दौसा में फर्जी सिलिकोसिस सर्टिफिकेट घोटाला, 2 डॉक्टर और 1 रेडियोग्राफर गिरफ्तार
News In Short
- दौसा में फर्जी सिलिकोसिस सर्टिफिकेट देने पर 2 डॉक्टर और 1 रेडियोग्राफर गिरफ्तार।
- तीनों ने 413 फर्जी सर्टिफिकेट जारी कर सरकार को 12.39 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया।
- दौसा में 2453 सिलिकोसिस सर्टिफिकेट बनाए गए , जो प्रदेश का 46 प्रतिशत हिस्सा है।
- जांच में आया कि फर्जी सर्टिफिकेट के लिए एक ही एक्सरे का बार-बार इस्तेमाल हुआ।
- सिलिकोसिस सर्टिफिकेट से पीड़ित मरीजों को उपचार के लिए आर्थिक मदद मिलती है।
News In Detail
राजस्थान के दौसा जिले में सिलिकोसिस के फर्जी सर्टिफिकेट जारी करने के मामला सामने आया है। इस मामले में दो डॉक्टर और एक रेडियोग्राफर को गिरफ्तार किया गया है। इन तीनों पर आरोप है कि इन्होंने दौसा में 413 फर्जी सिलिकोसिस सर्टिफिकेट जारी कर सरकार को 12.39 करोड़ रुपये का चूना लगाया। फर्जी सिलिकोसिस सर्टिफिकेट के मामले में पहली बार गिरफ्तारी हुई हैं।
तीनों को किया गिरफ्तार
साइबर थाना प्रभारी बृजेश ने बताया कि इस मामले में डॉ. मनोज ऊंचवाल (चेस्ट-टीबी कनिष्ठ विशेषज्ञ), डॉ. डीएन शर्मा (प्रमुख विशेषज्ञ मेडिसिन) और रेडियोग्राफर मनोहर लाल को गिरफ्तार किया है। कोर्ट के आदेश पर इन्हें जेल भेज दिया गया है। इनके खिलाफ दौसा में 29 जनवरी 2024 को शिकायत दर्ज करवाई थी।
शक के आधार पर बनी कमेटी
सिलिकोसिस सर्टिफिकेट नवंबर 2022 से ऑनलाइन बनना शुरू हुए थे। प्रदेश में सबसे ज्यादा सर्टिफिकेट दौसा जिले में जारी हुए थे। 10 महीने में दौसा में 2453 सर्टिफिकेट बना दिए गए थे। यह संख्या पूरे प्रदेश में बने सर्टिफिकेट का 46 प्रतिशत थे। इसमें पूरे प्रदेश में 22 कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई थी। इसमें अकेले 13 लोग दौसा जिले से थे। दौसा में इतनी इतनी अधिक थी कि प्रदेश स्तरीय जांच टीम को शक हुआ और कमेटी गठित की गई।
जांच में सामने आई मिलीभगत
जांच में सामने आया कि कुछ चिकित्सा अधिकारियों और रेडियोग्राफरों ने फर्जी सर्टिफिकेट जारी किए हैं। जिन मरीजों को सिलिकोसिस नहीं था, उन्हें भी सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं। और जो मरीज असल में इस बीमारी से पीड़ित थे, उनके सर्टिफिकेट रिजेक्ट कर दिए गए।
जांच में यह भी सामने आया कि रेडियोग्राफर द्वारा एक ही एक्सरे का बार-बार उपयोग किया गया है। इस एक्सरे को बार-बार फाइल में लगाया गया है।
सिलिकोसिस क्या है?
सिलिकोसिस एक गंभीर बीमारी है जो खदानों में काम करने वाले श्रमिकों में आम होती है। इसमें सिलिका युक्त धूल फेफड़ों में चली जाती है, जिससे फेफड़े खराब हो जाते हैं। सरकार ने इस बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए 2019 में सिलिकोसिस नीति लागू की थी, जिसके तहत आर्थिक मदद दी जाती है।
सिलिकोसिस कार्ड पर मिलने वाली सहायता
सिलिकोसिस नीति के तहत मरीज को 3 लाख रुपये मिलते हैं। मरीज की मौत होने पर उसके परिवार को 2 लाख रुपये और अंतिम संस्कार के लिए 10 हजार रुपये दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त मरीज को 1500 रुपये मासिक पेंशन भी दी जाती है।
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