जन्माष्टमी का प्रसाद बेटे तक नहीं पहुंचा, देना होगा कूरियर कंपनी को हर्जाना

Ashish Bhardwaj | Jun 15, 2026, 20:23 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में जन्माष्टमी पर एक मां ने प्रसाद तैयार किया। उसे हरियाणा में पढ़ रहे बेटे को भेजा। कूरियर कंपनी इसे डिलीवर नहीं कर पाई। राज्य उपभोक्ता आयोग ने माना कि कंपनी सेवा देने में नाकाम रही है।

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Jodhpur: जन्माष्टमी पर एक मां के हाथों से बने प्रसाद को हरियाणा में पढ़ रहे उसके बेटे तक न पहुंचाना कूरियर कंपनी को भारी पड़ गया।



राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कूरियर सेवा में कमी पाते हुए मां के पक्ष में फैसला सुनाया है। कंपनी को प्रसाद राशि समेत 4,000 रुपए देने का आदेश दिया है।



​धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से जुड़े इस कानूनी विवाद पर आयोग ने कहा कि मां द्वारा घर पर तैयार किए गए धार्मिक प्रसाद वाले पार्सल को डिलीवर न करके कूरियर कंपनी अपनी सेवा देने में पूरी तरह नाकाम रही है।



​कूरियर कंपनी ने जिला उपभोक्ता मंच के फैसले को चुनौती देते हुए राज्य आयोग में अपील की थी। कंपनी का तर्क था कि उनके नियमों के अनुसार खराब होने वाले खाद्य पदार्थों (पेरिसेबल फूड) को भेजना प्रतिबंधित है। न्यायिक सदस्य मुकेश और लियाकत अली की पीठ ने यह अपील खारिज कर दी।



राज्य आयोग ने कहा कि चूंकि कूरियर कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि बेटे को पार्सल सौंपने का कोई वास्तविक प्रयास किया गया था। पार्सल कभी अपनी मंजिल तक पहुंचा ही नहीं, इसलिए सेवा में कमी का यह निष्कर्ष पूरी तरह सही और न्यायसंगत है।



जो बेटे तक कभी पहुंचा ही नहीं

​यह मामला 9 सितंबर 2023 का है। जोधपुर की रहने वाली अल्पना पांडेय ने जन्माष्टमी पर अपने बेटे वेदांत पांडेय के लिए बड़े प्यार से प्रसाद तैयार किया था।



वेदांत हरियाणा के सोनीपत में स्थित डॉ. बी.आर. अंबेडकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में कानून (Law) की पढ़ाई कर रहा है।



मां ने इस घरेलू प्रसाद को अपने बेटे तक पहुंचाने के लिए आकाश गंगा कूरियर की जोधपुर शाखा से संपर्क किया। कूरियर कंपनी ने 150 रुपए लेकर 12 सितंबर 2023 तक पार्सल पहुंचाने का भरोसा दिया, लेकिन पार्सल कभी बेटे तक पहुंचा ही नहीं।


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रिकॉर्ड के अनुसार मां ने कई बार कंपनी के चक्कर काटे और पूछताछ की, लेकिन कंपनी ने कंसाइनमेंट (पार्सल) के बारे में कोई सही जानकारी नहीं दी।



मां का कहना था कि कंपनी की इस लापरवाही के कारण भगवान का पवित्र प्रसाद सड़ गया और बेकार हो गया। इससे उन्हें गहरा मानसिक कष्ट हुआ और उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।



​जिला उपभोक्ता मंच में मां की जीत

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 4 नवंबर 2025 को जिला उपभोक्ता आयोग ने मां की याचिका को स्वीकार कर लिया।


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जिला आयोग ने कूरियर सर्विस की लापरवाही को रेखांकित करते हुए कंपनी को आदेश दिया कि वह मां को मानसिक और भावनात्मक कष्ट के लिए 2000 रुपए और लिटिगेशन कॉस्ट के रूप में 2000 रुपए का भुगतान करे। आयोग ने कंपनी को 30 दिन के भीतर इस आदेश का पालन करने को कहा था। ऐसा न करने पर 9% वार्षिक ब्याज लगाने की चेतावनी भी दी थी।



​कूरियर कंपनी का बचाव और तर्क

​जिला मंच के इस फैसले के खिलाफ कूरियर कंपनी राज्य आयोग पहुंची। कंपनी ने दलील दी कि उनका काम केवल दस्तावेजों और सामानों का परिवहन करना है, और उनके नियमों के तहत प्रसाद जैसी खराब होने वाली चीजें भेजने की मनाही है।


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कंपनी का यह भी दावा था कि मां ने पार्सल बुक करते समय यह नहीं बताया था कि इसमें खाने-पीने का पवित्र प्रसाद है। उन्होंने इसे सिर्फ एक आर्टिकल (सामान) बताया था। अगर उन्हें पहले पता होता, तो वे इसे स्वीकार ही नहीं करते।



कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि उनके डिलीवरी बॉय ने कई बार यूनिवर्सिटी जाकर पार्सल देने की कोशिश की, लेकिन दिए गए पते पर छात्र मिला ही नहीं। इसी वजह से पार्सल 19 अक्टूबर 2023 को वापस जोधपुर ऑफिस आ गया। इसकी सूचना मां को दे दी गई थी।



​कूरियर कंपनी के दावों की खुली पोल

​राज्य आयोग कूरियर कंपनी की इन दलीलों से बिल्कुल सहमत नहीं हुआ। आयोग ने साफ कहा कि यह बात बिल्कुल सच है कि मां द्वारा भेजा गया पार्सल उसके बेटे तक कभी पहुंचा ही नहीं।



​राज्य आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि जब पार्सल पर पूरा और सही पता लिखा हुआ था तो डिलीवरी फेल कैसे हो गई?


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जब आयोग ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों की जांच की, तो पाया कि कूरियर कंपनी जिन कागजों का हवाला दे रही थी, उन पर कहीं भी प्राप्तकर्ता के पास जाने या प्रयास करने के हस्ताक्षर नहीं थे।



आयोग ने इस बात को भी नोट किया कि कंपनी ने हॉस्टल के वार्डन, गेटकीपर या किसी अन्य संबंधित व्यक्ति से भी यह पुष्टि कराने की कोशिश नहीं की कि छात्र वहां मौजूद नहीं था। ऐसा कोई सबूत नहीं मिला।



​आयोग ने चुटकी लेते हुए कहा कि कंपनी के अपने रिकॉर्ड के मुताबिक पार्सल 7 अक्टूबर 2023 को ही वापस आ गया था। अगर प्राप्तकर्ता वाकई वहां नहीं मिल रहा था, तो पार्सल को इतने लंबे समय तक रास्ते में रखने के बजाय तुरंत वापस भेज दिया जाना चाहिए था।



मुआवजा बरकरार

कूरियर कंपनी की अपील को सिरे से खारिज करते हुए राज्य आयोग ने कहा कि जिला आयोग ने प्रसाद की कीमत का कोई मुआवजा नहीं लगाया है।



उन्होंने मां को हुए मानसिक और भावनात्मक दर्द के लिए सिर्फ 2000 रुपए और अदालती खर्च के लिए 2000 का सिंबोलिक मुआवजा दिया है। ऐसे में पिछले आदेश में दखल देने की कोई वजह नहीं बनती।



​अदालत ने आकाश गंगा कूरियर की अपील को खारिज करते हुए जिला उपभोक्ता मंच के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा।



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