरेंस कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील की थी। आयोग में अपील यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (United India Insurance Company Limited) बनाम नंदकिशोर जिंदल व अन्य के नाम से दर्ज है।
अपील पर आयोग की अजमेर सर्किट बैंच में सुनवाई हुई थी। आयोग अध्यक्ष जस्टिस देवेंद्र कच्छावाहा,न्यायिक सदस्य सुरेंद्र सिंह व जय गौतम की बैंच ने 29 जून, 2026 को मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया था। दो सदस्य सुरेंद्र सिंह व जय गौतम ने अपना फैसला लिखवाकर अपने-अपने हस्ताक्षर करके अध्यक्ष को भेज दिया था।
अध्यक्ष का फैसला मानने से इंकार
अध्यक्ष ने बहुमत के फैसले को मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने 14 अगस्त,2026 के आदेश में दो सदस्यों के दिए गए फैसले में कई कमियां निकालते हुए मामले को एक नई बैंच में सुनवाई के लिए 24 अगस्त,2026 को अजमेर सर्किट बैंच में सूचीबद्ध करने के आदेश कर दिए।
यह कमियां बताई अध्यक्ष ने
- अध्यक्ष जस्टिस देवेंद्र कच्छावा ने 14 अगस्त,2026 के आदेश में दो सदस्यों के दिए गए फैसले में कई कमियां बताई हैं।
- बहस पूरी होने और निर्णय लिखाए जाने के बीच लंबा समय बीत जाने के कारण कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान नहीं दिया गया।
- पार्टियों के नाम व संख्या में विरोधाभास है। निर्णय के पृष्ठ संख्या 24 के पैरा 54 में बैंक ऑफ बड़ौदा को विपक्षी संख्या 5 बताया गया है। जबकि भीलवाड़ा उपभोक्ता आयोग में अंतिम संशोधित टाईटल में बैंक को विपक्षी संख्या 4 बताया है। रिकॉर्ड पर विपक्षी संख्या 5 के रूप में कोई है ही नहीं।
- फैसले में परिवाद फर्म के निलंबित निदेशकों की ओर से पेश होने के कारण परिवाद को सुनवाई योग्य ही नहीं माना है। लेकिन,उन्होंने इस कानूनी तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि संशोधन आदेश के तहत ऐडिग जेमटेक्स प्रा.लि.स्वयं परिवादी संख्या तीन के रूप में पक्षकार रही है। कानून के सर्वमान्य सिद्धांत के अनुसार संयोजित पक्षकार की संलिप्तता मुकदमा पेश करने की तारीख से ही प्रभावी मानी जाती है। लेकिन दोनों सदस्यों ने इस बिंदू पर कोई विचार नहीं किया है।
- फैसले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के फैसलों का हवाला देकर यह माना गया कि सर्वेयर रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं है और बीमा कंपनी दूसरा सर्वेयर नियुक्त कर सकती थी। इसके बावजूद, मौजूदा प्रकरण में बिना किसी दूसरे सर्वेयर की नियुक्ति के बीमा कंपनी के पक्ष में निष्कर्ष देना और परिवादी को इसके लिए दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है। इसके अलावा,भीलवाड़ा उपभोक्ता आयोग पर सर्वेयर रिपोर्ट को न मानने का ठोस कारण न लिखने की टिप्पणी की है। जबकि स्वयं न्यायिक सदस्य ने भी अपने निर्णय में सर्वेयर रिपोर्ट को खारिज करने का कोई ठोस आधार स्पष्ट नहीं किया।
- फैसले में यह माना गया कि वादी कंपनी के विरुद्ध दिवालिया कार्यवाही शुरू होकर आर.पी. (रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल ) नियुक्त हो चुका है। इसलिए कंपनी बैंक को कर्ज चुकाने या राजीनामा करने में सक्षम नहीं है।
- अध्यक्ष का कहना है कि दोनों सदस्यों ने इसके लिए कोई न्यायसंगत कारण नहीं बताया है। जिससे यह स्पष्ट हो सके कि ऋणी व्यक्ति, बैंक की बकाया राशि क्यों नहीं जमा करवा सकता या समझौता क्यों नहीं कर सकता ?
- फैसले के पैरा 57 में कंपनी के अधिकृत व्यक्ति सौरभ जैन के शपथ-पत्र के साक्ष्य के आधार पर निर्णय परिवादी के पक्ष में होने की बात स्वीकार की गई है। लेकिन, इसके बावजूद विपक्षी बीमा कंपनी की साक्ष्य तुलनात्मक रूप से अधिक विश्वसनीय माना है। लेकिन,यह नहीं बताया है कि बीमा कंपनी के सबूत अधिक विश्चसनीय क्यों हैं ।
पुन:सुनवाई के आदेश
मामले में पुन:सुनवाई की जरुरत के लिए अध्यक्ष का यह भी कहना है कि हो सकता है कि बहस सुने जाने और फैसला लिखवाने के बीच काफी समय निकलने के कारण न्यायिक सदस्य सुरेन्द्र सिंह संभवतः संपूर्ण पत्रावली और अभिलेखों का सूक्ष्म अवलोकन नहीं कर सके हैं। जबकि नियमों के तहत 30 दिन में फैसला देना जरुरी है। इन्हीं
कमियों को आधार बनाकर अध्यक्ष देवेंद्र कच्छावा ने बहुमत के फैसले को नकारते हुए 24 अक्टूबर को मामले में पुन: सुनवाई करने के आदेश दिए हैं। उन्होंने बैंच में शामिल होने वाले सदस्यों को पुरानी बैंच के दोनों के फैसले का अवलोकन करने को भी कहा है।
यह है धारा-47
यदि बैंच के सदस्यों में किसी मुद्धे या मुद्धों पर एकराय न हो तो,ऐसे मुद्धे या मुद्धों को बहुमत से तय किया जाएगा। लेकिन,यदि सदस्य बराबर—बराबर संख्या में बंटे हों तो,उन्हें उन बिंदुओं को लिखना होगा जिन पर वे एकराय नहीं हैं,और अध्यक्ष को रेफरेंस भेजना होगा। अध्यक्ष चाहें तो स्वयं ऐसे बिुदंओं की सुनवाई करें या दूसरे सदस्यों से सुनवाई करवाएं,लेकिन इसके बाद फैसला बहुमत से ही होगा और इसमें पूर्व में सुनवाई करने वाले सदस्य भी शामिल होंगे।
अध्यक्ष जस्टिस देवेंद्र कच्छावा ने मामले में कुछ भी कहने से इंकार करते हुए कहा कि आयोग में सैकडों आदेश होते हैं इसलिए उन्हें ध्यान नहीं है कि क्या मामला है।
फैसला गैर-कानूनी
अध्यक्ष का यह आदेश गैर-कानूनी है। यदि वह सदस्यों के फैसले से सहमत नहीं हैं तो अपना अलग फैसला दे सकते हैं,लेकिन किसी भी स्थिति में मामले में पुन: सुनवाई का फैसला नहीं दे सकते। क्यों कि सदस्यों के फैसले में कमियां निकालना उनका नहीं बल्कि नेशनल कमीशन का काम है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि किसी भी न्यायिक आदेश के लिए प्रशासनिक साईड से आदेश नहीं हो सकता।- एडवोकेट पूनीत शर्मा